नयी दिल्ली 18 नवम्बर, उच्चतम न्यायालय ने उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्तियों में पारदर्शिता लाने के मामले में गेंद केंद्र सरकार के पाले में ही फेंकते हुए आवश्यक ज्ञापन मसौदा तैयार करने का जिम्मा उसी को सौंप दिया। न्यायमूर्ति जे एस केहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्तियों से संबंधित कॉलेजियम प्रणाली में सुधार के लिए मसौदा ज्ञापन तैयार करने का एटर्नी जनरल मुकुल रोहतगी का प्रस्ताव स्वीकार करते हुए उन्हें इसकी इजाजत दे दी। संविधान पीठ ने मसौदे के लिए श्री रोहतगी को एक व्यापक खाका भी पेश किया, जिसमें कॉलेजियम की मदद के लिए स्वतंत्र सचिवालय की स्थापना सहित विभिन्न महत्वपूर्ण उपाय शामिल किये गए हैं। कॉलेजियम प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण सलाह भी दी गई, जिसमें कहा गया है कि न्यायाधीश बनने के लिए चयनित उम्मीदवारों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों की जांच सरकार और न्यायपालिका मिलकर करेगी।
हालांकि न्यायालय ने सलाह दी कि जज बनने वाले उम्मीदवारों या वकीलों के पेशागत प्रदर्शन के संबंध शिकायतों की जांच न्यायपालिका करे, जबकि ऐसे उम्मीदवारों की निष्ठा के खिलाफ आरोपों की जांच का जिम्मा सरकार के पास हो। हालांकि अदालत कक्ष में बैठे विभिन्न याचिकाकर्ताओं के वकीलों एवं न्यायविदों ने न्यायालय से एटर्नी जनरल की पेशकश को ठुकराने की सलाह दी। पूर्व सॉलिसिटर जनरल गोपाल सुब्रह्मण्यम और संविधान विशेषज्ञ राजीव धवन ने श्री रोहतगी की पेशकश का विरोध किया, लेकिन न्यायमूर्ति केहर ने कहा कि जब शीर्ष अदालत सरकार के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) कानून और तत्संबंधी 99वें संविधान संशोधन को निरस्त कर सकती है तो सरकार के मसौदा उपबंध को हटाने में क्या दिक्कत होगी? इससे पहले कल श्री रोहतगी ने हलफनामा दायर करके कहा था कि सरकार एनजेएसी कानून में संशोधन भी ला सकती है।

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