नयी दिल्ली, 11 नवंबर, बिहार चुनाव के परिणामों ने देश के सभी प्रमुख दलों को सतर्क कर दिया है और इस चुनाव में जीत हासिल करने वाले दल देश के नौ राज्याें में अगले दो वर्षों में होने वाले विधानसभा चुनावों में एक ओर जहां अपना विजय रथ आगे बढ़ाने की तैयारियों में लग गई हैं तो वहीं दूसरी ओर अन्य विपक्षी एंव क्षेत्रीय पार्टियां इन परिणामों से सीख ले कर आगे की रणनीति तैयार करने में जुट गई हैं। बिहार में चुनाव से पहले बने महागठबंधन की तीन बड़ीं पार्टियों जनता दल (जद यू),राष्ट्रीय जनता दल(राजद) और कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करते हुए लगभग तीन चौथाई बहुमत हासिल किया। इस जीत से उत्साहित ये तिकड़ी नौ राज्यों में होने वाले चुनावों में भी इससे बेहतर प्रदर्शन करना चाहेंगी वहीं दूसरी ओर इस चुनाव में कारारी शिकस्त खाने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल हार के कारणों की गहन समीक्षा करके अागे के चुनावों में अपनी गलतियों को दोहराने से बचने का प्रयास करेंगे।
केरल,तमिलनाडु,पुड्डुचेरी,पश्चिम बंगाल और असम में अगले वर्ष जबकि उत्तर प्रदेश,पंजाब,गोवा ,उत्तराखंड और मणिपुर में 2017 में विधानसभा चुनाव हाेने हैं। जानकारों का मानना है कि बिहार का जनादेश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के लिए एक सबक है क्योंकि इस सरकार के पास अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए केवल साढ़े तीन वर्ष का समय शेष है। बिहार चुनाव के परिणामों ने दिल्ली विधानसभा चुनावों की याद ताजा कर दी है जिसमें नवगठित आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीती थीं।
दिल्ली विधानसभा चुनावों में भाजपा को महज तीन सीटों पर विजय मिली थी। इसके बाद हार के कारणों की समीक्षा भी की गई थी आैर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने हार स्वीकार करते हुए इसके पीछे के कारणों को सार्वजनिक भी किया था लेकिन कुछ नेताओं ने दबे- छिपे शब्दों में प्रमुख नेताओं के कामकाज के तरीकों को हार के लिए जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन बिहार चुनाव परिणामों के बाद तो पार्टी के नेता शत्रुघ्न सिन्हा सहित कई राज्यों के सांसदों ने खुल कर अपने विचार व्यक्त किए जिसके कारण पार्टी को काफी असहज स्थिति का सामना करना पडा। मधुबनी से सांसद एवं पूर्व कपड़ा मंत्री हुकुमदेव नारायण यादव ने तो खुलेआम राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण संबंधी बयान को चुनाव में हार के लिए जिम्मेदार ठहराया है। गौरतलब है कि श्री भागवत ने कहा था कि आरक्षण की नीतियों की समीक्षा की जानी चाहिए। कारण चाहे जो भी रहें हाें लेकिन पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
राजनीतिज्ञों का मानना है कि इन परिणामों ने कांग्रेस में नई जान फूंक दी है और और पार्टी के अंदर अगले दो वर्षों में हाेने वाले चुनाव के समीकरण तैयार करने के लिए नया जाेश आ गया है। उधर सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर महागठबंधन से किनारा कर चुके समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव भी राष्ट्रीय राजनीति में आने के लिए स्थितियों की समीक्षा करने में पीछे नहीं रहेंगें। जानकारों का मानना है कि अलग- अलग राज्यों में चुनावी परिदृश्य और स्थितियां भिन्न होने के कारण विभिन्न दल स्थानीय राजनीतिक समीकरण के मुताबिक रणनीति बनाने का प्रयास करेंगे।

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