मानव व्यवहारशास्त्रियों, यौनमनोवैज्ञानिकों, कामशास्त्रियों और तर्क-शास्त्रियों ने विभिन्न देशों और विभिन्न समाजों में, अनेक अंतरालों पर किये गए शोध तथा अध्ययनों में बार-बार इस तथ्य की पुष्टि की है कि-पुरुष के समक्ष सम्पूर्ण समर्पण स्त्री की आदिम-अतृप्त-मनोकामना है। है। जिससे मुक्ति का नाटक बेशक किया जाए, लेकिन व्यवहार में ऐसा असम्भव है।
सम्भवत: यही वजह है कि-स्त्री-पुरुष की सम्पूर्ण समानता और स्त्री सशक्तिकरण अवधारणा की प्रवर्तक, समर्थक और पुरुषवादी व्यवस्था की प्रखर आलोचक नामचीन स्त्रियां भी, निजी चिंतन और व्यवहार में स्त्री के दैहिक सौंदर्य-प्रकटीकरण, दैहिक रंग-रूप व आकर्षण और पुरुष-प्रलोभक आभूषणों, वेशभूषा तथा कामुक हावभावों की महत्ता का पुरजोर समर्थन करती देखी और सुनी जा सकती हैं।
निरपेक्ष भाव से निर्णय लेते समय-इसे क्या कहा जाए? स्त्री की पुरुष से बराबरी करने की सदियों की दमित आकांक्षा? पुरुषों पर शासन करने की नवोदित सोच? स्त्री व्यवहार का दोगलापन? स्त्री की दोहरी प्रकृति? स्त्री जीवन का कटु-सत्य? स्त्री की नैसर्गिक प्रकृति या कुछ और.....?
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
9875066111/10.11.15/09.41AM
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'-राष्ट्रीय प्रमुख
हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन
राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान


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