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मंगलवार, 5 जनवरी 2016

विशेष आलेख : बाजार में बोतलबंद हवा

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व्यावसायिक बुद्धि और नवोन्मेश की ललक हो तो बाजार में उम्मीदों के नए-नए द्वार आसानी से खुल जाते हैं। वैसे भी संभावनाओं का कभी अंत नहीं होता। वाकपटु लोग गंजों को भी कंघी बेचने में कामयाब हो जाते हैं। कनाडा की कंपनी ‘वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक‘ने कुछ ऐसा ही अनूठा करिष्मा कर दिखाया है। कंपनी ने वनाच्छादित पहाड़ों और जंगलों की हवा को बोतलबंद पानी की तरह बेचने का धंधा षुरू किया है। बोतल में बंद हवा बेचने का यह अवसर दुनिया में बढ़ते वायु प्रदुशण ने दिया है। दूशित हवा से बेचैन और पीडि़त लोग इसे हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। महानगरों में बढ़ता वायु प्रदुशण,दूशित औद्योगिक कचरे और कारों से उगलते धुंए को माना जा रहा है। औद्योगिक घरानों के दबदबे के चलते औद्योगिक उत्पादन घटाना तो मुष्किल है,ऐसे में कारोबारियों को बोतलबंद हवा के रूप में नया सुरक्षा कवच मिल गया है। जाहिर है,भारत समेत दुनिया के कई महानगरों में कारों पर नियंत्रण की जो मुहिम षुरू हुई है,उसे धक्का लग सकता है। इसके उलट यही कारोबारी कार के साथ हवा की बोतलें बतौर उपहार देने का फंडा भी षुरू कर सकते हैं। मसलन बाजार में कारों के साथ हवा का बाजार तो बढ़ेगा,किंतु इस महंगी हवा को खरीदकर इस्तेमाल करना गरीब के वष की बात नहीं है।
ब्रह्मण्ड में पृथ्वी एक मात्र ऐसा गृह है,जहां वायु होने के कारण जीवन संभव है। वायु में नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक 21 प्रतिषत होती है। इसके अलावा आॅक्सीजन 0.03 प्रतिषत और अन्य गैसें 0.97 प्रतिषत होती हैं। वैज्ञानिकों के आकलन के अनुसार पृथ्वी के वायुमंडल में करीब 6 लाख अरब टन हवा है। हवा,पृथ्वी,जल,अग्नि और आकाष जैसे जीवनदायी तत्वों में से एक तत्व है। कोई भी प्राणी भोजन और पानी के बिना तो कुछ समय तक तो जीवित रह सकता है,लेकिन हवा के बिना कुछ मिनट ही बमुष्किल जीवित रह सकता है। मनुश्य दिन भर में जो भी कुछ खाता-पीता है,उसमें 75 फीसदी भाग हवा का होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मनुश्य एक दिन में 22000 बार सांस लेता है। इस तरह से वह प्रतिदिन 15 से 18 किलोग्राम यानी 35 गैलेन हवा ग्रहण करता है। ऐसे में हवा दूशित मसलन जहरीली हो तो मानव षरीर पर उसके दुश्प्रभाव पड़ना तय है। वायु प्रदुशण के चलते वायु में भौतिक,रसायनिक या उसके जैविक गुणों में ऐसा कोई भी अवांछित परिवर्तन हो जिसके द्वारा स्वयं मनुश्य या अन्य जीवों को जीने में परेषानी अनुभव होने लगे या सांस लेने में दिक्कत आने लगे तो जान लीजिए हवा प्रदूशित हो रही है। हवा में प्रदुशण बढ़ने के साथ प्राकृतिक संपदा भी नश्ट होने लग जाती है। भारत की बात तो छोडि़ए अमेरिका जैसे सुविधा संपन्न देष में भी हर साल 32 करोड़ 50 लाख टन से अधिक मूल्य के खाद्यान्न नश्ट हो जाते हैं।
वायु के ताप और आपेक्षिक आद्रता का संतुलन गड़बड़ा जाने से हवा प्रदुशण के दायरे में आने लग जाती है। यादि वायु में 18 डिग्री सैल्सियस ताप और 50 प्रतिषत आपेक्षिक आर्द्रता हो तो वायु का अनुभव सुखद लगता है। लेकिन इन दोनों में से किसी एक में वृद्धि,वायु को खतरनाक रूप में बदलने का काम करने लग जाती है। ‘राश्ट्रीय वायु गुणवत्ता मूल्यांकन र्काक्रम‘ ;एनएसीएमपीद्ध के मातहत ‘केंद्रीय प्रदूशण मंडल‘ ;सीपीबीद्ध वायु में विद्यमान ताप और आद्रता के घटकों को नापकर यह जानकारी देता है कि देष के किस षहर में वायु की षुद्धता अथवा प्रदूशण की क्या स्थिति है। नापने की इस विधि को ‘पार्टिकुलेट मैटर‘ मसलन ‘कणीय पदार्थ‘ कहते हैं। प्रदूशित वायु में विलीन हो जाने वाले ये पदार्थ हैं,नाइट्रोजन डाईआॅक्साइड और सल्फर डाईआॅक्साइड सीपीबी द्वारा तय मापदंडों के मुताबिक उस वायु को अधिकतम षुद्ध माना जाता है,जिसमें प्रदूशकों का स्तर मानक मान के स्तर से 50 प्रतिषत से कम हो। इस लिहाज से दिल्ली समेत भारत के जो अन्य षहर प्रदूशण की चपेट में हैं,उनके वायुमंडल में सल्फर डाईआॅक्साइड का प्रदूशण कम हुआ है,जबकि नाइट्रोजन डाईआॅक्साइड का स्तर कुछ बड़ा है।
सीपीबी ने उन षहरों को अधिक प्रदूशित माना है,जिनमें वायु प्रदूशण का स्तर निर्धारित मानक से डेढ़ गुना अधिक है। यदि प्रदूशण का स्तर मानक के तय मानदंड से डेढ़ गुना के बीच हो तो उसे उच्च प्रदूशण कहा जाता है। और यादि प्रदूशण मानक स्तर के 50 प्रतिषत से कम हो तो उसे निम्न स्तर का प्रदूशण कहा जाता है। वायुमंडल को प्रदूशित करने वाले कणीय पदार्थ,कई पदार्थों के मिश्रण होते हैं। इनमें धातु,खनिज,धुएं,राख और धूल के कण षामिल होते हैं। इन कणों का आकार भिन्न-भिन्न होता है। इसीलिए इन्हें वगीकृत करके अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी के कणीय पदार्थों को पीएम-10 कहते हैं। इन कणों का आकार 10 माइक्राॅन से कम होता है। दूसरी श्रेणी में 2.5 श्रेणी के कणीय पदार्थ आते हैं। इनका आकार 2.5 माइक्राॅन से कम होता है। ये कण षुश्क व द्रव्य दोनों रूपों में होते हैं। वायुमंडल में तैर रहे दोनों ही आकारों के कण मुंह और नाक के जरिए ष्वास नली में आसानी से प्रविश्ठ हो जाते हैं। ये फेफड़ों तथा हृदय को प्रभावित करके कई तरह के रोगों के जनक बन जाते हैं। आजकल नाइट्रोजन डाईआॅक्साइड देष के नगरों में वायु प्रदूशण का बड़ा कारक बन रही है।  
वैसे तो अमेरिका और मध्य पूर्व के कई देषों में हवा का कारोबार मृगछौने की तरह खूब कुलांचें मारने लगा है,लेकिन चीन के वायुमंडल में छाये वायु प्रदुशण से इसमें भारी उछाल आया है। हालत यह है कि चीन में लोग उपहार के तौर पर बोतलबंद हवा अपने रिष्तेदारों और मित्रों को देने लगे हैं। ऐसे में सोचनीय प्रष्न है कि  हवा का यह कारोबार भारत में कारगर साबित होगा ? उललेखनीय है कि विष्व आर्थिक मंच ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि दुनिया के 20 प्रदूशित षहरों में 18 एषिया में हैं। इनमें भी 13 भारत में हैं। भारत में वायु प्रदूशण का सबसे बढ़ा कारण बढ़ते वाहन और उनका सह उत्पाद प्रदुशित धुंआ माना जा रहा है। हवा में घुलते इस जहर का असर केवल महानगरों में ही नहीं,छोटे नगरों में भी प्रदूशण का सबब बन रहा है। यही कारण है कि दिल्ली,लखनऊ,कानपुर,अमृतसर,इंदौर और अहमदाबाद जैसे षहरों में प्रदूशण खतरनाक स्तर की सीमा लांघने को तत्पर दिखाई दे रहा है। 

दिल्ली में लुटियंस क्षेत्र आबोहवा की दृश्टि से सबसे अधिक खुषनुमा इलाका माना जाता है,लेकिन इसी क्षेत्र में आने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निवास स्थल 7 रेसकोर्स भी दूशित हवा की चपेट में है। इस आवास के बाहर पीएम ट्रैकर से प्रदूशण का स्तर हाल ही में जांचा गया तो आंकड़े हैरान करने वाले आए। यहां कणीय पदार्थ यानी पीएम की मात्रा 2000 माइक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर के ऊपर थी। जबकि दिल्ली में 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर को एकदम साफ प्राकृतिक हवा का कारक माना जाता है। सेंटर फाॅर साइंस एंड एनवारमेंट की मषीन ने भी यहां प्रदूशण का स्तर औसत स्तर से करीब 14 गुना ज्यादा दर्ज किया है। साफ है,दिल्ली के वायुमंडल में जहरीली हवा तैर रही है।
केंद्रीय प्रदूशण मंडल भी देष के 121 षहरों में वायु प्रदूशण का आकलन करता है। इसकी एक रिपोर्ट के मुताबिक देवास,कोझिकोड एवं तिरूपति को अपवादस्वरूप छोड़ दें तो बांकी सभी षहरों में प्रदूशण एक बड़ी समस्या के रूप में वायुमंडल में जगह बनाता जा रहा है। इसकी वजह तथाकथित वाहन क्रांति है। जिस गुजरात को हम आधुनिक विकास का माॅडल मानकर चल रहे हैं,वहां भी प्रदूशण के हालात भयावह हैं। कुछ समय पहले टाइम पात्रिका में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के चार प्रमुख प्रदूशित षहरों में गुजरात का बापी षहर भी षामिल है। यहां 400 किलोमीटर लंबी औद्योगिक पट्टी है। इन उद्योगों में कामगर और बापी के रहवासी कथित औद्योगिक विकास की बड़ी कीमत चुका रहे हैं। बापी के भूगर्भीय जल में पारे की मात्रा विष्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों से 96 प्रतिषत ज्यादा है। यहां की वायु में धातुओं के कण बड़ी संख्या में हैं,जो फसलों पर संक्रमण का कहर ढहा रहे हैं। 

देष में फैल रही इस जहरीली हवा की पृश्ठभूमि इस बात की तस्दीक है कि यदि बोतलबंद हवा का कारोबार भारत में षुरू होता है तो इसका विस्तार दिन दूना,रात चैगूना फैलने की उम्मीद है। लेकिन इससे षंका यह उभरती है कि हवा का कारोबार कहीं प्रदूशण मुक्ति के स्थायी सामाधान के उपायों पर भारी न पड़ जाए ? इस बोतलबंद हवा की जानकारी आने से पहले दिल्ली में बड़ी कारों के पंजीयन पर रोक और एक दिन सम और दूसरे दिन विशम संख्या की कारों को चलाने की व्यवस्था षुरू हुई है। हवा को स्वच्छ बनाए रखने के ये उपाय कारगर और बहुजन हितकारी हैं। लेकिन अब कार निर्माता कंपनियां बोतलबंद हवा के जरिए षुद्ध हवा का विकल्प उपहार में देकर सरकार के समक्ष नई कारों के पंजीयन से रोक हटाने का सुझाव रख सकती हैं। क्योंकि जब दिल्ली सरकार ने सम-विशम संख्या की कारें चलाने का फाॅर्मूला पेष किया था,तब ये कंपनियां इस फाॅर्मूले को लागू करने के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय चली गई थीं। तब न्यायालय ने दलील दी थी कि ‘आपको कारें बेचने की पड़ी है,जबकि लोगों के प्राण जोखिम में हैं।‘ वैसे भी बोतलबंद हवा,वायु की षुद्धि का तात्कालिक व्यक्तिगत उपाय तो है,लेकिन वायुमंडल से प्रदूशण मुक्ति का व्यापक एवं स्थायी हल कतई नहीं है। 

कंपनी ने फिलहाल ‘बैंफ एयर‘ और ‘लेक लुईस‘ नाम से दो प्रकार की हवाबंद बोतलें बाजार में उतारी हैं। बैंफ एयर की तीन लीटर की बोतल की कीमत 20 कनाडाई डाॅलर,यानी भारतीय मुद्रा में करीब 952 रुपए है। लेक लुईस बोतल में 7.7 लीटर हवा है। इसकी कीमत 32 कनाडाई डाॅलर,मसलन 1532 रुपए है। फिलहाल भारत में इस हवा का व्यापार षुरू नहीं हुआ है,लेकिन जिस तेजी से इस कारोबार में उछाल आ रहा है,उस परिप्रेक्ष्य में तय है,देर-सबेर हवा की बोतल भारतीय बाजार का हिस्सा बन जाएगी। साफ है,इस बोतल का उपयोग धनी लोग ही कर पाएंगे।

वाइटैलिटी एयर बैंफ एंड लेक कंपनी ने 2014 में प्रयोग के तौर पर हवा भरी थैलियां बेचने की षुरूआत की थी। उस वक्त किसी को अंदाजा नहीं था कि यह पहल भविश्य में वाणिज्यिक दृश्टि से कितनी महत्वपूर्ण होने जा रही है। कंपनी के संस्थापक मोसेज लेक का कहना है कि उनके द्वारा बाजार में लाई गई थैलियों की पहली खेप तुरंत बिक गई। इससे उनके हौसले को बल मिला और फिर इस कारोबार को फुलटाइम व्यवसाय में बदल दिया। कंपनी ने हाल ही में चीन में बोतलबंद हवा का व्यापार षुरू किया है। यहां कारोबार के उद्घाटन वाले दिन ही 500 बोतलें हाथों-हाथ बिक गईं और अब अमेरिका व मध्य पूर्व के देषों के बाद चीन बोतलबंद हवा का खरीददार सबसे बड़ा देष बन गया है। भारत में खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी इस जहरीली हवा के चलते कंपनी भारत में भी बाजार तलाष रही है। यदि इस हवा की आमद भारत में हो जाती है तो जिस तरह से प्रदूशित हो रहे जलस्त्रोतों को प्रदूशण मुक्त बनाने की कोषिषें नाकाम होती रही हैं,उसी तरह वायु को प्रदूशण मुक्त बनाने की संभावनाएं भी हवा के कारोबारी ठप कर देंगे। 






प्रमोद भार्गव
शब्दार्थ 49,श्रीराम काॅलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492-232007, 233882
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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