नयी दिल्ली,06मार्च, प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र निर्माण में महिलाओं के योगदान को अप्रतिम बताते हुए आज कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण की बात अब पुरानी हो चुकी है। महिलाएं खुद ही शक्तिरूपा हैं, ऐसे में उनके विकास की जगह उनके नेतृत्व में देश के विकास की बात होनी चाहिए। श्री मोदी आज यहां महिला जनप्रतिनिधियों के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन माैके पर बोल रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर महिला जनप्रतिनियों का अाह्वान करते हुए कहा कि उन्हें समाज के उस तबके के लोगों को सशक्त बनाने में अपनी अहम भूमिका निभानी है, जो अशक्त है। प्रधानमंत्री ने महिलाओं के प्रकृतिप्रदत्त गुणों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज कल प्रबंधन के क्षेत्र में “मल्टी टास्क गतिविधियों” का जुमला बहुत प्रचलित है, जिसका अर्थ है कि एक इन्सान में कितने तरह के काम करने की खूबियां हो सकती है। इस मल्टी टास्क के संदर्भ में देखा जाए तो महिलाएं पुरुषों से अधिक सामर्थ्यवान है। चाहे घर हो या बाहर हर मोर्चे पर महिलाओं ने अपने कौशल का प्रमाण दिया है। समय आ गया है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर महिलाओं के इस सामर्थ्य और कौशल को पूरी तवज्जो दी जाए अौर राष्ट्र निर्माण में उन्हें वे अवसर प्रदान किए जाएं, जिनकी वह हकदार हैं। श्री मोदी ने कहा कि कोई भी राष्ट्र तभी सशक्त बन सकता है, जब उसका हर नागरिक सशक्त हो। इसमें भी महिलाओं की भूमिका ही सबसे आगे है। परिवार में एक मां के रुप में वह अपनी यह भूमिका अदा करती है। राष्ट्र निर्माण में उसके इस योगदान का लंबा इतिहास रहा है।
प्रधानमंत्री ने महिला जनप्रतिनिधियों से अपनी प्रतिभा को और निखारने का अनुरोध करते हुए कहा ‘जिन सपनों को लेकर अाप लोग सार्वजनिक जीवन में आयी हैं ,उसके लिए अपने आपको सक्षम कैस बनाएं यही आपका लक्ष्य होना चाहिए। व्यवस्थागत बदलाव तो होते रहेंगे इसके पहले बड़ी जरूरत यह है कि आप लोग अपने निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी जनता खासतौर से उन महिलाओं से मिलें और उनकी समस्याआें को दूर करने के उपाय करें, जिन्होंने भरोसा कर आपको यहां तक पहुंचाया है।” उन्होंने कहा कि आपसी मेल जोल से जो अनुभव साझा होते हैं। वह सदनों में बैठकर कभी नहीं हो सकते। जनता की आवाज सुनने के लिए उसके करीब जाना पड़ता है। श्री मोदी ने आधुनिक युग में प्रौद्योगिकी की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि वह चाहते हैं महिला जनप्रतिनिधिति अपने लोगों की आवाज सुनने और उन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इस प्रभावी तकनीक का इस्तेमाल अवश्य करें । उन्होंने कहा कि वह मानते हैं कि इसमें भी महिला जनप्रतिनिधि अपने सहयोगी पुरूष जनप्रतिनिधियों से आगे रहेंगी क्योंकि किसी भी चीज को सहजता से अपनाने का जो अद्भुत कौशल महिलाओं में है वैसा पुरुषों में नहीं होता। श्री मोदी ने इस अवसर पर लोकसभा और राज्यसभा की महिला सांसदों के लिए एक ई-प्लेटफार्म शुरू करने का अनुरोध किया। उन्होंने महिलाओं के वात्सल्य और भावनात्मक ताकत की प्रशंसा करते हुए कहा कि राष्ट्र के ढ़ांचागत विकास को महिलाओं की यह उूर्जा ही प्राणवान बना सकती है। श्री मोदी ने महिला प्रतिनिधियों से अपने इस प्रकृति प्रदत्त गुणों को पहचानने और निखारने की अपील करते हुए कहा कि जब तक चुनौतियों का सामना नहीं किया जाता तब तक अपने अंदर छुपी प्रतिभा की पहचान नहीं होती इसलिए वह चाहते हैं कि महिला जनप्रतिनिधि रास्ते में आने वाली चुनौतियों से डटकर मुकाबला करते हुए राष्ट्र निर्माण के पथ पर अग्रसर हाें। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा सिंह पाटिल ने इस अवसर पर कहा कि महिलाओं को कितने अधिकार मिले कितने नहीं यह सवाल नहीं है सवाल यह है कि उन्हें अपनी सोच और अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त अवसर और मंच दिए जाए। उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण के साथ आत्म रक्षा की अहमियत काे भी जोड़ते हुए कहा कि हर महिला को आत्मरक्षा के गुर जरूर सीखने चाहिए।
लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की ओर से अायोजित जनप्रतिनिधियों के इस दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन कल राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने किया था। उद्घाटन अवसर पर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व काे अपर्याप्त बताते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों से आह्वान किया कि वे लोकसभा एवं विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने संबंधी विधेयक को पारित कराने का प्रयास करें। राष्ट्रपति ने इस मौके पर संविधान के 73वें एवं 74वें संशोधन का जिक्र भी किया और कहा कि इसके माध्यम से स्थानीय निकायों में महिलाआें को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया गया , जिससे आज 12.7 लाख महिला जनप्रतिनिधि पंचायतों और नगर निकायों में उनकी प्रभावी भूमिका निभा रही हैं । कई राज्यों ने महिला आरक्षण 50 प्रतिशत भी किया है, जिससे आज स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी 43.56 प्रतिशत हो गयी है। इसका बहुत अच्छा असर हुआ है। उन्होंने संसद, विधानसभाओं, विधानपरिषदों और संसदीय समितियों में महिला प्रतिनिधियों के अनुपात पर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय स्तर एवं प्रांतीय स्तर पर महिला प्रतिनिधित्व की स्थिति पर रोशनी डालते हुए कहा कि स्थानीय निकायों में महिलाओं की उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद संसद एवं विधानमंडलों में महिलाओं का अनुपात नहीं बढ़ पाया। महिलाआें का संसद में 12 प्रतिशत, विधानसभाओं में नौ प्रतिशत और विधानपरिषदों में छह प्रतिशत प्रतिनिधित्व है। संसदीय समितियों में भी यही हाल है। वित्तीय मामलों की तीन समितियों के कुल 74 सदस्यों में से केवल दो महिलायें हैं। लोक लेखा समिति एवं लोक उपक्रम संबंधी समिति में कोई महिला नहीं है। उन्होंने कई अन्य समितियों में भी ऐसी ही स्थिति का उल्लेख किया।
लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की ओर से अायोजित जनप्रतिनिधियों के इस दो दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन कल राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने किया था। उद्घाटन अवसर पर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने विधायिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व काे अपर्याप्त बताते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों से आह्वान किया कि वे लोकसभा एवं विधानसभाओं में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण देने संबंधी विधेयक को पारित कराने का प्रयास करें। राष्ट्रपति ने इस मौके पर संविधान के 73वें एवं 74वें संशोधन का जिक्र भी किया और कहा कि इसके माध्यम से स्थानीय निकायों में महिलाआें को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया गया , जिससे आज 12.7 लाख महिला जनप्रतिनिधि पंचायतों और नगर निकायों में उनकी प्रभावी भूमिका निभा रही हैं । कई राज्यों ने महिला आरक्षण 50 प्रतिशत भी किया है, जिससे आज स्थानीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी 43.56 प्रतिशत हो गयी है। इसका बहुत अच्छा असर हुआ है। उन्होंने संसद, विधानसभाओं, विधानपरिषदों और संसदीय समितियों में महिला प्रतिनिधियों के अनुपात पर उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की टिप्पणी का समर्थन करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय स्तर एवं प्रांतीय स्तर पर महिला प्रतिनिधित्व की स्थिति पर रोशनी डालते हुए कहा कि स्थानीय निकायों में महिलाओं की उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद संसद एवं विधानमंडलों में महिलाओं का अनुपात नहीं बढ़ पाया। महिलाआें का संसद में 12 प्रतिशत, विधानसभाओं में नौ प्रतिशत और विधानपरिषदों में छह प्रतिशत प्रतिनिधित्व है। संसदीय समितियों में भी यही हाल है। वित्तीय मामलों की तीन समितियों के कुल 74 सदस्यों में से केवल दो महिलायें हैं। लोक लेखा समिति एवं लोक उपक्रम संबंधी समिति में कोई महिला नहीं है। उन्होंने कई अन्य समितियों में भी ऐसी ही स्थिति का उल्लेख किया।

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