- आॅरो सुंदरम कंपनी और भाजपा विधान पार्षद अशोक अग्रवाल को जांच के दायरे के बाहर रखना, नीतीश के असली चरित्र को करती है बेनकाब, एसपी को क्लीन चिट देना कहीं से उचित नहीं, सारे उच्चस्थ प्रशासक हैं दोषी.
- ऐसे मामलों में सरकार का रूख लोकतंत्र विरोधी, भागलपुर दंगा आयोग की तरह बजट सत्र के अंतिम दिन अंतिम सत्र में रिपोर्ट पेश कर बहस से भाग रही सरकार, अदालतों व आयोगों द्वारा दमनकारी ताकतों के पक्ष में फैसला - चिंताजनक.
5 अप्रील 2016, माले राज्य सचिव कुणाल और विधानसभा में माले विधायक दल के नेता महबूब आलम ने कहा है कि बजट सत्र के अंतिम दिन और उसमें भी अंतिम समय में फारबिसगंज गोलीकांड न्यायिक आयोग की रिपोर्ट को सदन में पेश करके सरकार साबित कर रही है कि अल्पसंख्यकों-दलितों के दमन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उसका रवैया बेहद संवेदनहीन और बहस-मुहाबिसे से भागने का है. इसके पूर्व भागलपुर दंगे की रिपोर्ट के मामले में भी सरकार ने ऐसा ही किया था. हम सरकार के इस रूख की कड़ी निंदा करते हैं. नेताओं ने आगे कहा कि जांच आयोग द्वारा भजनपुर गोलीकांड को जायज ठहराना पूरी तरह गलत है. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन डीएम व थाना प्रभारी को तो दोषी पाया है, लेकिन एसपी को पूरी तरह आरोप मुक्त कर दिया है. उसने यह भी कहा है कि घटना के दिन परिस्थितियां ऐसी बन गयी थीं, जिसमें पुलिस फायरिंग के सिवाय और कोई दूसरा रास्ता नहीं था. रिपोर्ट ने ग्रामीणों को ही दोषी ठहराया है.
जबकि हकीकत यह है कि पूरी जमीन विवादित थी, लोग उचित मुआवजे को लेकर लंबे समय से संघर्षरत थे और दशकों से उस जगह पर सड़क थी. इस तरह ग्रामीणों का संघर्ष पूरी तरह जायज था. इसलिए आयोग द्वारा ग्रामीणों को ही दोषी ठहराने के फैसले की हम कड़ी निंदा करते हैं और इसे पक्षपताी मानते हैं. साथ ही हमारी मांग है कि सभी उच्चस्थ प्रशासनिक पदाधिकारियों को दोषी ठहराते हुए उनपर कड़ी कार्रवाई की जाए. माले नेताओं ने आगे कहा कि हाल के दिनों में अदालतों अथवा न्यायिक आयोगों का फैसला निरंतर दमनकारी ताकतों के पक्ष में आना बेहद चिंताजनक है. उन्होंने आगे कहा कि भागलपुर हो या फारबिसगंज, नीतीश-लालू की सरकार बिहार के अकलियत समुदाय और लोकतंत्र पसंद अवाम की उम्मीदों के साथ मजाक व विश्वासघात कर रही है. बिहार के जनादेश में न्याय की आकांक्षा जबरदस्त रूप से अभिव्यक्त हुई थी. लेकिन जांच के दायरे से आॅरो सुंदरम कंपनी और भाजपा के स्थानीय विधान पार्षद अशोक अग्रवाल को पूरी तरह बाहर रखा गया. जबकि अशोक अग्रवाल का इस मामले में व्यक्तिगत दिलचस्पी थी और घटना के दिन उसके गंुडे घटनास्थल पर मौजूद थे. अशोक अग्रवाल को जांच के दायरे से बाहर रखकर सरकार ने अपना असली चेहरा दिखला दिया है.

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