विशेष आलेख : भारत का मुसलमान और भा.ज.पा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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बुधवार, 6 अप्रैल 2016

विशेष आलेख : भारत का मुसलमान और भा.ज.पा

भारत की स्वतन्त्रता के पश्चात मुस्लिम वोट कांग्रेस के खाते का माना जाता था। समय आगे खिसका और मुस्लिम-वोट ने लग-भग सभी राजनीतिक दलों के आयने मे झांक कर अपनी शक्ल देखी तो उसे अपनी हैंसियत व ’यूज एण्ड थ्रो’ की स्थिति का ज्ञान हुआ। मुसलमानों को भी समझ आया कि वे तो राजनीति एवं वोट-बैंक का मोहरा मात्र बनकर रह गये हैं। भारत मे निवास कर रहे मुसलमान दो विचारधाराओं वाले स्वरूप के हैं। एक स्वरूप है ऐसे वर्ग का, जो दारूलहरब से दारूल इस्लाम मे परिवर्तन का सिद्धान्त लिये है, अर्थात गैर-मुस्लिम देशों को इस्लामिक देश में परिवर्तित करने का उद्देश्य, और इस हेतु जनसंख्या बढ़ाने से लेकर वे समस्त वैधानिक एवं अवैधानिक कृत्य, जो इस बावत आवश्यक हों, करने से नहीं हिचकते हैं। ऐसी बिचारधारा का वर्ग पाकिस्तान को अपना घर और भारत को मुसाफिरखाना समझता है। भारत पाकिस्तान का युद्ध हो या क्रिकेट मैच, बड़ी बेशर्मी पूर्वक ऐसा वर्ग पाकिस्तान जिन्दाबाद का नारा लगाता है। उन्हे भारत-माता की जय बोलने से, बन्दे मातरम से परहेज है और भारत भूमि की सुरक्षा व भारत के विकास से कोई सरोकार नही है। ऐसा वर्ग भारत के धर्म-निरपेक्ष प्रजातांत्रिक संवैधानिक कानून को नकारते हुए इस्लामी मज़हबी सोच के साथ शरीयत की बात करने लगता है। इस सोच का मुसलमान महिलाओं की पीढ़ाजनक स्थिति और संविधान के दायरे मे यूनीवर्सल सिविल कोड की चर्चा करने पर ये शरीयत की दुहाई देते हुये उसके सुरक्षा-कवच मे छुपने का प्रयास करने लगते हैं। शरीयत अदालतें खोलने का बात और भारत की सर्वोच्च न्यायालय तक का अपमान करते हुये इन्होने शाहबानों के प्रकरण मे सर्वोच्च न्यायालय को गालियां देने का काम किया था। इस सोच का मुसलमान भारत को पाकिस्तान के रूप में देखना चाहता है। 
मुस्लिम वोट को रिझाने के लिये गैर-भाजपाई बिरोधी राजनीतिक दल के नेता सेक्यूलर का छद्म मुखोटा लगा कर चुनाव के पूर्व इमामों के चरण चुम्बन करने से भी परहेज नही करते हैं। विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बनते ही जामा मस्जिद मे अब्दुल्ला बुखारी से मिलने गये थे और उनकी कुर्सी के नीचे जूतियों के स्थान पर बैठे थे। उन्होने यह भी ध्यान नही रखा था कि वह भारत के प्रधानमंत्री हैं और पद की गरिमा का ख्याल तो रखना ही चाहिये था। जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने पांन्चजन्य को दिये साक्षात्कार (दिनांक 18 जनवरी 1987 को प्रकाशित) में कहा था कि मजहब और मुल्क मे से उनकी दृष्टि में इस्लाम का दर्जा पहले नम्बर पर है और मुल्क दूसरे नम्बर पर। ऐसी ही बिचारधारा के लोग अलगाववादियों व मुस्लिम देशों से सम्पर्क करने मे नही हिचकते हैं। गरीब मुसलमानों की भलाई और शिक्षा के उद्देश्य से गठित संगठन जमायित उल्माये हिन्द के कर्ता-धर्ता मौलाना असद मदनी पर सन् 1993 के फरवरी अंक में नव-भारत टाईम्स (दिल्ली) ने आंकड़े बताते हुए आरोप लगाया था कि इन्हें कुवैत, साऊदी अरब, संयुक्त अरब-अमीरात, ईराक वगैरह देशों से करोड़ों रूपये प्राप्त होते हैं और मौलाना साहब ने देहरादून मे बगीचे, शिमला, गाजियाबाद मे कीमती जमीने, आसाम मे एक पेपर मील क्रय की थी और लाखों रूपये जमा होने की खवर चली थी। यह वाक्या शेख मोहम्मद दीन, मोहम्मद आसीन, मालिक उस्मान, मोहम्मद शरीफ, इकबाल अहमद, अजीजुर्ररहमान, शरीफ  उद्दीन, मौहम्मद हुसैन आदि उलेमाओं द्वारा उक्त अखबार को बताया गया था। मुसलमान के नाम पर मुल्ला मौलवियों ने खूब धनार्जन किया है। इन लोगों ने मुसलमानों का मजहब के नाम पर शोषंण किया है और जानबूझकर उसे मानसिक रूप से विकसित नहीं होने दिया। ऐसे लोग इस जनतांत्रिक देश मे फतवा जारी करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते रहे हैं और मुसलमान को एहसास कराते हैं कि मजहब के नाम पर अपना हिंसक स्वरूप बनाये रखो, परिणामतः अभी तक मुसलमान का रचनात्मक उपयोग नहीं हो पाया है। इसी कारण भारत के गरीब असहाय मुसलमानों के विकास के विषय अभी भी प्रश्न चिन्हित हैं।
मुसलमानों का एक वर्ग ऐसा भी है जो दीन-ईमान की बात सोचता है, भारत की मिट्टी से तन-मन-धन से जुड़ा है, ऐसे वर्ग का मुसलमान भारत में रहकर देश-हित की बात करता है और उसका सोच है कि एक दिन अल्लाह के पास जाना है और जब गिरेबां में हाथ डालकर ईमान की बात पूंछी जायेगी तो वह भारत में रहने के कारण ईमान की बात कहेगा। इस बिचारधारा वाले वर्ग के मुसलमानो की संख्या मे अब बढ़ोत्तरी हो रही है और शनैः शनैः इनमे मुल्ला-मौलवियों, इमामों के फतवा जारी होने का भय भी कम हो रहा है। 
मुस्लिम महिलाओं की स्थिति
मुसलमानों मे सर्वाधिक पीढि़त महिला वर्ग है। मुस्लिम महिलाओं पर अधिकांश पुरूष वर्ग हावी होते हुये वह महिला को एक उपभोग की वस्तु मानकर चलता है, उस पर मिल्कियत रखता है। पाकिस्तान मे औरत को पैर की जूती माना जाता है और इस भावना को वहां के प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो भी नही बदल पाईं थी। पाकिस्तान के पश्चिम पंजाब के कस्बे मे एक औरत और उसकी दो जवान बेटियों को भरी पब्लिक में बिल्कुल नंगा करके पीटा गया था और इज्जत लूटी गई थी लेकिन पुलिस ने केस तक दर्ज नहीं किया था, क्योंकि किसी मर्द ने गवाही नहीं दी थी और एक मर्द की गवाही को रद्द करने के लिए तीन औरतों की गवाही जरूरी मानी गई थी। 
मुस्लिम महिला की अत्यन्त दुखमय स्थिति उसके विवाह और तलाक के संदर्भ में है। ‘मुस्लिम लाॅ’ के लेखक न्यायमूर्ति फैजबरूद्दीन तैयत ने लिखा है कि सुन्नी कानून में एक दुखद अनुचित एवं पापपूर्ण तरीका तलाक को तीन बार कहने का है। न्यायमूर्ति शायमीरी ने अमदगिरी बनाम मास्टर बगहा के प्रकरण में टिप्पणी की थी कि तलाक के द्वारा बीबी को निकाल फैकना शैहर के लिए सबसे कम भारी पड़ने वाला तरीका है। अतः तलाक का यह प्रचलित रूप है और औरत को प्रजनन व उत्पत्ति के कुण्ड के रूप में देखा जाता है। (अरूण शौहरी के लेख के सौजन्य से) अपनी मज़हबी मजबूरी के कारण आज एक मुस्लिम औरत अपने आप को शौहर की गुलाम या दासी समझने लगी है। पुरूष बड़ी सहजता से चार शादियां कर लेता है और जब मर्जी आये तीन बार तलाक बोल देता है।   
मुस्लिम महिलाओं के विवाह और तलाक के कारण उनकी पीढ़ाजनक स्थिति के सन्दर्भ में भाजपा के दृष्टिकोंण विषय पर मैंने श्री लालकृष्ण आडवाणी से दिसम्बर 1993 में दतिया रेल्वे-स्टेशन पर चर्चा की थी और उस समय तो उन्होंने कोई जबाव नहीं दिया था। तत्पश्चात मैंने दिनांक 21 मई 1995 को भाजपा के शीर्ष नेताओं, आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, डाॅ.मुरली मनोहर जोशी एवं सिकन्दर वख्त को पत्र लिखे थे तो मुझे बताया गया था कि भाजपा सत्ता मे आने पर संविधान के अनुच्छेद 44 एवं सुप्रीमकोर्ट द्वारा प्रदत्त निर्देश के पालन मे समान नागरिक संहिता का निर्माण करेगी और इस कानून के तहत भारत का प्रत्येक नागरिक एक-समान नियम और प्रावधानो से शासित होगा, जिसमे मुस्लिम  महिलायें भी अन्य दूसरी महिलाओं की तरह समान अधिकार प्राप्त करेंगी। भाजपा से अपेक्षा है कि मुस्लिम महिलाओं को उनके विवाह और तलाक के कारण बनी दयनीय और पीढ़ा-जनक स्थिति में सुधार लाने के लिए एक स्पष्ट कानून का निर्माण की बात उठाये। 
भारतीय-जनता-पार्टी का भारत के मुसलमानों के प्रति दृष्टिकोंण के सन्दर्भ में जितना स्वयं भाजपा ने उजागर नहीं किया उससे कहीं अधिक भाजपा बिरोधी दलों ने उसके नकारात्मक स्वरूप को प्रचारित करके मुसलमानों को डराते हुए उन्हें भाजपा से भयभीत किया है। भाजपा का दृष्टिकोंण मुसलमानों के प्रति राष्ट्रीय भावना को लेकर है। इस देश को, देश की मिट्टी को अपनी जन्मभूमि, कर्म-भूमि एवं मात्र भूमि, प्रत्येक देशवासी सहित मुस्लिम भी समझे। इस सोच में कहीं कोई नकारात्मक और साम्प्रदायिक सोच प्रतीत नहीं होता है। मुस्लिम वोट-बैंक की राजनीति करने वाले मुस्लिम व गैर-भाजपाई नेता उन्हे इस्लामी कट्टरवाद के दायरे मे रखते हुये मज़हबी सोच से बाहर नही आने देना चाहते हैं। इसी सोच को ये सेक्यूलर होना मानते हैं। इसके विपरीत भाजपा इन्हे मज़हब या धर्म से परे हो कर राष्ट्रवादी बिचारधारा के साथ जुड़ने को कहती है। भाजपा कहती है पहले देश फिर मज़हब। मुस्लिम वोट-बैंक के ठेकेदार व कथित सेक्यूलरिस्ट कहते हैं, पहले मज़हब, फिर देश। प्रश्न तो यह है कि यदि मज़हब के मुकाबले देश द्वितीयक होगा, तब तो देश की सीमायें व देश की सुसक्षा ही खतरे मे पड़ जायेगी।  दिनांक 26 मई 2014 को जब केन्द्र मे भारतीय-जनता-पार्टी के नेतृत्व मे नरेन्द्र भाई मोदी ने प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली, तब से उनकी कार्य-शैली, चिन्तन और मुस्लिमों के प्रति उनका नजरिया प्रकट हुआ और निश्चित ही मुसलमानों मे भी भा.ज.पा. व मोदी के सन्दर्भ मे सकारात्मक रूख होने लगा। क्यों कि इसके पूर्व तो सेक्यूलरिस्टों ने मोदी को मुसलमानों का दुश्मन होना प्रचारित किया गया था। मोदी के सत्ता मे आने के पूर्व भारतीय-जनता-पार्टी का मुसलमानों के प्रति रवैया प्रकट करने का मौका ही नही मिल पाया था। भारत मे कट्टवादी मुस्लिम व गैर-भाजपाई नेता मोदी के बिरूद्ध कितना भी विष-वमन करलें, लेकिन वे यह भी देखें कि साऊदी अरबिया मे दिनांक 3 अप्रेल को नरेन्द्र मोदी जी को वहां के सर्वोच्च सम्मान ’सिविलियन आॅनर’ से सम्मानित किया गया और वहां की मुस्लिम महिलाओं ने सार्वजनिक व सामूहिक रूप मे ’भारत माता की जय’ के नारे लगाये थे।    
हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और अन्य धर्मों के लोग गम्भीरता से यह बिचार करें कि, उस समय की कल्पना कीजिये जब हजारों वर्ष पहले इस पृथ्वी पर उस ऊपर वाले मालिक ने इन्सानी जिस्म बनाकर भेजे थे और मानव शरीरों मे कोई मजहबी भेद का एहसास ही नहीं रहा होगा। समय आगे बड़ा और धीरे-धीरे आज के युग मे पहुंचे, जहां इन्सानों के बीच मे दीवारें खिचीं हैं और इसके गुण-दोषों पर फिल्हाल कुछ न कहते हुए इतना अवश्य है कि ईश्वर ने दो धर्मों को समान रूप से निर्मित किया है और इनमें से एक का दूसरे के बिना अस्तित्व ही नहीं है और वे दो धर्म हैं:- (1) स्त्री धर्म (2) पुरूष धर्म । पुरूष का अस्तित्व स्त्री के बिना नहीं है और इसी तरह स्त्री का अस्तित्व पुरूष के बिना नहीं है। खुदा की बनाई इस जीवधारी नाम की गाड़ी को उसके दो पहिये (स्त्री व पिरूष स्वरूप) मिलकर एक समान सहयोग के साथ चला रहे हैं और हिन्दू संस्कृति के अनुसार स्त्री शक्ति का स्वरूप है और उसके बिना शिव भी शव के समान है।





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---राजेन्द्र तिवारी---
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