नाटकों के माध्यम से बुर्जुगों का सम्मान - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

नाटकों के माध्यम से बुर्जुगों का सम्मान

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परिवार में पीढ़ी का अंतर और उससे पनपते मतभेद और बुर्जुगों की मनोदशा और इसके के लिए जिम्मेदार कौन ? कथानक पर आधारित नाटक ‘बाप का बाप दादा होता है’ का मंचन 7 मई, एल टी जी सभाघर, मंडी हॉउस में होगा। इसके लेखक विपिन के सेठी है। इसके अलावा विपिन सेठी परिवारिक समास्याओं और उसके निवारण पर अनेक नाटकों की रचना कर चुके है.... जैसे गौधुली, वृद्वावस्था की रंगकथा, 100 ग्राम जिंदगी, बाप का बाप दादा होता है, चित्त मैं जीता पट तू हारा....मुख्य है। 

विपिन कहते है कि‘ इन नाटको के माध्यम से मैंने समाज में फैली बुराई को दर्शाने और उसका निवारण खोजने का प्रयास के साथ साथ समाज को संदेश देने का प्रयास किया है।’ विपिन बुद्विजीवी है, रंगकर्मी है, और समाजसेवा करने का भी बीडा उठाया है। संस्था श्री साईं आशीर्वाद कृति के माध्यम से विपिन सेठी एक वृद्वाश्रम का निर्माण करने जा रहे है। उन्होंने बताया कि ‘अगर सब पर्याप्त लोग एक-एक असहाय व्यक्ति का बोझ उठा ले तो हमारे देश में ही क्या इस धरती पर कोई दुखी न हो। ’

विपिन सेठी ने बताया कि‘ मेरा एक ही सपना ह ैकि  मैं एक ऐसा वृद्वाश्रम का निर्माण करूँ जो किसी विशेष कौम का ना होकर सबके लिए होगा। संस्था वृद्वाश्रम का संचालन किसी से अनुदान या आर्थिक मदद ना लेकर इसका सारा खर्च स्वयं ही वहन करेगी। 

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