भोपाल, 16 अप्रैल, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आज समझाइश देते हुए कहा कि न्यायिक सक्रियता के कारण संविधान में शक्ति विभाजन की व्यवस्था कमजोर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने देश की अदालतों में बडी संख्या में मामले लंबित होने पर भी चिंता जताते हुए कहा कि इनके शीघ्र निपटारे की पहल होना चाहिए। श्री मुखर्जी ने यहां स्थित प्रतिष्ठित संस्थान राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के चतुर्थ रिट्रीट समारोह को संबोधित किया। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र के तीन मजबूत स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अपने दायरे में रहकर संतुलन के साथ काम करना चाहिए।
श्री मुखर्जी ने कहा कि अदालतों ने लोगों के अधिकार के लिए एक पोस्टकार्ड या अखबार में छपे लेख के आधार पर भी कार्रवाई की है। इससे आम आदमी को न्याय मिला है। राष्ट्रपति ने बताया कि वर्तमान में देश की अदालतों में लगभग तीन करोड मुकदमे लंबित हैं। देश के 24 उच्च न्यायालयों में ही 2015 में इनकी संख्या लगभग साढ़े 38 लाख है। हालांकि इनकी संख्या 2014 में साढ़े 41 लाख से अब थोड़ी कम हुई है, लेकिन अभी हमें लंबा रास्ता तय करना है। लंबित मामलों को बहुआयामी प्रयासों से जल्द निपटाना चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी और ई-गवर्नेंस इस दिशा में सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं। श्री मुखर्जी ने यह भी कहा कि अदालतें न्यायाधीशों की कमी से भी जूझ रही हैं। उच्च न्यायालय में स्वीकृत 1065 पदों के विपरीत मात्र 636 न्यायाधीश काम कर रहे हैं। 429 पद खाली पड़े हैं। उच्च न्यायालय अपने स्वीकृत पदों के मात्र 60 प्रतिशत के साथ काम कर रहे हैं। इस मौके पर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टी एस ठाकुर, केंद्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड़ा, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश ए एम खानविलकर सहित उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों के न्यायधीश और न्यायिक संस्थाओं से जुडे अनेक वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। राष्ट्रपति कल शाम यहां पहुंचे थे और रात्रि विश्राम उन्होंने यहां राजभवन में किया था। आज सुबह इस कार्यक्रम में शिरकत करने के बाद राष्ट्रपति वायुसेना के विशेष विमान से दिल्ली के लिए रवाना हो गए।

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