पटना 28 जुलाई 2016, भाकपा-माले के संस्थापक महासचिव काॅ. चारू मजूमदार की शहादत की 44 वीं बरसी पर आज भाकपा-माले परिवार ने पूरे राज्य में संकल्प सभा का आयोजन किया. विदित हो कि आज ही के दिन 1972 में काॅ. चारू मजूमदार की हत्या शासक वर्ग की पुलिस द्वारा कर दी गयी थी. राज्य कार्यालय में आयोजित संकल्प सभा में पार्टी के राज्य सचिव कुणाल, केंद्रीय कमिटी सदस्य काॅ. सरोज चैबे, वरिष्ठ नेता रमेश चंद्र पांडेय, राजाराम, उमेश सिंह, समकालीन लोकयुद्ध के सह संपादक प्रदीप झा, प्रबंध संपादक संतलाल, राज्य कमिटी सदस्य नवीन कुमार, प्रकाश कुमार, प्रो. अरविंद कुमार, मंजू देवी, विभा गुप्ता आदि उपस्थित थे. सबसे पहले काॅ. चारू मजूमदार के चित्र पर माल्यार्पण किया गया और उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी.
काॅ. कुणाल ने कहा कि शासक वर्ग ने काॅ. चारू मजमूदार की हत्या करके सोचा था कि भाकपा-माले आंदोलन को समाप्त कर दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका और आज पूरे देश में माले आंदोलन फैल चला है. आज जब इस देश में भाजपा की पूरी कोशिश है कि यहां भगवा राष्ट्रवाद कायम कर दिया जाए और हिंदुस्तान के चरित्र को बदल दिया जाए, तब काॅ. चारू मजूमदार की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. ऐसी काली ताकतों को चारू मजूमदार के ही रास्ते पर चलकर पीछे धकेला जा सकता है. काॅ. चारू मजूमदार ने एक मजबूत व समझौताहीन संघर्ष को संचालित करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण पर जोर दिया था. यही वह अस्त्र है, जो भाजपा को पीछे धकेलने का काम करेगी.
राजधानी पटना के अलावा राज्य के अन्य जिलों में भी संकल्प दिवस का आयोजन किया गया. बेउर जेल में काॅ. सुदामा पासवान के नेतृत्व में सैंकड़ों बंद माले समर्थकों ने काॅ. चारू मजूमदार के चित्र पर माल्यार्पण किया और पार्टी केा मजबूत बनाने का संकल्प लिया. इस कार्यक्रम में लगभग 200 लोगों की भागीदारी हुई. पटना जिला सचिव अमर ने नौबतपुर में आयोजित संकल्प सभा में भाग लिया. चितकोहरा पार्टी कार्यालय में भी संकल्प सभा का आयोजन किया गया. चितकोहरा में आयोजित कार्यक्रम में मुर्तजा अली सहित कई नेताओं ने भाग लिया.
प्रसिद्ध वामपंथी चिंतक व लेखिका महाश्वेता देवी के निधन पर भाकपा-माले ने दी श्रद्धांजलि
भाकपा-माले ने प्रसिद्ध वामपंथी चिंतक, सामाजिक कार्यकर्ता और मशहूर साहित्यकार महाश्वेता देवी के निधन पर गहारा शोक व्यक्त किया है और पार्टी परिवार की ओर से श्रद्धाजलि दी है. पिछले काफी समय से कोलकाता के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। महाश्वेता देवी लंबे समय से उम्र संबंधी समस्याओं से पीड़ित थीं। उन्हें लंबे समय से गुर्दे की और रक्त संक्रमण की समस्या थी। वे ज्ञानपीठ, पद्मश्री और मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित थीं। तीन दशक से ज्यादा समय तक आदिवासियों और वंचित समुदाय के बीच काम करती रहीं। उनके साहित्य का काफी हिस्सा आदिवासी समुदाय के जीवन पर आधारित था। यूं तो महाश्वेता देवी बांग्ला में उपन्यास लिखा करती थीं लेकिन अंग्रेजी, हिंदी और अलग अलग भाषाओं में अनुवाद के जरिए उनके साहित्य की पहुंच काफी व्यापक स्तर पर थी। उनके लिखे उपन्यासों पर कई फिल्में बनी हैं मसलन ‘हजार चैरासी की मां’ पर फिल्मकार गोविंद निहलानी ने फिल्म बनाई है। इसके अलावा ‘रुदाली’, ‘संघर्ष’ और ‘माटी माय’ भी ऐसा सिनेमा है जो महाश्वेता के उपन्यासों पर आधारित है। आदिवासी समुदाय और वंचित तबके ने आज अपना एक महत्पूर्ण मार्गदर्शक खो दिया है. उनकी कमी हमें सदा खलते रहेगी.

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