विशेष : वाह भाई वाह! ‘काम बोलता है’ - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 31 जनवरी 2017

विशेष : वाह भाई वाह! ‘काम बोलता है’

यूपी विधानसभा चुनाव की अब अपने शवाब पर है। हर गली, मुहल्ले, स्कूल, कालेज, अड़ियों व चाय की दुकानों पर राजनीति व नेताओं को लेकर तरह तरह की चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। कैसी हो हमारी सरकार, हमारी अपेक्षाओं पर कैसे उतरे खरी, हमारी समस्याओं को कैसे मिले समाधान, हमारे पास विकल्प क्या हैं ..आदि ज्वलंत सवालों चुनावी फिजा में तैर रहे हैं। लेकिन सबसे अधिक चर्चा के केन्द्र में है अखिलेश यादव का स्लोगन ‘काम बोलता है’। हाल यह है कि जैसे ही कोई अखिलेश का नाम लेता है लोग मोबाइल में लोडेड अपने गांव-गली, शहर की टूटी-फूटी सड़क, जलभराव, जर्जर पानी की टंकिया, उखडे बिजली के खंभे, जर्जर पुल, भटी नहर, सूखे हैंडपंप, उबड़-खाबड़ नाली, बिगड़े ट्यूबवेल, छतविहिन स्कूल, सूखा राहत के नाम पर मिले 200 से 500 रुपये के चेक की छायाप्रति हंस-हंस कर दिखाते हुए कहते है, ‘वाह भाई वाह‘ अखिलेश यादव का काम बोलता है 




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बेेशक, यूपी में इस वक्त हर शख्स के जुबान पर है, वाह-भाई-वाह! अखिलेेश यादव का ‘काम बोलता है‘। और फिर शुरु हो जाता है ठहाके लगाने का दौर, यह कहते हुए कि ‘काम कम अपराध, भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, बलातकार, फर्जी मुकदमें, रंगदारी वसूली, पुलिस-प्रशासनिक उत्पीड़न के वाकये अधिक बोलते हैं। समाचार पत्रों के कटिंग लहराएं जाने लगते है, जिसमें बाकायदा यादव सिंह से लेकर भ्रष्ट आइएएस अमृत त्रिपाठी आदि के एक-एक घपले-घोटाले, अपराधिक घटनाओं के आंकड़े, खनन माफियाओं के काले कारनामे, योजनाओं में विधायकों के बंदबाट, गांव-गली, शहर की टूटी-फूटी सड़क, जलभराव, जर्जर पानी की टंकिया, उखडे बिजली के खंभे, जर्जर पुल, भटी नहर, सूखे हैंडपंप, उबड़-खाबड़ नाली, बिगड़े ट्यूबवेल, छतविहिन स्कूल, सूखा राहत के नाम पर मिले 200 से 500 रुपये के चेक की छायाप्रति होती है। 

खास यह है कि चर्चा की शुरूआत मुजफ्फरनगर दंगे से होती है। जहां एक झटके में 62 से अधिक लोग मौत के घाट उतार दिए गए। कहा जाता है जिस वक्त हजारों लोग विस्थापित होकर टेंट में रह रहे थे, अखिलेश सैफई में सलमान खान का डांस देख रहे थे। ’मथुरा का रामवृक्ष कांड’ पर भी फोकस यह कहकर डाला जाता है कि 280 एकड़ सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटाने गई पुलिस टीम पर हमलाकर सपाई गुंडो ने एसपी और एसएचओ को मार डाला। जबकि 23 पुलिसवाले अस्पताल में जीवन-मौत से संघर्ष कर रहे थे। इसमें सारा खेल चाचा शिवपाल का रहा, जिनके संरक्षण में जवाहर पार्क में रामवृक्ष यादव ने कब्जा जमा रखा था। पूरी सेना बना रखी थी। पुलिस के साथ लड़ाई चली और 24 लोग काल कलवित हो गए। चर्चा यहीं नहीं थमती बात अखलाक को घर से खींचकर मार डालने की भी यह कहकर तंज कसा जाता है कि वाकये के दौरान अखिलेश सरकार ने अफसोस जताने के बजाय ऐसा रिएक्ट किया जैसे सरकार कहीं से भी इस मामले से जुड़ी नहीं है। 





एक-दो नहीं दो पत्रकार को जिंदा जलाने, आठ पत्रकारों की सपाई माफियाओं द्वारा की गयी हत्या, 100 से अधिक पत्रकारों पर फर्जी मुकदमें दर्ज कर घर-गृहस्थी लूटवाने की भी चर्चा यह कहकर होती है कि शाहजहांपुर के पत्रकार जगेन्द्र सिंह ने मरते हुए मंत्री का नाम लिया था। उन्हें जिंदा जलाया गया था। क्या वो मंत्री अभी जेल में है? माइनिंग को लेकर चर्चा में आयी गौतमबुद्धनगर की कलेक्टर दुर्गाशक्ति नागपाल ने जब खनन माफिया पर शिकंजा कसना शुरू किया तो उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। आईजी अमिताभ ठाकुर की पत्नी ने गायत्री प्रजापति के खिलाफ कंप्लेंट दर्ज कराई तो बदले अमिताभ को धमकियां मिलने लगीं। एक ऑडियो भी आया जिसमें पता चला कि खुद मुलायम सिंह यादव अमिताभ को धमका रहे थे कि जैसे एक बार पहले पीटे गये थे, वैसे ही पीटे जाओगे। नोएडा के चीफ इंजीनियर यादव सिंह पर सैकड़ों करोड़ की संपत्ति बनाने का आरोप लगा। पहले तो सरकार आना-कानी करती रही। फिर बाद में 2014 में सस्पेंड कर दिया गया। पर फरवरी 2015 में वन-मैन जुडिशियल इंक्वायरी बैठाई गई। क्योंकि इसे मैनेज करना आसान था। पुरानी पेंशन बहाली की मांग करने वाले शिक्षक की पिट कर हत्या कर दी गयी। 

क्या जनता इतना सब देखने के बाद भी समझ नही पा रही कि कौन जनता के लिए काम कर सकता है और कौन अपने और अपने परिवार के लिए। सीनियर रिपोर्टर दीपक शर्मा कहते है अगस्त 2013 की एक रात जब मुजफ्फरनगर जल रहा था तब जातिगत आधार पर शहर से डीएम और एसएसपी को एक फोन पर एक साथ हटा दिया गया। अगले तीन घंटो में नए अफसरों के हवाले एक जलता हुआ शहर सुपुर्द कर दिया गया। और अगली सुबह तक नफरत की धधकती आग कई लाशें निगल गयी। कुछ ऐसा ही खौफनाक हादसा जून 2016 को मथुरा में देखने को मिला। अंतर सिर्फ इतना था की यहां जातिगत फैसले की जगह मुद्दा जमीन पर कब्जे का था। लाशों के ढेर यहां भी लगे। इन खौफनाक हादसों से बढ़कर जुर्म के निशान और भी थे। कोतवालियों में घुसकर कहीं थानेदार मारे गए तो कहीं जिलाधिकारी की नाक के नीचे घरों पर कब्जे हुए। करोड़ों रूपए के खनन माफिया का खेल तो विक्रमादित्य मार्ग के बंगले से चल रहा था। गायत्री प्रजापति तो बस मोहरा थे। अगर आपकी जेब में पचास लाख रूपए थे तो आपको सिंचाई विभाग की मलाईदार कुर्सी मिल सकती थी। अगर आप नॉएडा एवम ग्रेटर नॉएडा को लूटकर अरबों की घूस सरकार से साझा कर सकते थे तो भले ही आप मायावती के नजदीकी रहे हों आपको यादव राज में भी चीफ इंजीनियर बनाया जा सकता था। आप मायावती के प्रमुख सचिव रहे हों तो कोई बात नही अगर आप सड़क के ठेकों से अंधी कमाई का फार्मूला जानते थे तो लखनऊ में 5 कालिदास मार्ग में आपको परमानेंट दफ्तर एलॉट हो सकता था। 

मुगल शासन के 300 साल बाद, पहली बार देश ने देखा की गद्दी को लेकर घरों में तलवारें कैसे खिंचती है। सत्ता को लेकर मंच पर हाथा पायी कैसे होती है और बाप, बेटे, चाचा और भाई सडकों पर एक दूसरे की पगड़ियां कैसे उछालते हैं। 300 साल पहले हमने रजवाड़ों की ये रंजिश आगरा के मुगलों में देखी थी और आज आगरा से 300 किलोमीटर दूर लखनऊ के कालिदास मार्ग पर यादव वंश में देखने का सौभाग्य मिला। 2 -2 लाख की पगार उठाने वाले टीवी एंकर तो ये मंजर भूल गए। अखबारों के मालिकों ने भी 150 करोड़ के विज्ञापन के आगे मुख्य पृष्ठ की सुर्खियों गिरवी रख दीं। लेकिन क्या यादव और मुस्लमान वोटरों को छोड़कर यूपी के सारे मतदाता ये मंजर भूल गए? खैर, इस यक्ष प्रश्न के उत्तर के लिए हमे 11 मार्च तक रुकना होगा। लेकिन बड़ा सवाल तो यह है कि क्या गठबंधन करने से पाप धुल जाते हैं? खुद अखिलेश ने भी 2012 में पिता मुलायम संग लंबी-चैड़ी फेहरिस्त के साथ घोषणा पत्र जारी किया था। बावजूद इसके किसान आधी रात को खेत की मेड़ पर बैठ बिजली आने की राह देखता है, तो छात्र लालटेन की रोशनी में अपनी आंख फोड़ने को विवश हैं, तो कल-कारखाने जनरेटर के भरोसे। सुबह रोजी-रोटी खातिर निकला व्यापारी से लेकर हर आम-ओ-शख्स रास्तेभर इसलिए हनुमान चालीसा पढ़ते हुए जाता है कि शाम तक सुरक्षित घर लौट सकें। 

सड़क, पानी, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का हाल यह है कि पुल, सड़कें बनने के चार माह बाद ही उखड़ गए, विद्यालयों की खंडहर बच्चों को डराते हैं। हैंडपंप के अभाव में कुंओं के दूषित पानी पीना गांव वालों की मजबूरी बन गयी है। शौचालय के लिए अब भी खेत व रेल पटरियां ही साधन हैं। अस्पतालों की दुर्दशा का आलम यह है कि योग्य चिकित्सकों के अभाव में इलाज से पहले मासूम की मौत बा पके कंधे पर ही हो जाती है। खास यह है कि इस दर्द को विधायक से लेकर मंत्रियों तक से शहर-गांव वाले बयां करते है। लेकिन होता कुछ नहीं। यानी बेहद छोटी-छोटी जरुरतों के अभाव में मुफलीसी की जिंदगी जी रहे लोगों को अगर कोई बड़े सपने दिखा दे ंतो क्या कहेंगे? मंत्री-संत्री इनकी बेवशी पर ठहाका लगाते हैं। यकीकन क्योंकि जिस गांव में खाने को लाले पड़े हैं उन्हें लैपटाॅप से लेकर स्मार्टफोन, बिजली-पानी, रोजगार, एक कमरे का मकान और दुधारु गाय भी मिल जायेगी। यानी हर राजनीतिक दल के मैनिफेस्टों को अगर यूपी के गांवों में लागू कर दिया जाय तो यूपी इतना रईश हो जायेगा कि अमेरिका भी पीछे हो जायेगा। तो फिर सवाल यही है क्या चुनाव से पहले फ्री की सौगात का वादा चुनाव जीतने की दिशा में सबसे कारगर हथियार है? क्या ऐसी घोषशणाएं वास्ताव में वोटरों पर प्रभाव डालती हैं? 





(सुरेश गांधी)

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