- माले राज्य कार्यालय सहित कई स्थानों पर दी गयी श्रद्धांजलि. माले राज्य सचिव ने कहा - एक प्रेरणादायक क्रांतिकारी यात्रा का अंत.
पटना 6 फरवरी 2017, वरिष्ठ भाकपा (माले) नेता व ऐपवा की सम्मानित राष्ट्रीय अध्यक्ष कामरेड श्रीलता स्वामीनाथन के निधन पर माले राज्य सचिव कुणाल ने गहरा शोक व्यक्त किया है. कल (राजस्थान) में 5 फरवरी की भोर में निधन हो गया. वे 74 वर्ष की थीं. कामरेड श्रीलता को 28 जनवरी की रात में ब्रेन स्ट्रोक हुआ था और उन्हें उदयपुर अस्पताल ले जाया गया था, जहां हृदय गति रुक जाने की वजह से उन्होंने अंतिम सांसें लीं. उन्होंने कहा कि उनकी मौत से एक प्रेरणादायक क्रांतिकारी यात्रा का अंत हो गया. उनकी मौत की खबर मिलते ही पार्टी कार्यालय पर झंडे झुका दिए गए. आज माले राज्य कार्यालय व जिला कार्यालय में उन्हें श्रद्धांजलि दी गयी. राज्य कार्यालय में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में माले राज्य सचिव कुणाल, केंद्रीय कमिटी सदस्य काॅ. बृजबिहारी पांडेय, काॅ. राजाराम, पटना नगर के सचिव अभ्युदय, प्रदीप कुमार, संतलाल, उमेश सिंह, अनिता सिन्हा, मधु, विभा गुप्ता, सुधीर सुमन, संतोष झा, समता राय आदि लोग उपस्थित थे. वहीं, पटना जिला कार्यालय में पार्टी नेता अमर, गोपाल रविदास आदि शामिल हुए. श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि कामरेड श्रीलता का जन्म 29 अप्रैल 1944 को चेन्नई में हुआ था. काॅलेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद वे दिल्ली आ गईं और उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में प्रवेश लिया. वहां से उत्तीर्ण होकर वे थियेटर की आगे पढ़ाई करने के लिये लंदन गईं. लेकिन 1972 में दिल्ली वापस आने के बाद उनके जीवन में निर्णायक मोड़ आया. वे भाकपा (माले) में शामिल हो गईं और उन्होंने दिल्ली के महरौली इलाके में कृषि-मजदूरों को संगठित करना शुरू किया. उन्होंने दिल्ली के होटल मजदूरों के बीच भी काम किया. इमरजेन्सी के दौरान वे गिरफ्तार हुईं और दस महीनों के लिये तिहाड़ जेल में कैद रहीं. इसके बाद उन्हें चेन्नई भेजकर वहां नजरबंद कर दिया गया. मगर कामरेड श्रीलता के लिये यह एक बार फिर बंदरगाह मजदूरों के बीच ट्रेड यूनियन कार्य में जुड़ जाने का मौका साबित हुआ.
1977 में इमरजेन्सी हटाये जाने के बाद श्रीलता दिल्ली वापस आईं और उन्होंने 1978 में राजस्थान को आधार बनाकर आदिवासियों, महिलाओं एवं विभिन्न मेहनतकश तबकों के लोगों के बीच काम करना शुरू किया, जिनमें ग्रामीण बंधुआ मजदूर और विस्थापित लोग शामिल हैं. इसके अलावा उन्होंने खनन क्षेत्र एवं अन्य विभिन्न उद्योगों के मजदूर बीच ट्रेड यूनियन में भी काम किया. अभिजात पृष्ठभूमि में जन्मी और पली-बढ़ी किसी महिला के लिये ग्रामीण राजस्थान को अपनी मार्क्सवादी सक्रियता का आधार क्षेत्र बना लेना अत्यंत साहसिक फैसला था, जो कामरेड श्रीलता के क्रांतिकारी जोश और राजनीतिक साहस को विशिष्ट रूप से दर्शाता था. जीवन की अंतिम सांस तक वे राजस्थान में गहरे जड़ जमाये बैठी सामंती-पितृसत्तात्मक शक्तियों एवं साम्प्रदायिक-माफिया गठजोड़ के खिलाफ क्रांतिकारी वामपंथी आंदोलन को शक्तिशाली करने तथा प्रगतिशील विचारों एवं मूल्यों का प्रसार करने में लगी रहीं. 1970 के दशक की शुरूआत में भाकपा (माले) को धक्का लगने के बाद कामरेड श्रीलता ने थोड़े समय के लिये कामरेड कानू सान्याल के साथ जुड़कर काम किया, मगर बिहार में आईपीएफ के उत्थान ने उनका ध्यान खींचा और अक्टूबर 1990 में दिल्ली की अत्यंत प्रेरणादायक आईपीएफ रैली के बाद कामरेड श्रीलता अपने पति एवं सहयोद्धा कामरेड महेन्द्र चैधरी एवं सैकड़ों अन्य कामरेडों के साथ भाकपा (माले) में शामिल हो गईं. उन्हें 1990 के दशक के मध्य में अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एशोसियेशन का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया.
भाकपा (माले) के अक्टूबर 1997 में हुए आयोजित वाराणसी महाधिवेशन में उन्हें केन्द्रीय कमेटी का सदस्य चुना गया और इस जिम्मेवारी को वे अप्रैल 2013 में हुए रांची अधिवेशन तक निभाती रहीं, जब स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उन्हें इस जिम्मेवारी से मुक्त किया गया. वे आॅल इंडिया सेन्ट्रल काउन्सिल आॅफ ट्रेड यूनियन्स की उपाध्यक्ष भी थीं. कामरेड श्रीलता अत्यधिक प्रतिभाशाली कार्यकर्ता थीं और उनमें विराट सृजनात्मक ऊर्जा भरी हुई थी, उनका उत्साह अनंत था और राजनीतिक इच्छाशक्ति अत्यंत प्रबल थी. वे जीवन की हर प्रतिकूलता के खिलाफ अपने विशिष्ट लचीलेपन और अतिशय विनोदपूर्ण स्वभाव के साथ लड़ीं. जब गिरते स्वास्थ्य की वजह से वे नवम्बर 2016 में आयोजित ऐपवा के राष्ट्रीय सम्मेलन में उपस्थित नहीं हो सकीं तो उन्होंने प्रतिनिधियों के लिये संबोधित एक गीत की रचना की और उसे सम्मेलन में सुनाये जाने के लिये आॅडियो क्लिप की शक्ल में भेज दिया. अपनी व्यापक दायरे की सोच और सक्रियता के चलते कामरेड श्रीलता भाकपा (माले) और प्रगतिशील लोकतांत्रिक विचारों एवं कार्यों में लगी विभिन्न धाराओं के बीच सेतु का काम करती थीं. उनके मन में प्रगतिशील उद्देश्य के लिये लड़ने वाली जनता के तमाम संघर्षों के प्रति बेहद सम्मान था और बिहार एवं झारखंड में भाकपा (माले) के नेतृत्व में चल रहे संघर्षों से वे अत्यधिक आशाएं रखती थीं. जनता के प्रति उनके मन में बेहद गहरी सम्वेदना थी और वे विभिन्न मोर्चों पर काम करने वाले अपने संगी कामरेडों के लिये दिल से सोचती थीं. कामरेड श्रीलता की शानदार विरासत हमें सम्मान, लोकतंत्र और सामाजिक मुक्ति के लिये उत्पीड़ित जनता के संघर्षों को आगे बढ़ाने में हमेशा प्रेरणा देती रहेगी. कामरेड श्रीलता स्वामीनाथन को लाल सलाम!
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