बिहार : सरकार की लापरवाही का नतीजा है मुजफ्फरपुर दर्दनाक सड़क हादसा : माले - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

बिहार : सरकार की लापरवाही का नतीजा है मुजफ्फरपुर दर्दनाक सड़क हादसा : माले

  • चंपारण सत्याग्रह मनाने वाली नीतीश सरकार पूरे बिहार में गरीबों को कर रही जमीन से बेदखल.
  • औपनिवेशिक कानून ‘कोर्ट आफ वार्डस’ को तत्काल रद्द करे सरकार.
  • भाकपा-माले का 10 वां महाधिवेशन 23-28 मार्च को पंजाब में - फासीवाद के असंदिग्ध उभार के खिलाफ व्यापक फासीवाद विरोधी जनप्रतिरोध खड़ा करने पर पार्टी कांग्रेस होगा केंद्रित

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पटना 27  फरवरी 2018, मुजफ्फरपुर के धरमपुर का दर्दनाक सड़क हादसा सरकार व जिला प्रशासन की लापरवाही का नतीजा है. मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी एनएच 77 के बीचोबीच स्थित धरमपुर में 9 बच्चों, जिसमें अधिकांश लड़कियां हैं, को भाजपा नेता के बेालेरो द्वारा रौंद कर मार दिए जाने की घटना महज संयोग नहीं है. यह बच्चों के प्रति बिहार सरकार के संवदेनहीन रवैये को जाहिर करता है. मुस्लिम व पिछड़ी जाति बहुलता वाले इस गांव में लंबे समय से ओवर ब्रिज तथा गांव के पूर्वी भाग में स्कूल बनाने की मांग होते रही है, लेकिन सरकार ने इसे लगातार नजरअंदाज किया. हादसे में कई बच्चे बुरी तरह घायल भी हुए हैं. नीतीश कुमार अपनी राजनीति के लिए बच्चों का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन बच्चे-बच्चियों के प्रति अपनी कोई जिम्मेवारी नहीं निभाते. शराबबंदी के नाम पर बच्चों को लाइन में लगाया गया, उसमें भी कई बच्चों की मौतें हुई थी. हाल में दहेज प्रथा उन्मूलन के सरकारी अभियान के तहत कड़कड़ाती ठंड में भी बच्चों को लाइन में लगाने का फरमान जारी किया गया था. लेकिन धरमपुर गांव के पूर्वी भाग में लंबे समय से स्कूल खोले जाने की मांग होते रही है, ताकि 400 बच्चों को एनएच पारकर दूसरी तरफ स्कूल न जाना पड़े, इस मांग को आज तक सरकार ने पूरा नहीं किया. आम लोगों की जिंदगी की सुरक्षा के प्रति सरकार कहीं से जिम्मेवार नहीं दिखती है और लोगों को अपने भरोसे छोड़ दिया है. इस घटना की जांच के लिए हमारी एक टीम ने घटनास्थल का दौरा किया. संवेदनहीनता की हद तो यह है कि घायल बच्चों का सही से इलाज भी सरकार नहीं करवा रही है. अधिकांश बच्चे गरीब परिवार से संबंध रखते हैं. लेकिन सरकार न तो घायल बच्चों का सही से इलाज करवा रही है और न ही परिजनों को आर्थिक सहयोग दिया जा रहा है.

चंपारण सत्याग्रह शताब्दी का ढोंग करने वाली नीतीश सरकार आज पूरे बिहार में गरीबों की बेदखली का अभियान चला रही है. इसका जीता जागता उदारहण खुद चंपारण है. चंपारण में आज भी अंग्रेजी राज का कानून चल रहा है. अंग्रेजों के समय में बेतिया राज की जमींदारी ‘‘कोर्ट आॅफ वार्डस’’ के अधीन थी, जो आज तक चली आ रही है. बिहार सरकार कह रही है कि उस जमीन को अधिग्रहित करने का अधिकार बिहार सरकार को नहीं है, इसलिए जमीन पर जो गरीब बसे हैं, उन्हें जमीन खाली करनी होगी. गरीबों को अतिक्रमणकारी बताया जा रहा है. उनकी बस्तियांे को उजाड़कर सरकार दरअसल लैंड बैंक बनाना चाहती है. जबकि बेतिया राज की महज 10-20 प्रतिशत जमीन पर ही गरीबों का कब्जा है. शेष 80 प्रतिशत जमीन तो चीनी मिलों, जमींदारों, बड़े भूस्वामियों के कब्जे में है. इस अवैध कब्जे पर सरकार एक शब्द नहीं बोलती. ठीक उसी प्रकार भूदान की जमीन की आज सरकार उलटी व्याख्या कर रही है. यहां पर गरीबों को जमीन से बेदखल करने के लिए सरकार कह रही है कि जमींदारों को तो जमीन दान करने का अधिकार ही नहीं था. इसलिए भूदान की जमीन पर गरीबों की बसावट असंवैधानिक है. और इस आधार पर उन्हें उजाड़ा जा रहा है. बेतिया राज की 30 एकड़ जमीन पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह ने भी कब्जा जमा रखा है. वहीं पटना में एक दलित की जमीन पर भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने अवैध रजिस्ट्री करवा ली है. कुल मिलाकर भाजपा-जदयू दलित-गरीबों को बेदखल करने पर आमदा है.

केंद्र व राज्य की सरकार लोक कल्याणकारी योजनाओं में लगातार कटौती कर रही है. केंद्रीय बजट में कारपोरेट घराने पर कोई भी नया टैक्स नहीं लगाया गया है. जबकि आज 1 प्रतिशत लोगों के हाथों में देश की 73 फीसदी संपत्ति संकेन्द्रित हो गयी है. प्रत्येक साल 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने वाली सरकार लगभग 4 लाख ऐसे पद खत्म करने जा रही है, जो पिछले पांच सालों से खाली हैं. इसकी वजह से पहले से ही बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं का संकट और बढ़ने वाला है. बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी वर्ष 2014-15 की तुलना में 6.15 प्रतिशत से गिरकर 3.48 प्रतिशत के अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है. जाहिर है मोदी सरकार अपने वादे के विपरीत शिक्षा व रोजगार के मद में लगातार कटौती कर रही है और छात्र-युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है.

बजट में स्कीम वर्करों को स्थाई करने व उन्हें सरकारी कर्मचारी का दर्जा देने, 18 हजार मासिक वेतन व 3 हजार पेंशन देने आदि सवालों को भी पूरी तरह अनसुना कर दिया गया है. जबकि स्कीम वर्कर अपनी मांगों को लेकर पिछले दिनों जबरदस्त रूप से आंदोलनरत रहे हैं और उन्हें आशा थी कि बजट 2018-19 में उनकी मांगों के प्रति केंद्र सरकार सकारात्क रूख अपनाएगी. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. नीरव मोदी मामले के उपरांत सरकार बैंकों के निजीकरण का तर्क गढ़ रही है. हम इसका विरोध करते हैं, और सरकार से मांग करते हैं कि बैंकों का पैसा हड़पे नीरव मोदी व उन जैसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई करे. भ्रष्टाचार पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाली मोदी सरकार भ्रष्टाचारियों को बचाने में लगी है. पार्टी का 10 वां महाधिवेशन 23-28 मार्च तक पंजाब में भाकपा-माले का 10 वां महाधिवेशन आगामी 23-28 मार्च को पंजाब के मानसा में आयोजित है. 23 मार्च को उद्घाटन सत्र में सभी वामपंथी दलों के प्रतिनिधियों के अलावा नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, आस्ट्रेलिया आदि देशों की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है. सम्मेलन में दलित आंदोलन के नेता व गुजरात से एमएलए जिग्नेश मेवाणी और विभिन्न जनांदोलनों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया गया है. हमारा यह पार्टी कांग्रेस देश में फासीवादी उभार को पीछे धकेलने के लिए व्यापक व कारगर फासीवाद विरोधी जनप्रतिरोध खड़ा करने की दिशा पर केंद्रित होगा.
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