बाॅका : गुजरे जमाने की यादें बनकर रह गयी हैं बौंसी मेले की नौटंकी - Live Aaryaavart

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बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

बाॅका : गुजरे जमाने की यादें बनकर रह गयी हैं बौंसी मेले की नौटंकी

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बौंसी(बाॅका)।मनोज कुमार मिश्र, 18-19वीं दशक से बौंसी मेले में नौटंकी का दौर प्रारंभ हुआ जो 1970 तक निर्बाध रूप से चलता रहा ।कानपुर की गुलाबबाई की नौटंकी कम्पनी पूरे भारत में मशहूर थी जो कलासंस्कृति एवं अपनी नृत्य कौशल के नाम पर लोगों के दिलों पर राज करती थी ।ऐसे थियेटरों का जुड़ाव राष्ट्रीय नाट्यकला एवं नृत्य अकादमी से होता था । गुलाबबाई नौटंकी का बौंसी मेले में खासा प्रभाव था , उनकी नर्तिकयाॅ शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ थी और प्रातः भगवान मधुसूदन की पूजा अर्चना करती थी । अपने प्रशंसकों का वे बड़ी अदब से खयाल रखती थी और तरन्नुम की अदा से मुस्कुराकर जवाब भी देती थी ।उस दौर में दर्शकों की मानसिकता भी साफसुथरी होती थी कोई अश्लील इशारे नहीं ना ही गंदी हरकतें । बौंसी मेले का सांस्कृतिक महत्व इतिहास में आज भी अपनी पवित्रता के लिये जानी जाती है ।फिर दूसरे दौर में  मिथिलांचल के जय बजरंग और श्री बजरंग थियेटर कम्पनियों ने इस मेले की बागडोर संभाली ।इन दोनों थियेटरों पर भोजपुरी फिल्मों का असर था ।उनदिनों विश्वनाथ शाहाबादी ने कई फिल्में बनाई थी जिसमें मधुर कर्णप्रिय संगीत की भरमार थी । हे गंगा मईया तोहरे पियरी चढ़ैबों सईयाॅ से करदे मिलनवां ...नाजिर हुसैन की फिल्म  लागी नाही छुटे राम  अशोक जैन की फिल्म गंगा किनारे मोरा गाॅव आदि फिल्मों ने इन थियेटरों पर अच्छा असर डाला ।नागिन , माॅ का कलेजा , लैला मजनू , शीरी फरहाद , सोहनी महिवाल के नाटकीय प्रस्तुति से मेले के दर्शक झूमते आनंदित होते थे ।कितनी सम्पन्न परम्परा रही है बौंसी मेले की , धरोहर बनती जा रही हैं इनकी यादें । अब बात करते हैं तीसरे दौर की जब समाज के चदुर्दिक चारित्रिक पतन का कलियुग पंख फैलाये सबकुछ लीलने की तैयारी कर रहा था । हम आज कै दौर की बात करते हैं जब थियेटर का परिवर्तन आईटम डाॅस और डीजे की कनफाड़ू बेसुरे संगीत और युवाओं को पथभ्रष्ट करनेवाली अश्लील प्रदर्शनों के रूप  में हो गयी है ।
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