बिहार : जब पुत्र वधुओं की इज्जत बचाने ससुर लगे गड्ढा खोदवाने - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

बिहार : जब पुत्र वधुओं की इज्जत बचाने ससुर लगे गड्ढा खोदवाने

  • सामुदायिक शौचालय निर्माण करने की जरूरत, बिंद प्रखंड के बीडीओ राकेश कुमार ग्रांउड स्तर की हकीकत जाने


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नालंदा. इस जिले में है बिंद प्रखंड.इसके जखौर नामक पंचायत में है जखौर गांव.नागेश्वर केवट और दुलारी देवी के पांच संतान हैं.सभी सुअर के बखोरनुमा घर में रहते हैं. बुर्जुग नागेश्वर केवट कहते हैं कि हमारे पास जमीन नहीं है.केवल आधा कट्टा जमीन है.कम जमीन पर ही छोटे-छोटे पांच रूम बना दिये हैं. बरामदा के कौने में चापाकल लगा दिये हैं. शौचालय नदारद है.वहां के तंग घरों में पांच पुत्र रहते हैं.अब सबकी शादी हो गयी है.उन्होंने कहा कि केदार केवट और सुनीता देवी के 2 लड़के और 3 लड़कियां हैं.त्रिवेणी केवट व सीमा देवी के 3 लड़के 1 लड़की है.वजीर केवट व किरण देवी के 2 लड़के व 2 लड़की है.शंभु केवट व सवीता देवी के 2 लड़के व 2 लड़की है और मनोहर केवट व रंजू देवी के 2 लड़के व 1 लड़का है.सभी मजदूर हैं. सभी अपने-अपने बाल-बच्चो के साथ कष्टकर जीवन बिता रहे हैं. हां बाल-बच्चों के मां-बाप समेत 30 जन खुले में शौचक्रिया करने जाते हैं. जो सरकार व गैर सरकारी संस्थाओं के लिये चुनौती है. आगे इसना कहना कि हमलोग अलग रहते है. वहां पर कुछ जमीन है. उसी जमीन के पश्चिमी कौने में गड्ढा खोदकर शौचालय बना रहे हैं.बता दें कि आजकल शौचालय को इज्जत घर भी कहा जाता हैं.यह घर बन जाने से पुत्र वधुओं की आबरू बच जाएगी. श्री नागेश्वर का कहना है कि अभी सभी परिवार के लोग 'अंलग' के किनारे शौचाक्रिया करने जाते हैं और वहीं पर बैठकर सोचते रहते हैं कि लोहिया स्वच्छ भारत मिशन व भारत स्वच्छता अभियान से शौचालय बनेगा? फिलवक्त ससुर द्वारा निर्मित गड्ढे में तबतक शौचक्रिया किया जाएगा. यहां के अनेक लोगों के पास शौचालय बनाने करने लायक जगह भी नहीं हैं तो कुछ लोग अंलग के किनारे शौचालय बना रहे है. जो बेहतर ढंग से नहीं बना है. एक सवाल के जवाब में लोगों का कहना है कि हमलोग एक चापाकल से पाँच परिवार पानी पी सकते हैं परंतु एक शौचालय में पाँच परिवार के सदस्य शौचक्रियाा नहीं करते हैं.इसके आलोक में लोगों का कहना है कि सामुदायिक शौचालय निर्माण हो. बिंद प्रखंड के बीडीओ राकेश कुमार से आग्रह किया गया है कि जमीनी हकीकत जानने गांव में आये.
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