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शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018

विशेष आलेख : शिक्षा कभी बाधा बनेगी, सोचा नहीं था

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हरियाणा के नूह जिले से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर बसा हैं रनियाला फिरोजपुर पंचायत और उसके पास ही दूसरी पंचायत है हमज़ापुर। दोनों ही पंचायत झिरका फिरोजपुर ब्लाक में पड़ते हैं । दोनों ही पंचायत में दो ऐसी महिलाएं बंटी व कुलसुम हैं जो पंचायत चुनाव में जाना चाहती थी, मगर शिक्षा का कानून आड़े आने से वह कुछ न कर सकीं। नूह मेवात क्षेत्र में जहाँ पर महिलाओं की सामाजिक स्थिति पुरुषों के मुकाबले दयनीय है वहीं इन महिलाओं पर शिक्षा के नियम कि वजह से दोहरी मार पड़ी है। एक तो इस क्षेत्र में महिलाओं को सम्मान पूर्वक जीने के लिए ही जद्दोजहद करनी पड़ती हैं, ऊपर से हरियाणा सरकार ने यह नियम लगा दिया कि जो व्यक्ति पांचवी, आठवीं और दसवीं पास नहीं होगा वह पंचायत चुनाव में नहीं जा सकता। 2011 की जनगणना के अनुसार हरियाणा में 65.94 प्रतिशत महिलाएं ही शिक्षित थीं। अगर हम मेवात में महिलाओं के शिक्षा दर की बात करें तो यह आंकड़ा 36.6 प्रतिशत ही है। फिरोजपुर झिरका ब्लाक के रनियाली फिरोजपुर ग्राम पंचायत में रहने वाली 30 वर्षीय बंटी अन्य पिछड़ा वर्ग से आती है। बंटी अशिक्षित हैं इसके बावजूद वह अपने परिवार को बहुत अच्छे से चलाती हैं। बंटी के परिवार में उनके पति के अलावा तीन बच्चें हैं। रनियाला फिरोजपुर कि आबादी तकरीबन 1700 है जिसमें महिलाएं तकरीबन नौ सौ हैं। पंचायत में 11 पंच हैं जिसमें तीन महिलाएं और बाकि आठ पुरूष हैं। बंटी के पति मज़दूरी करते हैं जिससे परिवार का गुज़ारा होता है। बंटी बताती है कि पिछले पंचायत चुनाव में उनके गाँव कि पंचायत सदस्य की सीट अनुसूचित जाति महिला के लिए आरक्षित थी। इस चुनाव में बंटी पंच के पद पर चुनाव लड़ना चाहती थी, मगर वह चुनाव नहीं लड़ पाई । बंटी के इसके पीछे सबसे बड़ी वजह बतातीं हैं कि, क्योंकि वह अनपढ़ थी इसलिए उनको चुनाव नहीं लड़ने दिया गया। मगर बंटी एक बड़ा सवाल उठाते हुए पूछती हैं कि क्या अनपढ़ व्यक्ति इन्सान नहीं होता ? जब कानून (सविंधान) उनको बराबरी का हक देता हैं, तो सरकार किस आधार पर हमारे साथ भेदभाव करती है? 

बंटी कहती हैं कि आजकल तो ऐसा चलन है कि अनपढ़ को कोई नौकरी के लिए भी नहीं पूछता। वह कहती है की शिक्षा का महत्व बिल्कुल है और लोगों को पढाई जरुर करनी चाहिए। बंटी सवाल उठाते हुए कहतीं है कि, शिक्षा का महत्व साधारण जीवन में तो ठीक है, मगर क्या यह सरपंच या पंच बनने के लिए जरुरी होना चाहिए ? वह फिर से एक सवाल उठाते हुए पूछती हैं कि क्या अभी जो सरपंच पढ़े लिखे है वह कितने काबिल हैं? क्या वह सभी सही से काम कर रहे हैं ? वह आगे कहती है कि 2015 में उनकी पंचायत की सरपंच दीपिका बन कर आई, मगर सरपंच का सारा का तो उनके पति महेंद्र ही देखते हैं। हमने बंटी से पूछा की यदि आप चुनाव जीत कर आती तो आप सबसे पहला काम क्या करतीं? जवाब में उन्होंने कहा की वह सबसे पहले गाँव के हर घर में पानी का कनेक्शन लगवाती, क्योंकि रनियाली फिरोजपुर गाँव में महिलाओं को पानी कि काफी किल्लत है। गाँव में शौचालय बनवाने का काम करती ,ग्राम सभा में महिलाएं नहीं आती तो मैं महिलाओं को ग्राम सभा की मीटिंग में आने के लिए प्रेरित करती। उनके मुताबिक उनके गाँव में महिलाएं ग्राम सभा कि मीटिंग में इसलिए भी नहीं जाती क्योंकि यहां पर पुरूष आपस में ही झगड़ने लगते हैं जिससे वह बचना चाहती हैं। इन्हीं कारणों के चलते महिलाओं की समस्याएं ग्राम सभा में जा ही नहीं पाती हैं। उनके मुताबिक पुरूष प्रधान समाज में जागरूक महिला को कोई सामने नहीं आने देता। अंत में बंटी कहती हैं कि मन तो करता हैं चुनाव लड़ने का मगर कानून रोकता है । 
          
कुछ इसी तरह की कहानी कुलसुम की है जोकि रनियाला के पास की पंचायत हमजापुर की रहने वाली है। कुलसुुम कि पंचायत हमजापुर भी ब्लाक फिरोजपुर झिरका में ही आती हैं । हमारी मुलाकात कुलसुम से पहली बार उसके घर पर नहीं बल्कि हॉस्पिटल में होती हैै। दरअसल कुलसुम हरियाणा में एक आशा वर्कर के तौर पर कार्य कर रही हैं और वह आशा वर्कर का मानदेय बढ़ाने के मांग को लेकर फिरोजपुर झिरका के मानिखेड़ा हॉस्पिटल के बाहर अपने अन्य साथियों के धरने पर बैठी थीं। 26 वर्षीय कुलसुुम के गाँव कि आबादी तकरीबन 1800 है जिसमें 600 महिलाएं होंगी। इस गाँव में कुलसुम पिछले 12 साल से अपने पति और अपने पांच बच्चों के साथ रहती हैं। 2015 के चुनाव में कुलसुुम सरपंच पद के लिए चुनाव लड़ना चाहती थी मगर वह सरपंच पद के लिए शैक्षिक योग्यता के नियम की वजह से ऐसा नहीं कर सकीं। हमजापुर पंचायत के मौजूदा सरपंच का नाम शाहिद है जोकि कक्षा 12 तक पढ़े-लिखे हैं। हमजापुर पंचायत में कुल आठ पंच हैं जिसमें पांच पुरूष व तीन महिला सदस्य हैं। कुलसुुम कहती हैं की उन्होंने एक आशा वर्कर के तौर पर लोगों कि काफी सेवा की हैं और इसी वजह से वह चाहती थी कि वह चुनाव में जाकर सरपंच का पद जीत कर लोगों की और सेवा कर पायें । मगर वह ऐसा इसलिए नहीं कर पाई क्योंकि उसके पास कक्षा 10 का प्रमाण पत्र नहीं था। कुलसुम ने एक आशा वर्कर के तौर पर अपने गाँव में तीन विधवा पेंशन, पैंतालीस लोगों के राशन कार्ड बनवाए, गर्भवती महिलाओं को सरकार से मिलने वाले तमाम फायदे, दो परिवारों को कन्यादान योजना के तहत, एक परिवार को 11 हजार और दूसरे परिवार को 22 हजार रूपये दिलवाए। 
           
कुलसुम के मुताबिक अभी भी उनके गांव में लोग खुले में शौच के लिए जाते हैं। सरपंच बनकर कुलसुम अपनी पंचायत को शौचमुक्त बनाना चाहती थीं। कुलशुम अपने गांव के उच्च प्राथमिक विद्यालय को माध्यमिक विद्यालय होते हुए देखना चाहती हैं। वह अपने गांव को जगमग करने के लिए एक और ट्रांसफार्मर लगवाना चाहती हैं ताकि उनके गांव में लोगों को बिजली की समस्या से निजात मिल सके। कुलसुुम के मुताबिक गांव में राशन डिपो वाला राशन देने में आना कानी करता हैै। इसके अलावा वह गांव वालों का नाम आॅनलाइन नहीं चढ़ा रहा है। कुलसुम का सपना सरपंच बनकर इन समस्याओं से पंचायत के लोगांें को निजात दिलाना था। मगर शैक्षिक योग्यता न होने के चलते कुलसुम अब कभी भी सरपंच नहीं बन सकेंगी। कुलसुम से जब पूछा गया की कि अनुभव अधिक महत्व रखता हैं या शिक्षा, इसका जवाब देते हुए वह कहती हैं कि इन कामों के लिए तो उनको शिक्षित होने की जरुरत नहीं पड़ी। वह आगे कहती हैं की अनपढ़ व्यक्ति अपने दिल से काम करता हैं, और उसमंे हकीकत में काम करने का जोश होता है। उनके अनुसार जिसके दिल में काम का जोश होता हैं वह काम करता हैं, उसको  कोई ताकत नहीं रोक सकती । 
        
पंचायत चुनाव में शैक्षिक योग्यता के नियम के बारे में कुलसुम अपनी राय रखते हुए कहती हैं कि उनको हैरानी होती है जो इस तरह के नियम बनाते हैं। इस तरह के कानून बनाने वाले एक तरह से खुद ही अनपढ़ होते हैं। उन्हें समझ ही नहीं होती कि ग्रामीण भारत में शिक्षा की क्या हालत है? वास्तव में इस तरह के कानून बनाने वालों को सबसे पहले खुद के लिए कानून बनाने चाहिए कि एमएलए, सांसद व मंत्रियों को कम से कम इतना पढ़ा-लिखा होना चाहिए तभी वह चुनाव लड़ सकते हैं। कुलसुम कहती हैं की वैसे वह कभी स्कूल नहीं गयी । मगर अपने इच्छा के बल पर वह आज हिंदी पढ़ लिख सकती हैं, और यदि वह अपनी इच्छा और लगन के दम पर ऐसा कर पाई हैं, तो वह सरपंची का काम क्यों नहीं कर सकतीं ? कुलसुम के मुताबिक उन्हें सरपंच के काम-काज के बारे में अच्छी तरह से पता है और वह उसको अच्छे से कर भी सकती हैं। कुछ इसी तरह की मिलती-जुलती राय बंटी ने भी इस शिक्षा के नियम के बारे में दी । बंटी के मुताबिक शिक्षा का यह नियम बना ही महिलाओं को रोकने के लिए हैं। उन्होंने इन नियम को बेकार बताते हुए कहा कि यदि वह अपने गाँव कि नस नस से वाकिफ हैं तो वह अपने गाँव का इलाज भी सबसे बेहतर ढ़ंग कर सकती हैं। वास्तव में शिक्षा के नियम की वजह से मेवात ही नहीं हरियाणा में बड़ी संख्या में महिलाएं, पंचायत चुनाव में प्रतिभाग करने से वंचित हो रही है। वास्तव में पंचायत चुनाव में योग्यता नियमों के बारे में सरकार को एक बार फिर विचार मंथन करने की ज़रूरत है। पंचायत चुनाव में योग्यता नियम इस तरह से होने चाहिए जिससे महिलाओं की स्थानीय शासन में भागीदारी पर कोई फर्क न पड़े।




(मुफीद खान)
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