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गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

विशेष आलेख : चुनौतियों के बीच में बनायी राह

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हरियाणा राज्य का पलवल ज़िला राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से तकरीबन 65 किलोमीटर की दूरी पर है।  गीता देवी पलवल के जनाचैली पंचायत की प्रधान हैं। हरियाणा, जहां आज भी स्त्रियों को खुले में सांस लेने की आज़ादी नहीं है, आज भी जहां महिलाएं बंधनों से मुक्त नहीं हैं, ऐसे राज्य की एक पंचायत की प्रधान गीता देवी परंपराओं के सारे बंधनों को ताक पर रखकर अपनी पंचायत की सिरमौर बनी हुई है। हालांकि वह आधुनिक उच्च शिक्षा से लैस हैं ,पर प्रधानी की यह राह उनके लिए न आसान है और न ही सहज थी। गीता एम.ए. व बी.एड. हैं। उनका सपना किसी सरकारी स्कूल में शिक्षिका बनकर बच्चों के भविष्य की राह को संवारना था, पर अपने गांव की बदहाली और गंदगी ने उनकी राह शिक्षा से पंचायत की ओर मोड़ दी। 
      
जनाचैली में गंदगी, अशिक्षा और रूढ़ियों ने लोगों के जीवन को बदतर बना रखा था। यहां वहां कूड़े के ढेर लगे थे, लोग खुले में शौच जाते थे और औरतें घर के भीतर घूंघट में जकड़ी हुई थीं। गीता ने इसे बदलने का बीड़ा उठाया। अच्छी बात यह रही कि इस काम में उनके पति व परिवार ने उनका साथ दिया। गीता के परिवार में कुल छह सदस्य हैं। गीता ने शीघ्र ही महसूस किया कि व्यापक स्तर पर गांव की दशा में बदलाव लाने के लिए शासन के स्तर पर काम करने की ज़रूरत है। संयोग से जनाचैली की सीट ‘महिला सीट’ थी। गीता 2016 में सरपंच के पद पर चुनाव में खड़ी हुईं, जीतीं और सरपंच बनीं। 
         
जनाचैली में तकरीबन 48 प्रतिशत आबादी महिलाओं की है। यहां महिला को प्रधान या सरपंच पद के लिए केवल चुना भर जाता है, लेकिन पंचायत प्रतिनिधि के तौर पर पंचायत के सारे काम और निर्णय उस महिला का पति या घर का कोई और पुरुष सदस्य करता है। प्रधान पति ही ब्लॉक में होने वाली बैठकों में हिस्सा लेते हैं, और निर्वाचित महिला सरपंच को घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं होती। गीता से पहले जनाचैली की सरपंच रामवती थीं। परंपरा अनुसार रामवती अपने घर की जिम्मेदारियां उठाती थीं और उनके पति इंदर प्रधान प्रतिनिधि के तौर पर पंचायत के काम करते थे। ऐसे में गीता ने एक स्वतंत्र स्वावलंबी महिला सरपंच के तौर पर पंचायत में काम करने का न केवल उदाहरण प्रस्तुत किया बल्कि अपनी पंचायत का रूप ही बदलकर रख दिया। 
अपने दो साल के कार्यकाल में उन्होंने गांव में कई बदलाव किए। जनाचैली में लोग खेतों व जंगलों में शौच के लिए जाते थे। गीता ने हर घर में शौचालय बनवाए तथा लोगों को शौचालय का उपयोग करने के लिए प्रेरित व जागरूक किया। आज जनाचैली खुले में शौच जाने के कलंक से मुक्ति पा चुका है। सरकारी स्कूल के शिक्षा स्तर में सुधार किया और बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ा। गाँव के स्कूलों में पहली बार बच्चों के लिए कंप्यूटर मुहैया कराए गए, साथ ही प्रिंटर भी लगवाएं। गाँव में बिजली की समस्या थी इसलिए उन्होंने स्कूलों के लिए इन्वर्टर भी लगवाए ताकि बच्चों की तकनीकी शिक्षा में कोई बाधा न आये। गांव के खस्ताहाल आंगनबाड़ी की मरम्मत कराकर उसे ठीक कराया। गांव में पानी की व्यवस्था को बेहतर किया। इस तरह जनाचैली आज एक आदर्श गांव बना और उसे मॉडल विलेज चुना गया है। गाँव में पिछड़ी जाति और पिछड़े लोगों के लिए काम करने के हेतु सरकार ने गीता को पचास हज़़ार रूपये का इनाम दिया है। गीता के काम करने का तरीका पारंपरिक पंचायत नेताओं से अलग है। वह देश की शायद इकलौती ऐसी प्रधान हैं जो अपने क्षेत्र के स्कूलों से लेकर गांवों में अचानक दौरे करती हैं और चल रहे कामों का जायजा लेती हैं। 
           
बतौर महिला सरपंच गीता के लिए भी चुनौतियां कम नहीं रहीं। हरियाणा अपनी उग्र रूढ़िवादी सोच के लिए कुख्यात है। यहाँ के गांवों में गाँव का मालिक या गाँव की सरकार “पुरुष” होता है और, यह परम्परा उस सोच को नकार देती है, जिसमें महिलाओं को सशक्त करने के लिए उन्हें ग्राम पंचायत में प्रधान बनने का मौका दिया जाता है। ऐसे में स्वतंत्र रूप से काम करना, निर्णय लेना और कामों पर नजर रखना उनके लिए भी आसान नहीं था, पर गीता ने अपना हौसला और हिम्मत को झुकने नहीं दिया, संघर्ष के बीच में भी समाधानों के लिए सोचती रहीं। उनका मानना है कि किसी को बदलने के लिए पहले खुद को बदलना होता है। उन्होंने ऐसा किया भी। अपने गाँव में घूघंट प्रथा को खत्म करने के लिए उन्होंने पहले खुद घूंघट करना बंद किया। अन्य महिलाओं से इस पर बातचीत जारी रखी। क्रमशः गाँव की अन्य महिलाओं ने अपने घरों में इस बात को रखा और महिलाओं ने घूंघट करना बंद कर दिया। अब गाँव की बड़ी बुजुर्ग महिलाएं भी घूघंट नहीं करती। जनाचैली की महिलाओं के बीच में यह चर्चा अब भी आम है  कि घूंघट एक अभिशाप है। इस अभिशाप के पर्दे से वह आज तक अक्सर ठोकर खाकर गिरती रही हैं। लेकिन कभी घूंघट हटाने साहस नहीं कर पायीं। अब वह इस प्रथा को छोड़ चुकी हैं और इसका सारा श्रेय वह अपनी वर्तमान सरपंच गीता देवी को देती हैं जिनके प्रयासों से वह इसका विरोध करने का साहस जुटा पायीं। 

गीता, सरकार के महिलाओं को पंचायत में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के फैसले का शुक्रिया अदा करती हैं। वह सरकार के सरपंच की शैक्षिक योग्यता का निर्धारित करने वाले सरकार के फैसले का भी स्वागत करती हैं। वह कहती हैं कि इन दो वजहों से ही वह सरपंच बन पाईं। एक तो उनके गाँव की सीट महिला के लिए आरक्षित थी और फिर वह उस शैक्षिक योग्यता की शर्त को भी पूरा करती हैं जिसको सरकार ने अनिवार्य बताया है। इसीलिए वह आज सरपंच बन सकी हैं वर्ना हरियाणा के समाज में किसी अन्य स्थिति में यह मुमकिन नहीं था क्योंकि हरियाणा का समाज एक बंद समाज है। 
           
गीता पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी की प्रस्तावित सरकारी नियमावली के पक्ष में हैं। हालांकि वह यह मानती हैं कि इससे महिलाओं की भागीदारी घटेगी। कई महिलाएं पंचायत स्तरीय शासन में भाग लेने से वंचित हुई हैं लेकिन वहीं दूसरी तरफ कुछ और महिलाओं को पंचायत स्तरीय शासन से जुड़ने का अवसर मिला है, खासतौर पर युवा महिलाओं को। जनाचैली की यह सरपंच राष्ट्रीय स्तर की योगा प्रैक्टिशनर भी रह चुकी है और पलवल के गांवों में फ्री योग सेंटर भी चलाती है जिसमें महिलाओं को अच्छी सेहत रखने के हुनर सिखाये जाते हैं।





(जितेश पोसवाल)
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