विशेष आलेख : बिन पंची और सरपंची केला देवी की महिला उत्थान सेवा - Live Aaryaavart

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रविवार, 15 अप्रैल 2018

विशेष आलेख : बिन पंची और सरपंची केला देवी की महिला उत्थान सेवा

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हरियाणा के सबसे पिछड़े जिलों में से एक जिला नूह मेवात है, जहाँ पर 80 प्रतिशत आबादी मुस्लिम समुदाय से है। नूह मेवात के पुन्हाना ब्लाक की ग्राम पंचायत रायपुर में केला देवी रहती हैं। आयु के 42 वसंत देख चुकी केला देवी पंचायत के किसी अधिकारिक पद से नहीं जुड़ी हैं पर वह रायपुर ग्राम पंचायत में अपने दम पर महिलाओं की बेहतरी के लिए काम करती हैं। राजस्थान के भरतपुर जिले के जूरहेडी गांव से केला देवी ने पांचवीं तक की शिक्षा हासिल की है। विवाह के बाद से वह रायपुर में रहती हैं। अनुसूचित समुदाय के सात सदस्यों वालेे उनके परिवार की आय का साधन दैनिक मजदूरी है। वह खुद लोगों के यहां मजदूरी करती हैं और उनके पति राज मिस्त्री का काम करते हैं। परिवार की मासिक आय लगभग 4000-5000 रूप्या है। केलादेवी अपने सभी बच्चों को शिक्षा दे रही हैं ताकि वह अपने पैरों पर खड़े हो सकें तथा अपने गांव देश के लिए कुछ काम कर सकें। केला देवी घूंघट नहीं करतीं। नूह और पुन्हाना में वह खेल प्रतियोगिता में भाग ले चुकी हैं और विजयी भी हुई थीं। परिवार के बुज़ुर्गों को यह बात अच्छी नहीं लगी थी। केला ने इस बात का विरोध किया कि महिलाओं की प्रतिभा को आगे बढ़ने से क्यों रोका जाए? केला अपनी बेटियों को भी खेल कूद में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के लिये कहतीं हैं । 

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केला देवी अपने काम, अपनी बेबाकी और बेधड़क अंदाज की वजह से गाँव में अपनी एक अलग ही पहचान बना चुकी हैं। पिछले 10 बरसों से केला देवी गाँव में न सिर्फ औरतों की बेहतरी के लिए बल्कि नाबालिग बच्चियों की शादियों के खिलाफ और लड़कियों की शिक्षा के लिए कार्य कर रही हैं। गाँव के सरपंच इकबाल का कहना है कि केला देवी एक कमाल की महिला हैं। उनको अपना काम करने के लिए किसी सहारे की जरुरत नहीं, वह जिस काम को शुरू करना चाहती हैं उसे अपने बल पर करती हैं। सत्र 2010 में जब पंचायत में कुछ पंचायत सदस्य की सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं तो केला देवी ने पंच पद के लिए चुनाव मंे प्रतिभाग किया था पर जातीय समीकरणों की वजह से वह चयनित नहीं हुई। लेकिन वह फिर भी महिलाओं के लिए तथा अन्य मुद्दों पर लगातार काम कर रही हैं। उनके 3500 की आबादी वाले गाँव के लिए केवल एक ही राशन डिपो हैं, और उसमें भी गाँव वालों को राशन छह महीने में एक बार ही मिलता था, जिसको लेकर केला देवी ने आवाज उठाई और राशन मिलने की प्रक्रिया को तेज किया। रायपुर के निवासियों के मुताबिक आज उनको कम से कम हर दूसरे महीने राशन मिल जाता हैं । 

नाबालिग बच्चियों की शादी रोकने के लिए केला देवी ने अपने गाँव में महिलाओं से बात की, गाँव वालों के साथ मिलकर गाँव में रैली भी निकाली और रैली में उन्होंने सभी को जल्दी शादी से होने वाले नुकसानों के बारे में भी अवगत कराया। यह कैला देवी के ही प्रयास हैं जिसकी वजह से रायपुर गाँव में नाबालिग शादियों में कमी आयी है। केला देवी इस समस्या को जड़ से खत्म करना चाहती हैं  इन दिनों केला देवी फिलहाल गाँव के सरपंच के साथ मिलकर स्कूल में अध्यापकों की कमी को पूरा करवाने की दिशा में काम कर रही हैं । रायपुर गाँव में 8 वीं तक का ही स्कूल है, जिसके लिए केला देवी ने सरपंच से मिलकर गांव के स्कूल को कक्षा 12 तक करवाने की पहल की। केला देवी गांव में लोगों को मिलने वाले लाभ पर नज़र रखती हैं। यदि कहीं किसी व्यवस्था में कोई गड़बड़ होती है तो वह तुरन्त उस पर काम करती हैं। गाँव की आंगनबाड़ी में काम नहीं होता था। केला देवी ने उसकी शिकायत करके आंगनबाड़ी को गाँव के स्कूल में ही शिफ्ट करा दिया, अब आंगनबाड़ी में काम होता है। स्कूल के प्रधानाचार्य व अध्यापक समय समय पर आंगनबाड़ी के कामों का जायज़ा लेते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि आंगनबाड़ी के सब काम ठीक से होते रहें। रायपुर गांव में मुस्लिम आबादी अधिक हैं और उनके गाँव में अनुसूचित जाति और मुस्लिम परिवारों में लड़कियों की शिक्षा का स्तर बहुत ही कम है, जिसके लिए वह लगातार घर घर जाकर उनके परिवार वालों से बात कर रही हैं ताकि वह अपनी बच्चियों को स्कूल भेजने लगे । 
      
मध्य प्रदेश के मंत्री गोपाल भार्गव ने कहा है कि आरक्षण के कारण भारत माता पिछड़ी हुई है। कल उनके प्रधानमंत्री आरक्षण की वकालत कर रहे थे।
पिछले चुनावों में कैला देवी एक बार फिर से पंचायत में पंच पद के लिए चुनावों में प्रतिभाग करना चाहती थीं किन्तु नई सरकारी नियमावली के कारण वह चुनाव में प्रतिभाग नहीं कर पायीं। रायपुर पंचायत में यह परम्परा है कि गाँव के लोग निर्विरोध अपना प्रतिनिधि चुन लेते हैं जिससे गाँव का सौहार्द बना रहता है । इस परम्परा को पिछले साल भी बरकरार रखा गया था और गाँव के लोगों ने पहले केला देवी का नाम पंच पद के लिए प्रस्तावित किया था, किन्तु उनके पास पांचवीं पास होने का प्रमाण-पत्र नहीं था इसलिए केला देवी पंच के पद के लिए उपयुक्त नहीं रहीं। उन्होंने अपनी देवरानी का नाम पंचायत सदस्य के तौर पर दिया जिसको गाँव वालों ने सम्मान देते हुए मान लिया और उनकी देवरानी गाँव के चार महिला पंचों में से एक पंच बन गयीं । केला देवी कहती हैं कि सरकारी व्यवस्था को इससे कोई मतलब नहीं कि मैं पढ़ लिख सकती हूँ या नहीं उनको तो इसके लिए मेरे पढ़े लिखे होने का प्रमाण चाहिए। उनका प्रश्न है कि क्या यह कानून केवल पंचायत स्तर के लिए ही है या विधान सभा और संसद के लिए भी यही नियम लागू है। वह कहती हैं कि नियम सबके लिए बराबर होने चाहिए। केला देवी मानती हैं कि बिजली चोरी रोकने के लिए बिल पूरा जमा करवाना और अपराधियों को रोकने के लिए थाने से प्रमाण पत्र मांगना तो ठीक शर्ते हैं, मगर पंचायत चुनाव में शैक्षिक योग्यता की शर्त ठीक नहीं है। इसकी वजह से काफी महिलाएं चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित हो रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की शिक्षा की स्थिति वैसे कोई बहुत अच्छी नहीं है। बेटियों की शिक्षा में बहुत सी अड़चने आती हैं। वह बताती हैं कि उनके पड़ोस में ही एक बच्ची की माँ गुजर जाने के बाद उसके पिता ने बच्ची का स्कूल छुडवा दिया, और बच्ची दसवीं से आगे नहीं पढ़ सकी। मजबूरी या परिस्थितिवश ऐसा कई बार होता हैं कि लड़की पढ़ ही न पाए, लेकिन उसका असर पूरी जिंदगी में तरह तरह से उसके सामने आता है और उसकी भूमिका कई क्षेत्रों से कटती जाती है। कैला देवी इसका जीता जागता उदाहरण हैं जो शैक्षिक योग्यता न होने के चलते पंच के चुनाव के लिए नहीं जा सकीं। राज्य में कैला देवी जैसी महिलाओं की एक बड़ी तादाद है जो शैक्षिक योग्यता न होने के चलते पंचायत चुनाव में प्रतिभाग करने से वंचित रह गयीं। कैला देवी के मुताबिक सरकार को पंचायत चुनाव में शैक्षिक योग्यता के नियम पर पुर्नविचार करने की ज़रूरत है।







(मुफीद खान)
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