विशेष : श्री कृष्ण जन्म अन्याय के विरुद्ध युद्ध के लिये। - Live Aaryaavart

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सोमवार, 3 सितंबर 2018

विशेष : श्री कृष्ण जन्म अन्याय के विरुद्ध युद्ध के लिये।

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बेगूसराय (अरुण कुमार), भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है।  ' द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और बन्दी बनाकर स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था।  एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था।  रास्ते में आकाशवाणी हुई- 'हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ।  तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?'  कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।  वसुदेव से देवकी को एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला।यहाँ कंश की मूढ़ता ही कही जाएगी जब आकाशवाणी आठवें बच्चों की हुई तो पहला,दूसरा आदि क्रमशः सातवां तक के बच्चों का वध क्यों?खैर ये प्रभु लीला है अपनी लीला आप ही जानें।वैसे इसकी भी कहानी बड़ी ही दिलचस्प है,विस्तार होने के ख्याल से वर्णन नही कर रहा हूँ।फिर कभी:-फिलहाल अब आता हूँ आठवें बचवहा के जन्म पर।आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ 'माया' थी। 

जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।  तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको उसपार जाने का मार्ग दे देगी।'  उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।  अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है।  उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथों में नवजात कन्या को देख विस्मित तो हुआ परन्तु मृत्यु भय से उस कन्या को भी छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।' यह है कृष्ण जन्म की कथा।फिर कंश,कालिया नाग,पूतना आदि का नाश करते हुए महाभारत में अर्जुन के रथ का रथी बन अन्याय पर न्याय को विजयश्री का माल्यार्पण किया।हाँ इसमे बरबरी के साथ कुछ अन्याय स्वयं कृष्ण के द्वारा ही होता है जिसका परिमार्जन स्वयं श्री कृष्ण बरबरी के हाथों ही मरकर हिसाब बराबर कर दिया।श्री कृष्ण न्याय के लिये ही अवतरित हुए थे।या यूँ कहें जब जब धर्म की हानी हुई तब तब प्रभु स्वयं विष्णु ने अनेक रुप धारण कर अवतार लिया है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तादात्मानं सृजाम्यहम।।4-7।।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।4-8।।

प्रभु कहते हैं जब जब पृथ्वी पर धर्म की हानि और  अधर्म बढ़ेगा तब तब मैं सज्जनों की रक्षा और अधर्मियों का नाश करने के लिये तथा धर्म की स्थापना के लिये मैं हर युग में जन्म यानि प्रकट होता रहूँगा।

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