बिहार : कोसी क्षेत्र में मखाना कॉरीडोर विकसित किया जाएगा : डॉ पारसनाथ - Live Aaryaavart

Breaking

शनिवार, 15 सितंबर 2018

बिहार : कोसी क्षेत्र में मखाना कॉरीडोर विकसित किया जाएगा : डॉ पारसनाथ

- मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डाॅ अनिल कुमार की टीम लगातार सर्वेक्षण का कार्य कर रही है, कोसी क्षेत्र में मखाना कॉरीडोर विकसित करने में कृषि महाविद्यालय पूर्णिया की अग्रणी भूमिका होगी

makhana-will-develop-in-kosi- paswan
कुमार गौरव । पूर्णिया : भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के द्वारा पांच दिवसीय आत्मा, दरभंगा बिहार द्वारा प्रायोजित मखाना उत्पादन एवं प्रसंस्करण तकनीक विषय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। पांच दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ कृषि महाविद्यालय पूर्णिया की स्नातक कृषि की छात्राओं के स्वागत गान के द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर विधिवत उद्घाटन मुख्य अतिथि डाॅ पारसनाथ सह अधिष्ठाता सह प्राचार्य भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय एवं विशिष्ट अतिथि परियोजना निदेशक, आत्मा सुधीर कुमार राय तथा उपस्थित किसानों, वैज्ञानिकों के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। अतिथियों द्वारा प्रत्येक प्रशिक्षणार्थियों को बिहार कृषि विवि सबौर द्वारा प्रकाशित बिहार किसान डायरी 2018 प्रदान की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते प्राचार्य ने सभी मुख्य अतिथियों का फूलों का गुलदस्ता प्रदान कर स्वागत किया। अपने स्वागत अभिभाषण में प्राचार्य ने भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के सात वर्षों के सफर की विस्तृत जानकारी दी। जिसमेें महाविद्यालय में कृषि शिक्षा, शोध, प्रसार एवं प्रशिक्षण के साथ साथ अन्य गतिविधि मसलन राष्ट्रीय सेवा योजना, एनसीसी, रेड रिबन क्लब, एंटी ड्रग क्लब, साहित्यिक एवं वाद विवाद परिषद, हिंदी चेतना मास, स्वच्छता ही सेवा अभियान के द्वारा किए गए कार्यों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भविष्य में जल्द से जल्द कोसी क्षेत्र में मखाना कॉरीडोर विकसित किया जाएगा। जिसके लिए मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डाॅ अनिल कुमार की टीम लगातार सर्वेक्षण का कार्य कर रही है। कोसी क्षेत्र में मखाना कॉरीडोर विकसित करने में कृषि महाविद्यालय की अग्रणी भूमिका होगी। केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे कौशल विकास मिशन के पाठ्यक्रम में बिहार कृषि विवि, सबौर के प्रयास से मखाना विषय पर 240 घंटे का प्रशिक्षण कार्यक्रम को सम्मिलित करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया है। जिसका अनुमोदन हो गया है। 

...किसानों को मिले प्रशिक्षण : 
दरभंगा के किसान श्याम कुमार सहनी एवं नरेश कुमार मुखिया ने मखाना कृषकों की समस्या पर चर्चा करते हुए मखाने की उन्नत किस्में, बीज की उपलब्धता, बोहराई यंत्र व लावा निकालने की मशीन के विकास के साथ साथ अन्य फसलों की तरह मखाने की फसल को सरकारी अनुदान में शामिल करने की बात कही। उन्होंने कहा कि मखाना फसल के साथ मछली पालन हम सभी किसानों के लिए काफी लाभकारी होगा। किसानों को इस प्रकार का प्रशिक्षण समय समय पर सरकार द्वारा मिलता रहे तो सूबे के सभी मखाना उत्पादक किसानों को लाभ मिलेगा। 

...मखाने के साथ मछली का किसान करें उत्पादन : 
परियोजना निदेशक, आत्मा, पूर्णिया सुधीर कुमार राय ने बताया कि कोसी क्षेत्र में मखाने की अपार संभावनाएं है। मखाना किसानों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करना एक सराहनीय प्रयास है। उन्होंने बताया कि मखाने की खेती में सबसे बड़ी समस्या खेत से मखाना बीज की बुहराई एवं बीज से लावा बनाना। जिसमें एक समस्या के निदान के लिए मखाना आधुनिक प्रसंस्करण यंत्र की स्थापना कृषि महाविद्यालय पूर्णिया में की जा चुकी है। आत्मा द्वारा संचालित किसानों की कल्याणकारी योजनाओं के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी व मखाना उत्पादक संघ गठित करने की सलाह दी। मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डाॅ अनिल कुमार ने कहा कि सरकार द्वारा मखाना फसल क्षेत्र के विस्तार एवं सही तरीके से खेती की पद्धति में मछली को शामिल कर किसानों की आय को दोगुना करने का एक अच्छा माध्यम हो सकता है। उन्होंने महाविद्यालय द्वारा विकसित मखाने की प्रजाति सबौर मखाना-1 का कोसी क्षेत्र के किसानों के द्वारा अपनाकर पुरानी पद्धति से अधिक लाभ प्राप्त किया जा रहा है। यदि किसान तालाब पद्धति में मखाना के साथ मछली पालन को अपनाएं तो अधिकाधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

...किसानों को जागरूक व संगठित होने की है जरूरत : 
वहीं तकनीकी सत्र में मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डाॅ अनिल कुमार ने नगदी फसल के रूप में मखाना सह मछली की खेती : संभावना एवं महत्व विषय पर चर्चा करते हुए कहा कि खासतौर पर सूबे में देश की आजादी के कई वर्षों बाद भी हमारे किसान भाई अपने हकों की रक्षा के लिए न तो जागरूक हो पाए और न ही संगठित। इसलिए वर्तमान परिवेश में किसानों को स्वयं जागरूक होकर विभिन्न कृषि की संस्थाओं से योजनाओं व प्राप्त होने वाले लाभ को प्राप्त कर अपने सामाजिक आर्थिक विकास की बात सोचने की जरूरत है। मखाना सह मछली पालन कर किसान एक ही समय में अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। किसानों को अपने मखाना एवं मछली का अच्छा लाभ प्राप्त करने के लिए एक उद्यम के रूप अपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए बिहार सरकार द्वारा बनो उद्यमी अभियान की शुरूआत की गई है। जिसमें सरकार की विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी प्रदान की जा रही है। मखाना सह मछली पालन के लिए एक कंपनी बनाकर अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जिसमें कंपनी चलाने के लिए शेयर एवं शेयर धारकों का होना बहुत ही जरूरी है। हम सभी चाहते हैं कि बिचैलियों को हटाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। हम सभी किसान बिचौलियों को अपना उत्पाद औने पौने मूल्य पर बिक्री कर देते हैं। लेकिन जब अपने उत्पाद का उचित मूल्य प्राप्त करने के लिए स्वयं को खड़े होने की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं या अपने आपको असहाय महसूस करते हैं। 

...मखाना कंपनी से किसानों को ये होगा लाभ : 
- मखाना उत्पादक कंपनी मखाना के साथ साथ अन्य फसलों के लिए खाद, बीज, कीट एवं व्याधिनाशक रासायनिक दवा थोक दर उचित मूल्य पर उपलब्ध कराएगी। जिसका उत्पादन लागत काफी कम होगा।
- महाविद्यालय के वैज्ञानिकों के दल की देखरेख में वैज्ञानिक तरीके से मखाना सह मछली उत्पादन पर शोध कार्य चल रहा है।
- कृषि उत्पाद के विक्रय के लिए नाबार्ड द्वारा देश के अन्य राज्यों में संचालित कृषक उत्पादक कंपनी से जोड़ा जाएगा। ताकि किसानों को उचित मूल्य प्राप्त हो सके। साथ ही बिचैलियों की भागीदारी को समाप्त किया जा सके। 
- मखाना बुहराई यंत्र से लेकर आधुनिक प्रसंस्करण इकाई की स्थापना, मखाना सह मछली पालन के बारे में पुराने लोगों में भ्रांतियां थी कि मखाना के साथ केवल कवई, गरई, देशी मांगुर एवं सिंघी मछली का उत्पादन हो सकता है। कतला, रेहु एवं मृगल (नैनी) का पालन मखाना के साथ नहीं हो सकता क्योंकि मखाना के पौधे में कांटे होते हैं व जब फसल चरम पर होती है तो तरलाब के पानी की ऊपरी सतह को पूर्णतः ढंक देती है। विगत कई वर्षों के अथक अनुसंधान से मखाना सह मत्स्य पालन तकनीक विकसित की गई है। तालाब क्षेत्रफल का 1/10 भाग तालाब के बीच में बांस के चार खूंटों के सहायता से खाली छोड़ा जाता है। जिसे रिफ्यूज क्षेत्र कहा जाता है। इस क्षेत्र में मखाना का कोई पौधा नहीं होता है। कुल लागत 75 से 80 हजार रूपये प्रति हैक्टेयर एवं शुद्ध लाभ 1 लाख 15 हजार रूपए प्राप्त कर सकते हैं।

...जैविक खाद का ही करें प्रयोग : 
डाॅ पंकज कुमार यादव ने मखाना में पोषक तत्वों के प्रबंधन के बारे व जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में बदलते मौसम को ध्यान में रखते हुए मखाना के साथ मखाना आधारित विभिन्न फसलों के वार्षिक चक्र के बारे में बताया। साथ ही कृषकों से सजग व सचेत होकर फसलों के चयन की बात कही। साथ ही कोसी क्षेत्र में अनुपयुक्त जलजमाव क्षेत्रों की उत्पादकता, लाभप्रदता में वृद्धि एवं टिकाऊ खेती के लिए मखाना उत्पादन की तकनीक का उचित उपयोग करें। मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन पर विशेष जोर देते हुए कहा कि रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम से कम करें। किसी भी फसल को लगाने से पूर्व मिट्टी की जांच कराना अत्यंत आवश्यक है। केंद्र सरकार द्वारा सभी किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराने की योजना चलाई जा रही है। मिट्टी जांच से पूर्व मृदा नमूना लेने की विधि एवं मिट्टी जांच की विस्तारपूर्वक चर्चा करते मिट्टी में घटते कार्बन की मात्रा पर चिंता व्यक्त की तथा किसानों से अनुरोध किया कि बिना मिट्टी जांच के किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थ का प्रयोग मिट्टी में न करें। उन्होंने बताया कि ढैंचा व सनई की फसल को हरी खाद के रूप में वर्मी कम्पोस्ट(केंचुआ खाद), जैविक खाद (गोबर की खाद) एवं जैव उर्वरक का अधिक से अधिक उपयोग करें। जिससे खेतों में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा संतुलित हो सके।

...इन किसानों ने लिया हिस्सा : 
दरभंगा के किसान सुनील कुमार सहनी, राजन कुमार झा, श्रवण कुमार, हरदेव मुखिया, बिल्टु मुखिया, बुधन मुखिया, दिनेश मुखिया, रौदी मुखिया, कमलेश मुखिया समेत कुल बीस मखाना उत्पादक कृषकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। इस अवसर पर महाविद्यालय के डाॅ जेएन श्रीवास्तव, डाॅ जनार्दन प्रसाद, डाॅ रवि केसरी, डाॅ तपन गोराई, जय प्रकाश प्रसाद, अनुपम कुमारी, डाॅ माचा उदय कुमार, ई. मोहन सिन्हा एवं कर्मचारियों ने अपना सहयोग प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन मखाना वैज्ञानिक तथा प्रधान अन्वेषक डाॅ अनिल कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डाॅ पंकज कुमार यादव द्वारा किया गया।
एक टिप्पणी भेजें
Loading...