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शनिवार, 8 दिसंबर 2018

आलेख : मिनी इंडिया का ऐलान, 2019 में किसका होगा हिन्दुस्तान

देश के पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को 2019 लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। या यूं कहें इन पांच राज्यों के चुनावों में कांग्रेस भाजपा के बीच हुई नेक टू नेक की लडाई में 11 दिसम्बर को साफ हो जायेगा कि जनता का मूड क्या है, 2019 में किसकी सरकार बनेगी। क्योंकि इन पांच राज्यों में देश की तकरीबन 23 करोड़ की आबादी यानी 17 फीसदी लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया है। क्षेत्रफल के लिहाज से देखे तो 9 लाख स्क्वायर फीट यानी देश का 28 फीसदी आबादी इन पांच राज्यों में बसती है। इनमें जहां विधानसभा की 679 सीटें है, वहीं लोकसभा कुल 83 सीटे हैं। इस तरह अगर इन पांच राज्यों को मिनी इंडिया कहा जाय तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। मतलब साफ है पिक्चर भले ही 11 को रीलिज होगी लेकिन इसे 2019 का ट्रेलर ही कहा जायेगा 

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बेशक, बाजी किसके हाथ लगेगी यह तो 11 दिसम्बर को ही पता चलेगा। लेकिन सर्वे रिर्पोटों पर यकीन करें तो इतना साफ है मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है। खास बात यह है कि इन तीनों राज्यों में बीजेपी की ही सरकार है। इसके बावजूद कांग्रेस अगर इन राज्यों में सरकार बनाने की स्थिति में है तो न सिर्फ बीजेपी बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी खतरे की घंटी है। इन राज्यों से बहुत हद तक तस्वीर साफ हो जायेगी कि देश के वोटर के मन में क्या चल रहा है। इसी के साथ 2019 के हवा का रुख भी पता चल जायेगा कि वो किस करवट बैठने वाली है। अगर बीजेपी इन राज्यों में खासकर एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कामयाब रही तो माना जायेगा कि 2019 में भी मोदी का जलवा कायम रहेगा। जबकि झटका लगा तो राहुल गांधी न सिर्फ एक सशक्त प्रधानमंत्री के दावेदार के रुप में उभरेंगे, बल्कि उनका साफ्ट हिन्दुत्व का सहारा कामयाब होता दिखेगा। 

फिरहाल, एग्जिट पोल के नतीजे कांग्रेस के लिए नई उम्मीदें लेकर आए। कांग्रेस इस बार मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपने मत प्रतिशत में जबरदस्त सुधार कर भाजपा को कड़ी चुनौती देती दिख रही है। वहीं, राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनने के स्पष्ट संकेत हैं। एग्जिट पोल भाजपा की सीटों और मत प्रतिशत में गिरावट का भी इशारा कर रहे हैं। उधर, तेलंगाना में टीआरएस की वापसी संभव है तो मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) सरकार बना सकती है। राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा के वोट प्रतिशत में ज्यादा अंतर नहीं है, लेकिन 70-90 सीटों का फर्क होते दिख रहा है। यहां कांग्रेस को 41.5 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है तो भाजपा को 40 फीसदी वोट मिल सकते हैं। कहा जा सकता है इनमें से जिन चुनावी राज्‍यों में वर्षों से भाजपा की सरकारे हैं, वहां उनको सत्‍ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ रहा है। चुनाव पूर्व सर्वे में मध्‍य प्रदेश में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबले की संभावना जताई जा रही थी। छत्‍तीसगढ़ में अजीत जोगी की छत्‍तीसगढ़ कांग्रेस और बसपा के गठबंधन के कारण वहां इस बार मुकाबला त्रिकोणीय माना जा रहा है। राजस्‍थान में पिछले दो दशकों से अधिक समय से हर सत्‍ताधारी दल को चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है। ऐसे में इस बार वहां के चुनावी नतीजे इस मायने में दिलचस्‍प होंगे कि क्‍या वहां इतिहास दोहराया जाएगा या वहां राजे बड़ी लकीर खींचते हुए लगातार दूसरी बार सत्‍ता में आने का रिकॉर्ड बनाएंगी। तेलंगाना में समय से कुछ माह पूर्व ही विधानसभा भंग कराकर के चंद्रशेखर राव ने अपने जीवन का सबसे बड़ा सियासी दांव खेला है। 

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पांच राज्यों के चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण हो गए कि इनके नतीजे भारतीय राजनीति को उसकी दशा-दिशा का एक आईना दिखाने जा रहे हैं। इन चुनावों से कई भविष्य सीधे जुड़े हुए हैं। इनके नतीजे लंबे समय से चुनावी बिसात हारती आ रही कांग्रेस की गाड़ी को पटरी पर लौटने का अवसर दे सकते हैं, तो भाजपा के लिए अपनी जीत की लय बनाए रखने की बड़ी चुनौती हैं। पांचों राज्यों के चुनाव नतीजे आने में अभी चंद रोज बाकी हैं, लेकिन इसने मौजूदा नतीजों के आकलन के साथ-साथ अगले साल के फाइनल की तस्वीर अपने-अपने कैनवास पर बनाने-बिगाड़ने का मौका तो दे ही दिया है। जाहिर है, 2019 का इंतजार और-और रोचक होता जा रहा है। यूपी के बाद कई राज्यों के चुनावों, और यूपी में फूलपुर और गोरखपुर उप-चुनावों के नतीजों ने बार-बार बताया है कि राजनीति में हवाएं हमेशा एक दिशा में नहीं बहतीं। हवाएं अपना मौसम और दिशा खुद तय करती हैं। इन तीन राज्यों में 65 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से सिर्फ सात कांग्रेस के पास हैं। इन राज्यों की 58 सीटें और उत्तर प्रदेश की 72 सीटें लोकसभा में भाजपा के बहुमत का मुख्य आधार हैं। इन चार राज्यों में कांग्रेस के सफाये से एक ऐसी पार्टी को राष्ट्रीय वर्चस्व मिला, जिसके खाते में कुल राष्ट्रीय वोट का मात्र 31 प्रतिशत है। यदि दो बड़े राज्यों में से एक में कांग्रेस जीत हासिल करती है, तो इसे 2019 में मोदी के पुनः चुने जाने की संभावनाओं पर बड़ी चोट मानी जायेगी। दूसरी तरफ भाजपा के राज्य-स्तरीय नेताओं के सिमटने से मोदी खुद को पूरी तरह से स्थापित कर सकेंगे और भाजपा की विचारधारा को लागू कर पायेंगे। तेलंगाना दक्षिण भारत का द्वार है। यहां भी दोपक्षीय- के चंद्रशेखर राव और उनकी निर्बाध लोकलुभावन नीति तथा तेलुगु देशम के नेता चंद्रबाबू नायडू के पीछे चलते दिखायी देते कांग्रेस के चेहराविहीन नेताओं- चुनावी संघर्ष है। यह दिलचस्प है कि तेलुगु देशम इस गठबंधन की कनिष्ठ भागीदार है। 

पहले ऐसा लग रहा था कि के चंद्रशेखर राव के शासन का खात्मा हो जायेगा, लेकिन उन्होंने अपनी राजनीतिक चतुराई से इस लड़ाई को खुद और तेलुगु देशम के बीच बना दिया है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वे फिर जीत जायें और चुनावी अनुमानों को गलत साबित कर दें। अगर ऐसा होता है, तो इसका नतीजा दिलचस्प होगा और उससे कई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं। तेलंगाना की जीत से तेलंगाना राष्ट्र समिति राहुल गांधी के विपक्ष के सबसे बड़े नेता होने के किसी दावे को झटका दे सकती है। के चंद्रशेखर राव यह भी कोशिश करेंगे कि नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में कोई बड़ा राजनीतिक विकल्प पैदा न हो, जिसके साथ कांग्रेस बड़े साझीदार के रूप में जुड़ी हो। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम कांग्रेस को साथ ले सकती है, क्योंकि वहां उसका कोई खास वजूद नहीं है। के चंद्रशेखर राव भाजपा के खिलाफ गैर-कांग्रेस राष्ट्रीय विकल्प खड़ा करने की एक और कोशिश कर सकते हैं। यदि कांग्रेस तेलंगाना और उत्तर भारत में एक राज्य जीत जाती है, तो यह प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व के लिए बड़ा झटका होगा। इससे भारत के दोनों हिस्सों में कांग्रेस के लिए बड़ा आधार बनाने में मदद मिलेगी। हो जो भी सच तो यही है कि अगर एक्जिट पोल हकीकत में तब्दील हुए तो साल 2019 का आम चुनाव बेहद रोचक होगा। वर्ष 1971 के चुनाव के बाद भारत पहली बार व्यक्ति-केंद्रित चुनाव का साक्षी होगा। उस समय इंदिरा गांधी कांग्रेस का एकमात्र चेहरा और मुद्दा थीं। तब वह कहा करती थीं कि ’जब मैं गरीबी हटाओ की बात करती हूं, तो विपक्ष इंदिरा हटाओ की बात करता है।’ 

प्रधानमंत्री मोदी भी ऐसा ही करते हैं। वे कहते हैं कि जब वे विकास की बात करते हैं, तो विपक्ष ’मोदी हटाओ’ के नारे लगाता है। वे अपने विरोधियों को सत्ता-लोलुप, बेकाम और भ्रष्ट नेताओं के रूप में पेश करेंगे, जो सिर्फ नयी दिल्ली की गद्दी हथियाने के लिए एकजुट हुए हैं। वे सही भी हो सकते हैं। अभी तक मोदी ने विरोधियों को उन्हें सही में परिभाषित करने का मौका नहीं दिया है। बहरहाल, आम चुनाव सिर्फ ’विकास’ के बारे में नहीं होगा। उस दौरान श्रीराम मंदिर से लेकर धर्म, जाति, लूट-खसोट, भ्रष्टाचार, अपराध, राफेल, अगस्ट्रा, पाकिस्तानी आतंकी हमले, जवानों की शहादत भी बड़े मुद्दे होंगे। अगर बीजेपी श्रीराम मंदिर मसले पर अध्यादेश लाने में सफल रही तो एक बार फिर आम जनमानस में मोदी लहर घर कर सकती है। माना जायेगा कि मंदिर निर्माण मोदी-योगी ही करवा सकते हैं। खैर जो भी हो, 2014 के मुकाबले 2019 में कांग्रेस हिंदी भाषी राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करेगी। यूपी में 2014 में भाजपा को 42.3 प्रतिशत वोट मिला था, जो 2017 में घटकर 39.6 प्रतिशत हो गया। यहां बसपा और सपा को संयुक्त रूप से भाजपा से अधिक वोट मिला है। अगर वे एक साथ आएं तो चुनाव में स्थिति बहुत बदल सकती है। जहां तक देश का सवाल है, 2014 जैसा माहौ नहीं रहेगा। क्योंकि इस बार मोदी विरोधी दलें साक्षा मंच कर सकती है। या यूं कहे 2019 मोदी बनाम पूरा विपक्ष होने की ज्यादा उम्मींद है। अगर पांच राज्यों में कांग्रेस को बढ़त मिली तो राहुल गांधी महागठबंधन में मजबूत दावेदार के रुप में उभर सकते है। मतलब साफ है 2019 में मुख्य प्रतिद्वंद्विता नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच होने वाली है। 



--सुरेश गांधी--
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