बेगूसराय : रंग संस्था "भनक" पूर्णियाँ की दो दिवसीय नाट्य प्रस्तुति - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

बेगूसराय : रंग संस्था "भनक" पूर्णियाँ की दो दिवसीय नाट्य प्रस्तुति

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अरुण कुमार (बेगूसराय) भरत नाट्य कला केन्द्र (भनक), पूर्णिया के तत्वावधान में दो दिवसीय नाट्य प्रदर्शन का आयोजन दिनांक 5-02-19को जिला स्कूल पूर्णिया के प्रांगण में सम्पन्न हुआ।यह दो दिवसीय नाट्योत्सव संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के व्यक्तिगत प्रस्तुति अनुदान योजना के तहत किया गया जिसमें तीन निर्देशकों क्रमशः उमेश आदित्य, मिथिलेश राय और शशिकांत प्रसाद ने अपने अपने नाटकों का मंचन किया। बिहार के जाने-माने वरिष्ठ रंगकर्मी श्री उमेश आदित्य ने प्रख्यात कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियों पर केन्द्रित कथा विमर्श'रेणु के रंग'का मंचन किया। पूर्णिया जैसे अपेक्षाकृत अविकसित रंग मानसिकता वाले शहर में ऐसे प्रयोगशील नाट्य विमर्श को सामने लाना एक साहसिक कदम है। नाटक में सूत्रधार के रूप में निर्देशक श्री उमेश आदित्य रेणु के रचनात्मक कार्य क्षमता पर अपनी बात रखते हैं और रेणु की कहानियों पर केन्द्रित टिप्पणी से नाटक की शुरुआत करते हैं। रेणु की चर्चित कहानी ठेस और आदिम रात्रि की महक के जीवंत दृश्यों को अपनी बात के साथ जोड़ते हैं। बीच बीच में वे स्वयं भी अभिनय करते हैं,नाटक के पात्र बन जाते हैं। अपनी टिप्पणी और जीवंत दृश्यों के बीच में वे दर्शकों को भी रेणु की कहानियों पर अपनी बात रखने मंच पर आमंत्रित करते हैं। नाटक देखने बैठा व्यक्ति पात्र बन जाता है,एक ऐसा पात्र जिसे अपने संवाद का पता नहीं, जिसने कभी पूर्वाभ्यास नहीं किया। नाटक में ऐसा प्रयोग पूर्णिया में पहली बार दिखता है। दर्शकों के बीच से प्रोफेसर सुरेन्द्र शोषण और रचनाकार श्री यमुना प्रसाद बसाक अचानक बनने वाले पात्र हैं।यह एक बड़ा दिलचस्प प्रयोग साबित हुआ।

युवा रंगकर्मी शशिकांत प्रसाद ने रेणु की सशक्त कहानी ठेस का प्रदर्शन किया।लोक कलाकार सिरचन की पीड़ा को व्यक्त करने में सक्षम यह नाटक दर्शकों द्वारा काफी सराहा गया। रचनाकार श्री यमुना प्रसाद बसाक ने कहा कि पहले दिन यह नाटक देख कर मन विचलित हो उठा और सुबह उन्होंने ठेस कहानी को फिर से पढ़ा और फिर दूसरे दिन नाटक देखने आए। पहली बार पूर्णिया रंगमंच पर भिखारी ठाकुर सम्मान प्राप्त राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय नयी दिल्ली के स्नातक श्री मिथिलेश राय सिरचन की पीड़ा को व्यक्त करते दिखाई दिए। जाने माने अभिनेता और निर्देशक श्री उमेश आदित्य पंचानन चौधरी की भूमिका में नजर आए। वरिष्ठ रंगकर्मी श्री प्रदीप कुमार गुप्ता परमेश्वर मास्टर की भूमिका में अभिनय करते दिखे। रामभजन ने रेणु का रूप धारण किया और ज्योत्सना कुमारी रेणु की मां के रूप में नज़र आईं। आरज़ू प्रवीण ने मंझली भाभी के रूप में , रंजना शर्मा ने और श्वेता स्वराज ने रेणु के घर की औरतों की भूमिका की। मनोरंजन कुमार, संजय कुमार, मनोरंजन झा, बादल कुमार झा, पंकज जायसवाल, राहुल अर्जुन ठाकुर,सौरभ कुमार,ने ग्रामीण और अन्य पात्र के रुप में अपनी भूमिका को सशक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।मानो, जिसके बिदाई के लिए चिक और शीतलपाटी बनाने सिरचन को बुलाया गया था,की भूमिका की खुशी प्रवीण ने।गायन पक्ष संभाला मनोरंजन झा ने।नाल पर मौजूद थे मनोरंजन कुमार।प्रकाश योजना  और ध्वनि प्रभाव सुमन कुमार का था।कुल मिलाकर इसे एक सफल प्रस्तुति कहा जा सकता है।

दूसरे दिन का तीसरा नाटक रेणु की एक बेहतरीन कहानी आदिम रात्रि की महक का मंचन श्री मिथिलेश राय के निर्देशन में प्रस्तुत की गई।अब तक इस नाटक के चालीस शो हो चुके हैं।भनक की इस प्रस्तुति ने राष्ट्रीय युवा उत्सव में बिहार का प्रतिनिधित्व भी किया है। पटना में आयोजित प्रकाश पर्व में, गुजरात में पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा आयोजित राष्ट्रीय नाट्य उत्सव में भी इसके प्रदर्शन हो चुके हैं। आकाशवाणी पूर्णिया द्वारा भी इसका रेडियो नाटक के रूप में प्रसारण किया जा चुका है। ठेस का भी रेडियो से प्रसारण हो चुका है। नाटक का पात्र कोरमा रेलवे की नौकरी करने वाले बाबुओं के साथ रह चुका है।वह मगहिया डोमों की बस्ती में रहने वाली सरसतिया से प्यार करता है।रेणु ने इस कहानी में कुत्ता को भी पात्र का रूप दे दिया है।बाबू का तबादला होने पर वह नहीं जाता क्योंकि वह सरसतिया और उस कुत्ते को छोड़कर नहीं रह सकता। कोरमा के रूप में तुषार सिंह ने अपनी छाप छोड़ी।बाबू के रूप में एक बार फिर दिखाई देते हैं उमेश आदित्य।मस्तान बाबा की भूमिका की रामभजन ने।कुत्ता पंकज जायसवाल बने। पंडित (बादल कुमार झा) गोपाल बाबू (संजय कुमार), सरसतिया की मां(आरज़ू प्रवीण), सरसतिया का बाप(शशिकांत प्रसाद) सहित अर्जुन ठाकुर, मनोरंजन कुमार (पैटमान), किशोर सिन्हा (राम बाबू) रंजना शर्मा (बोमा), राहुल कुमार, सौरभ, इत्यादि ने नाटक को सशक्त बनाने में अपना योगदान दिया। इन नाटकों का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष नाटक के दृश्य थे। नाटक जिला स्कूल पूर्णिया के एक टूटे फ़ूटे भवन को मंचीय रूप देकर प्रस्तुत किया गया।बांस बत्ती से बने दरवाजों और खिड़कियों ने खासा प्रभावित किया। ऐसा लगा जैसे यह रेणु का घर ही है। कुल मिलाकर कहें तो एक वास्तविक पृष्ठभूमि का चयन कर नाटक को वास्तविक धरातल पर लाने का सफल प्रयास किया गया।

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