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रविवार, 24 फ़रवरी 2019

सर्वोच्च न्यायालय के 27 जुलाई का अल्टीमेटम देने से सरकार पर दबाव बढ़ा

सरकार सर्वोच्च न्यायालय में परंपरागत वन निवासियों के पक्ष को मजबूती से रखेंन्यायालय का फैसला  भाजपा की आदिवासी विरोधी सोच का नतीजा : संतोष सिंह 
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बुंदेलखंड। सुप्रीम कोर्ट में तथाकथित वन्य जीव संरक्षण समूहों द्वारा दायर याचिका को लेकर फ़ैसला आया है कि 27 जुलाई 2019 तक 16 राज्यों के 11 लाख से अधिक वनभूमि पर काबिज आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों को बेदखल किया जाए, जिनका दावा अमान्य हो गया है । सबसे दुखद बात यह है कि केंद्र सरकार ने इस प्रकरण की सुनवाई में अपना पक्ष रखने के लिए कोई वकील ही नहीं भेजा । इससे जाहिर होता है कि केंद्र की सत्ता में काबिज भाजपा आदिवासी विरोधी है. एकता परिषद के राष्ट्रीय सदस्य संतोष सिंह ने कहा है कि एक लम्बे संघर्ष के बाद आदिवासी और अन्य परम्परागत वन निवासियों को वनभूमि पर अधिकार देने हेतु वन अधिकार कानून आया । इस कानून के प्रचार प्रसार में कमी, दावा फार्म भरने एवं सत्यापन की जटिलता, वन विभाग के अङंगे तथा नौकरशाहों की उदासीनता ने इसके सफल क्रियान्वयन पर अनेक अड़चनें डाली है। फिर भी लोगों ने भारी मशक्कत से दावे लगाए तथा नियम के अनुसार साक्ष्य भी प्रस्तुत हुए। प्रदेश में लगभग 6 लाख 15 हजार व्यक्तिगत दावे वन अधिकार समिति के समक्ष प्रस्तुत हुए । जिसे वन अधिकार समिति, ग्राम सभा तथा उपखंड स्तर समितियों ने जांच के बाद जिला स्तरीय समितियों को अंतिम निर्णय के लिए भेजा। परन्तु जिला स्तरीय समितियों ने बिना मौका जांच के लगभग 3 लाख 54 हजार दावे अमान्य कर दिए। दावेदार को दावा अमान्य होने की लिखित सूचना देने के प्रावधानों के बाद भी सूचना नहीं दी गई, जिसके कारण दावेदार अपील करने के अपने संवैधानिक अधिकार से बंचित रह गए। अमान्य दावे अन्य राज्यों की अपेक्षा मध्यप्रदेश में सबसे अधिक है। तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा इस अमान्य दावे के आंकड़े को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत कर दिया। जबकि लोग इन दावों के जांच की मांग राज्य सरकार से लगातार करते आ रहे थे । हमारी मांग है कि, सरकार आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों के हकों की रक्षा के लिए मजबूती से अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट में रखे। वन अधिकार कानून को प्रभावी तरीके से लागू करे एवं कानून को कमजोर करने के किसी भी प्रयास को रद्द करे तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में ज़बरन बेदखली को रोकें। वन अधिकार कानून के प्रावधानों के अनुसार सामुदायिक वन संसाधन का संरक्षण, पुनर्जीवित या संरक्षित तथा प्रबंध करने का अधिकार ग्राम सभा को दिया है। इस प्रावधान को तत्काल लागू किया जाए।

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