विशेष : बदलाव और विकास विरोधी है भारत बंद - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

विशेष : बदलाव और विकास विरोधी है भारत बंद

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बदलाव प्रकृति का नियम है। रोज दिन बदलता है। रात बदलती है। रोज का सूरज नया होता है। चांद नया होता है। प्रकाश नया होता है। हर क्षण नया होता है। मिनट, सेकेंड और घंटा नया होता है। ऋतुएं भी बदलती रहती है। बहती हुई नदी की हर बूंद नई होती है।  दुनिया गतिशील है। धरती भी निरंतर घूमती रहती है फिर मानव ही क्यों ठहरा हुआ है?वह माटी का माधव क्यों बना हुआ है। जड़, चेतन, स्थावर सभी अपने को बदल रहे हैं तो मानव एक जैसा ही क्यों बना रहना चाहता है? उसके आचार-व्यवहार में, उसकी दिनचर्या में अपेक्षित बदलाव क्यों नहीं आ रहा है, विचार तो इस पर करना होगा। कब तक मानव समाज एक ही लीक पर चलता रहेगा। जबकि अपने देश में तो एक कहावत भी है कि लीक छोड़ तीनों चलें शायर, सिंह,सपूत। अब हमें तय करना होगा कि हम किस कोटि में आते हैं। आजकल जिसे देखिए वह भारत बंद करता है। प्रदेश बंद करता है। इससे किसे क्या मिलता है, इस पर कभी सोचने-समझने की जहमत नहीं उठाई गई। भारत बंद मतलब देश के काम काज बंद। रेल मार्ग बंद, सड़क मार्ग बंद; वायु मार्ग पर बस नहीं है अन्यथा भाई लोग उसे भी बंद करा देते। स्कूल बंद, कॉलेज बंद, अस्पताल बंद, कारखाने बंद, दुकानें बंद। मतलब एक बार भारत बंद और राज्य बंद होने का मतलब है कि लोगों का व्यापार बंद। यह बंद शांति से हो जरूरी तो नहीं। शांतिपूर्ण आंदोलन से मजा नहीं आता। अहिंसक आंदोलन लंबा खिंचता है। लोगों का ध्यान उधर नहीं जा पाता। आंदोलन के अगुआ तुरंत प्रचार चाहते हैं और ऐसा हिंसा से ही संभव है। तोड़-फोड़ और आगजनी से ही संभव है।  विचारणीय तो यह है कि एक दिन का आंदोलन देश को कितना पीछे ले जाता है? एक दिन आदमी कमाए नहीं तो उसका बजट कितना गड़बड़ होता है। उसकी अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में कितना समय लगता है, इसका अंदाजा लगाने की तो किसी को फुर्सत ही नहीं है। 
  
21 राजनीतिक दलों के समर्थन से दलितों और पिछड़ों ने भारत बंद आयोजित किया। रेल रोकी, सड़कें अवरुद्ध कीं। जाम लगाने के लिए वाहनों के टायरों की हवा निकाली। कुछ वाहनों को आग के हवाले किया। तोड़-फोड़ और उपद्रव किया। हासिल क्या हुआ? दिन भर अपने काम का नुकसान किया। जो आमदनी हो सकती थी, नहीं हो पाई। कई आदिवासी और दलित आंदोलन में उलझे रहे। जो आंदोंलन में शरीक नहीं होना चाहते थे, वे भी काम पर नहीं जा पाए क्योंकि शहर जाने के रास्ते उन्हीं के अपने लोगों ने बंद कर रखे थे। आंदोलन में हजारों लाखों लोग शामिल होते हैं लेकिन नाम तो कुछ खास लोगों का ही छपता है। शोहरत भी कुछ खास लोगों को ही मिलती है। आंदोलन में शामिल होने से पहले अगर लोग यह सोचने और पूछने लगें कि इससे उन्हें क्या लाभ और हानि होगी तो भी इससे आंदोलन की राजनीति करने वालों का मनोबल टूटेगा लेकिन आजकल तो देशवासियों ने जैसे सोच-विचार से तौबा ही कर लिया है। यही वजह है  कि आंदोलन की आड़ में कुछ लोग अपने स्वार्थों की संपूर्ति करने लगे हैं। जनता आंदोलन में तो आगे नजर आती है लेकिन जब सुविधाओं की मलाई खाने की बात आती है तो नेता आगे आ जाते हैं।  जनता पीछे छूट जाती है। आरक्षण की जब देश में अवधारणा बनी थी तो उसके पीछे मकसद था जो विकास की दौड़ में पीछे रह गए हैं, उन्हें सहारा देकर आगे बढ़ाना।  बच्चा जब चलने में अक्षम होता है तो उसे वॉकर के सहारे चलाया जाता हे लेकिन बड़े हाने पर भी क्या वह वॉकर लेकर ही चलता है? नहीं तो फिर देश की आजादी के 70 साल बाद भी देश के किसी भी तबके को आरक्षण की जरूरत क्यों है?जिन वर्गों को इतने साल तक आरक्षण का लाभ मिला, उन्हें और कितने साल आरक्षण दिया जाए जिससे कि वे पूर्णतः सक्षम हो जाएं। यह सवाल सर्वोच्च न्यायालय भी पूछ चुका है। गत वर्ष तो उसने एससी एसटी अत्याचार निवारण एक्ट में संशोधन तक का आदेश तक दे दिया था। यह और बात है कि केंद्र की मोदी सरकार दलितों के हिंसक आंदोलन के समक्ष झुक गई थी और उसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विरुद्ध अध्यादेश लाना पड़ा था। इसका सवर्णों ने भी मुखर विरोध किया था। तीन राज्यों के चुनाव में भाजपा को सवर्णों की नाराजगी का खामियाजा हार के रूप में भुगतना भी पड़ा था। उस नाराजगी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार को अध्यादेश लाकर आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग को नौकरी और शिक्षा में दस प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था लेकिन इसे लेकर राजनीतिक दलों ने बात का बतंगड़ बना रखा है। सवर्णों को शिक्षा और नौकरी में दस प्रतिशत आरक्षण के साथ ही देश में राजनीतिक सरगरमी बढ़ गई है।

   विपक्ष को अपना सिराजा ढहता नजर आ रहा है। सवर्णों का रुझान भाजपा की ओर न हो जाए, इसे लेकर अधिकांश राजनीतिक दल परेशान है। इस निमित्त वे दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को भड़काने में जुटे हैं। दलितों और आदिवासियों के आरक्षण को समर्थन देकर उन्होंने साफ कर दिया है कि आर्थिक वर्ग से पिछड़े सामान्य वर्ग के हित उनके लिए कोई खास मायने नहीं रखते। अब सवर्णों को सोचना है कि वे किसके साथ जाना पसंद करेंगे? किसका समर्थन करेंगे जो उनकी जड़ें खोद रहे हैं या उनका जो उनके लिए सोच रहे हैं। दलितों और आदिवासियों ने जो भारत बंद किया उसमें प्रमुखता से  आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान रद्द करने की मांग की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में  20 लाख आदिवासी परिवारों को ‘वनभूमि से बेदखल करने’ का आदेश दे रखा है। प्रबुद्ध वर्ग ने चिंता जताई है कि आदिवासी जंगल में नहीं रहेंगे तो कहां रहेंगे? ये वे लोग हैं जो आदिवासियों के जीवन स्तर में उन्नयन बर्दाश्त ही नहीं करना चाहते। वे नहीं चाहते कि आदिवासी भी शहरियों जैसा जीवन जीएं। उनके बच्चे भी पढ़-लिखकर विकास की मुख्य धारा में शामिल हों। चकवड़ का शाक खाकर और पेंच पीकर आदिवासी समाज कब तक जीवन बसर करता रहे, इस दशा में कोई सोचने को तैयार नहीं है। जंगल में रहना तो वैसे भी  कष्टसाध्य है। वन्य पशुओं के हमले का भी डर रहता है। उनके पुनर्वास की चिंता तो आजादी के बाद से ही की जानी चाहिए थी। सर्वोच्च न्यायालय ने अगर उन्हें वनाधिकार से वंचित किया है तो इसमें उसकी दूर दृष्टि ही होगी। नीति कहती है कि एक दरवाजा बंद होता है तो दस दरवाजे खुलते हैं। आदिवासी जंगल में ही रहे तो कभी  तरक्की नहीं कर पाएंगे। विकास की मुख्य धारा में आदिवासियों को शामिल होन हे तो उन्हें अतीत का मोह छोड़ना ही होगा। देश के 20 लाख लोग असमान्य जीवन जीएं, यह तो नैसर्गिक न्याय का सिद्धांत भी नहीं है। न्यायालय के निर्णयों पर आक्षेप करने से पहले उसके गुण-दोष पर भी विचार करना होगा। 

उच्च शिक्षण संस्थानों की नियुक्तियों में 13 प्वाइंट रोस्टर की जगह 200 प्वाइंट रोस्टर लागू करने की मांग की जा रही है। पहले भी विश्वविद्यालयों में 200 प्वाइंट रोस्टर था। तब उसे लेकर बड़ी जातियों में आक्रोश था। एक पद हुआ तो वह आरक्षण से ही भर जाता था। यह मामला अदालत में गया और इस व्यवस्था में परिवर्तन की जरूरत महसूस हुई। अदालत ने भी  इस मामले को गंभीरता से लिया और अब जब केंद्र सरकार दे भर के विश्वविद्यालयों में नियुक्ति प्रकिया विभागवार करने की बजाय विश्वविद्यालयवार करने जा रही है तो सभी दल छटपटाने लगे हैं। वे दलितों और पिछड़ों को भड़काकर अपना राजनीतिक हित साधना चाहते हैं। उन्हें लग रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे को उछालकर वह केंद्र सरकार को दोबारा सत्ता में आने से रोक सकते हैं लेकिन अपने इस दांव से वे इस देश का कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं, देश के समाजशास्त्री इस पर चिंतन नहीं कर पा रहे हैं। इससे देश में सामाजिक विघटन और विद्रोह विप्लव  के हालात बनेंगे, इसकी चिंता किसी को भी नहीं है। राजीतिक दलों का ‘ आपन कुसल कुसल जग मांहीं’ का यह प्रयोग देश को कहां ले जाएगा, इस पर गहन चिंतन-मनन करने की जरूरत है। समाजवादी पार्टी और आरजेडी समेत देश के 21 दलों ने भारत बंद का समर्थन किया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इस रोस्टर सिस्टम पर पहले ही सवाल खड़े कर चुके हैं। उन्होंने तो यहां तक कहा है कि हमारे आदिवासी भाई -बहन संकट में हैं। संवैधानिक आरक्षण में छेड़छाड़ और वनाधिकार छीनने से उनके जंगल और जीवन के समक्ष संकट खड़ा हो गया है। प्रधानमंत्री के झूठे वायदों से आदिवासी और दलित सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं। यशस्वी यादव ने कहा है कि देश में आरक्षण को कोई छू नहीं सकता। जो छुएगा, वह जल कर राख हो जाएगा। 90 प्रतिशत आरक्षण पर दलितों और पिछड़ों का अधिकार है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने कहा है कि समाजवादी पार्टी भाजपा  सरकार द्वारा शिक्षण संस्थानों में लागू आरक्षण विरोधी 13 प्वाइंट रोस्टर प्रणाली के सख्त विरोध में हैं। दलित, ओबीसी, पिछड़ा, कमजोर, वंचित विरोध केंद्रित यह नीति संविधान की उपेक्षा व अवहेलना है। उनके रिश्तेदार लालू यादव कब पीछे रहते। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि देश में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा है। आदिवासियों की ज़मीनें छीनी जा रही है। संविधान के साथ छेड़छाड़ कर वंचित वर्गों का आरक्षण समाप्त किया जा रहा है। दलितों पर उत्पीड़न बढ़ गया है। आरएसएस की जातिवादी नीतियों को देश  में लागू किया जा रहा है। यह सब देश में विघटन के प्रास नहीं तो और क्या हैं? समाजवादियों ने तो प्रयागराज के बैरहना क्षेत्र में गंगा गोमती एक्सप्रेस ट्रेन को रोक दिया।  ट्रैक पर उतकर प्रदर्शन किया। यह ट्रेन शहर के बैरहना इलाके में रोकी गई। बिहार में बंद के नाम पर जो कुछ हुआ, उसे बहुत उचित नहीं ठहराया जा सकता। 

आंदोलनकारियों की ओर से तर्क यह दिया जा रहा हे कि 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम के अनुसार, विश्वविद्यालयों के किसी विभाग में जब तक 4 सीट नहीं होगी तब तक पिछड़ी जाति से कोई प्रोफेसर नहीं बन पाएगा। इसी तरह जब तक 7 सीट की एक साथ विज्ञापित नहीं होंगी तब तक कोई दलित प्रोफेसर नहीं आ पाएगा और 14 सीट नहीं आई तो कोई आदिवासी प्रोफेसर नहीं बन पाएगा। इस रोस्टर का कड़ा विरोध हो रहा है। अभी तक यह हो रहा था कि जो कुछ पद विज्ञापित हो रहे थे उसमें दलितों और पिछड़ों की तो नियुक्ति हो जा रही थी और सवर्णों को मौका नही मिल पा रहा था। सवाल यह हे कि 200 प्वाइंट रोस्टर के साथ सामान्य वर्ग की भावनाओं उसकी योग्यता और दक्षता से राजनीतिक दल आखिर कब तक खेलते रहेंगे।  आंदोलनकारियों की मांग यह है कि देश भर में देश भर में 24 लाख खाली पदों को भरा जाए। 20 लाख आदिवासी परिवारों को वनभूमि से बेदखल करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पूरी तरह निरस्त करने के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाए और  2 अप्रैल, 2018  के भारत बंद के दौरान बंद समर्थकों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं। मतलब देश के 21 दलों को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर भी ऐतराज है। यूं तो पूरा आंदोलन आदिवासी अधिकार आंदोलन, आल  इंडिया आंबेडकर सभा और संविधान बचाओं संधर्ष समिति के बैनर तले हो रहा है लेकिन राजद, सपा ने जिस तरह जगह-जगह तोड़-फोड़ की है, उसे बहुत उचित नहीं ठहराया जा सकता। वहीं 35 ए और जमात ए इस्लामी पर प्रतिबंध के विरोध में जम्मू-कश्मीर में भी बंद बुलाया गया है। इसे भी राजनीतिक दल दलितों और आदिवासियों जैसा ही समर्थन दे रहे हैं। एक ओर तो राजनीतिक दल पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों की शहादत पर दुख बता रहे हैं, वहीं एक प्रमुख विपक्षी दल के नेता इस हादसे को दुर्घटना बताने से भी पीछे नहीं रह रहे हैं।  राजनीतिक दलों को यह तो बताना ही होगा कि वे विरोध किसका कर रहे हैं और इसका क्या औचित्य है? उन्हें इस देश को यह बताना चाहिए कि देश के विकास का उनके पास रोडमैप क्या है? चाहे जो मजबूरी हो हमारी मांगें पूरी हो का नारा लगाने वालों को यह भी सोचना  होगा कि वे देश को मजबूर बनाकर खुद कितना मजबूत हो पाएंगे। अपने हितों की रक्षा के लिए देश के हितों को नजरंदाज करना उचित तो नहीं है। 




--सियाराम पांडेय ‘शांत’--

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