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रविवार, 17 मार्च 2019

पूर्णिया : विडंबना । महज एक नाव के सहारे आवागमन करने को मजबूर है 50 हजार आबादी

- ग्रामीण कहते हैं आज तक हमने किसी पदाधिकारी को अपने गांव आते नहीं देखा है- जो भी अधिकारी बाढ़ के दौरान इलाके में आते हैं वे नदी के उस पार मालोपाड़ा तेलंगा घाट तक ही आते हैं और वहीं से सर्वे रिपोर्ट तैयार वापस लौट जाते हैं

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कुमार गौरव । पूर्णिया : यह विडंबना नहीं तो और क्या है आजादी के बाद से अब तक पूर्णिया के बायसी और अमौर प्रखंड के ताराबाड़ी, सिरसी, खाड़ी व हपनिया की 50 हजार आबादी को आज भी प्रखंड मुख्यालय समेत अन्य जगहों को जाने के लिए आवागमन का एकमात्र सहारा नाव ही है। इन्हें आजतक विकास की किरण नहीं दिखी है। कई बार जनप्रतिनिधि आए और गए लेकिन इनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। अब तो यहां के लोगों की नियति ही बन चुकी है। विकास को लेकर वे इतने तड़पे कि अास ही न बची। हर सुबह वे जिंदगी की जद्दोजहद में लगे रहते हैं और बरसात में जिंदगी लील होने से बचने के उपाय ढूंढ़ते हैं। बरसाती दिनों तो स्थिति विकट हो जाती है। जीवट मानव सभ्यता के दिन दिखने लगते हैं लेकिन इन तमाम परेशानियों के बाद भी न तो किसी पदाधिकारी ने और न ही किसी जनप्रतिनिधि ने ही इस इलाके की सुध ली है। लिहाजा, ग्रामीणों ने खुद जहां चचरी पुल का निर्माण कर लिया है वहीं नाव के सहारे वे एक जगह से अन्यत्र आते जाते हैं। प्रखंड और अनुमंडल कार्यालय जाने के लिए कोई साधन नहीं है। यहां के लोग पैदल या बाइक से महानंदा नदी के किनारे जाते हैं और नाव पर सवार होकर मालोपाड़ा तेलंगा घाट तक पहुंचते हैं और फिर वहां से घाट पर करीब 500 मीटर पैदल चलने के बाद वे सड़क तक पहुंच पाते हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिंदगी की ये रस्साकसी कितनी कठिन है लेकिन हमारे भाग्य विधाता हैं कि इन तमाम बातों से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। यह सफर यहीं खत्म नहीं होता बल्कि 5 किलोमीटर की दूरी तय कर दालकोला पूर्णिया मोड़ तक जाता है। जिसके बाद इस इलाके ग्रामीण शहरी क्षेत्रों का रूख करते हैं। 

...यदि कोई बीमार पड़ जाए तो मौत निश्चित : 
बाढ़ या बारिश की दिनों की बात छोड़िए आम दिनों में भी अगर अचानक कोई बीमार हो जाए तो उसे इलाज के लिए बाहर भेजना किसी मुसीबत से कम नहीं होता है। बीमार लोग या तो इलाज के अभाव में तड़पते हैं या फिर रास्ते में ही उनका दम निकल जाता है। किसी तरह यदि मालोपाड़ा तेलंगा घाट पहुंच गए तो गनीमत है यदि नहीं पहुंच सके तो मौत निश्चित...। कुछ ऐसे हालात हैं इस इलाके के। देश और दुनिया से जुड़ने के लिए इस इलाके के लोगों को हर हाल में मालोपाड़ा तेलंगा घाट तक पहुंचना पड़ता है। जिसके बाद ही उनकी गाड़ी शहर की ओर सरपट दौड़ती है। इस रेस में करीब 50 हजार ग्रामीणों का साथ देते हैं नाविक ओमप्रकाश। ओमप्रकाश बताते हैं कि इस इलाके में सालोंभर महानंदा और कनकई का कहर जारी रहता है। जिससे पूरा इलाका टापू बना रहता है। चाहे गांव से कहीं आना हो या कहीं जाना हो ओमप्रकाश ही खेवनहार हैं और नाव के सहारे वे ग्रामीणों को नदी से पार लगाते हैं। इस क्रम में यदि नाव छूट जाए तो आपको घंटों इंतजार करना पड़ता है। ऐसा नहीं कि ग्रामीणों के द्वारा सरकार व जिला प्रशासन से तीन चार नाव की मांग नहीं की गई है। लेिकन इसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। नाव पर सवार ताराबाड़ी टिकट टोला के मो मुजम्मिल बताते हैं कि हमारी जिंदगी जद्दोजहद देखते हुए ही गुजरी है। एक अन्य महिला मसोमात साबरी बताती हैं कि आजतक हमने किसी पदाधिकारी को अपने गांव आते नहीं देखा है। जो भी अधिकारी बाढ़ के दौरान इलाके में आते हैं वे नदी के उस पार मालोपाड़ा तेलंगा घाट तक ही आते हैं और वहीं से सर्वे रिपोर्ट तैयार वापस लौट जाते हैं। हरेक साल की यही कहानी है। मो शाहिद आलम बताते हैं कि इस इलाके में जन्म लेना और जीना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है। पूरे इलाके का जीवन किसी संघर्ष से कम नहीं है। 

...भेजा गया है प्रस्ताव : 
महानंदा और कनकई नदी पर पुल निर्माण काे लेकर विभाग को प्रस्ताव भेजा गया है और पास होने के बाद पुल का निर्माण कराया जाएगा। फिलहाल नाव की कमी नहीं है सभी घाटों पर दो तीन की व्यवस्था की गई है। 
: अमरेंद्र कुमार पंकज, एसडीओ, बायसी।

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