बिहार : आधुनिकता के दौर में समाप्ति के कगार पर है कुआं - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

बिहार : आधुनिकता के दौर में समाप्ति के कगार पर है कुआं

- एक तरफ सरकार द्वारा जल संचयन के लिए और लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए लाखों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं वहीं कभी लोगों की प्यास बुझाने वाले कुएं के अस्तित्व पर वर्तमान में प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है
Modernity-kills-well
निक्कू कुमार झा । चंपानगर : एक समय था जब कुआं लोगों की प्यास बुझाता था लेकिन वर्तमान में अब कुआं खुद प्यासा है। कुआं के अस्तित्व पर ग्रहण सा लग गया है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में तो कहीं कहीं कुआं नजर आता है। जब लोग कुओं पर आश्रित थे तब जलस्तर भी ठीक था। एक तरफ सरकार द्वारा जल संचयन के लिए और लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए लाखों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं वहीं कभी लोगों की प्यास बुझाने वाले कुएं के अस्तित्व पर वर्तमान में प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। प्राचीन काल से नदी के बाद कुआं मानव सभ्यता का आवश्यक अंग रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शहर की कौन पूछे गांवों में भी कुआं की संख्या तेजी से कम हो रही है। नया कुआं खुद नहीं रहा बल्कि पुराना कुआं भी घर बनाने की महंगी हो रही जमीन के बीच दफन हो रहा है। कुआं हिंदू संस्कृति में शादी की रस्म और परंपरा से जुड़ा है। हर युवक और युवती की शादी में कुआं से एक हाथ के सहारे पानी खींचने की रस्म होती है। लेकिन कुआं के अभाव में इस रस्म पर संकट आ गया है। गांव में खोजने से भी शादी में कुआं नहीं मिलता है। गांव की कौन पूछे शहर में भी आमलोगों तक पानी पहुंचाने का सिस्टम ध्वस्त हो गया है। कभी लोगों की प्यास बुझाने के साथ कई धार्मिक संस्कारों की भी कुआं पूरा कराते थे। लेकिन आधुनिकता के इस दौर में अब इन कुओं को कोई पूछ नहीं रहा है। पहले कुआं कई तरीके से पानी की समस्या को दूर करता था। इसे विलुप्त होने से बचाने की जरूरत है।

...अब देखने को नहीं मिलता है कुआं : 
गांव से लेकर शहर तक कुआं देखने को नहीं मिलता है। पहले गर्मी के मौसम में गांव के लोग इकट्ठे होकर दिन भर कुंआ की सफाई करते थे। अब यह सब देखने को नहीं मिलता है। : पशुपतिनाथ सिंह, निवासी, प्राणपट्टी

...शादी विवाह में होती है परेशानी : 
अब शादी विवाह में भी कुआं में पानी भरने का प्रचल दिनों दिन खत्म होते जा रहा है। कुंआ हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। लोग जमीन की अधिक बर्बादी के कारण इसे समाप्त कर रहे हैं। : अंजुला देवी, निवासी, मसुरिया

...चापाकल ने कुआं की परंपरा तोड़ी : 
गांवों में चापाकल ने कुआं की परंपरा ही तोड़कर रख दी है। कुआं घरेलू उपयोग के साथ  सिंचाई के लिए मजबूत साधन होता था। अब कुआं खुदाई का काम दिखता ही नहीं है। : राजू कुमार, निवासी, चंपानगर

...सरकारी स्तर से भी नहीं हो रहा प्रयास : 
गांव में कुआं वर्षा जल संचय का भी साधन होता था। इससे लोग तरह तरह का काम कर लेते थे। लेकिन अब कहीं कुआं दिखता ही नहीं है। सरकारी स्तर से भी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं होता है। : नीरस झा, निवासी, चंपानगर

...कुआं का नहीं है कोई विकल्प : 
समय के साथ सब बदल रहा है। कुआं की सुविधा दूसरा विकल्प नहीं दे सकता है। अब पानी के कई विकल्प आ गए हैं। इसके बावजूद भी हर गांव में गांव का अस्तित्व जिंदा रखना जरूरी है। जल संरक्षण की दिशा में भी यह महत्वपूर्ण हो सकता है। : पंकज दास, निवासी, चंपानगर

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