बिहार : सरकारी उपेक्षा से बांस की खेती से विमुख हो रहे कोसी और सीमांचल के किसान - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

बिहार : सरकारी उपेक्षा से बांस की खेती से विमुख हो रहे कोसी और सीमांचल के किसान

- कोसी और सीमांचल का ग्रामीण तबका बांस से बने सामानों का करता है बड़े पैमाने पर उपयोग
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कुमार गौरव । पूर्णिया : कोसी और सीमांचल के ग्रामीण परिवेश में बांस की खेती और इससे बने सामानों की अहम उपयोगिता है लेकिन हावी हो रही भौतिक सुख सुविधाएं अपना असर दिखा रही हैं और गांव कसबों में किसान बांस की खेती से विमुख हो रहे हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने व उचित मूल्य नहीं मिलने के कारण किसानों ने बांस की खेती से किनारा कर लिया है। कुछ वर्ष पूर्व तक सरकार द्वारा राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को सरकारी लाभ के साथ साथ बांस की खेती के लिए प्रोत्साहित भी किया जा रहा था। बाढ़ की विभीषिका झेलने वाला सूबे का उत्तरी बिहार का यह पूरा इलाका पग पग पोखर माछ मखान और पान के अलावा बांस की खेती के लिए भी मशहूर है लेकिन इसे सरकारी उदासीनता ही कहेंगे कि यह पूरा इलाका अब बांस की खेती से दूर हो रहा है। बीकोठी के किसान सह शिक्षक सुनील झा बताते हैं कि बांस की खेती अब लाभकारी नहीं रही। जिले में बांस आधारित उद्योग लगाए जाने से क्षेत्र का कायाकल्प हो सकता है। उद्योग के प्रारंभ होने से इस पिछड़े इलाके में रोजगार के अवसर सृजित होंगे और मजदूरों का पलायन भी रूकेगा। वहीं राकेश सिंह कहते हैं कि इस दिशा में बागवानी मिशन के उपेक्षापूर्ण रवैये का ही परिणाम है कि बांस का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में सिर्फ टोकरी, सूप, दौरा, डाला, खिलौना बनाने या फिर घर में खूंटे व टाट के अलावा जलावन के रूप में किया जा रहा है। 

...नहीं मिलती है आर्थिक सुरक्षा की गारंटी :
आर्थिक सुरक्षा की गारंटी नहीं रहने के कारण अब इन इलाकों के किसानों का बांस की खेती से मोहभंग हो रहा है। कोसी और सीमांचल में कागज उद्योग की प्रचुर संभावनाएं हैं। इस उद्योग के लिए वुड पल्प से बेहतर कच्चा माल बांस के पल्प को ही माना जाता है। देश के नामी गिरामी पेपर इंडस्ट्रीज भी कच्चे माल के तौर पर बांस का ही इस्तेमाल करते हैं। इतना ही नहीं कागज उद्योग के जानकारों का मानना है कि बांस के पल्प से बने कागज न सिर्फ रिसाइकल किए जा सकते हैं बल्कि इसका पर्यावरण पर भी कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। कागज की जो लुगदी तैयार होती है उसके लिए बांस से बेहतर कच्चा माल और कोई नहीं हो सकता है। इलाके में बांस की खेती को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। बांस आधारित कागज, फर्नीचर एवं अन्य किसी भी उद्योग की स्थापना नहीं होने के कारण किसान औने पौने कीमत पर बांस बेच देते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में घर बनाने के अलावा इसका सिर्फ जलावन के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता है। 

...फ्लॉप हुआ राष्ट्रीय बांस मिशन :
बिहार राज्य बांस मिशन वन क्षेत्र एवं गैर वन क्षेत्र के तहत कोसी और सीमांचल के जिलों का चयन किया गया था लेकिन हकीकत यही रही कि इन दो प्रमंडलों के जिलों में बांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए की जा रही प्रशासनिक कवायद नाकाफी साबित हुई। इसी का परिणाम यह रहा कि तमाम प्रशासनिक प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय बांस मिशन फ्लॉप हो गया। दरअसल राष्ट्रीय बांस मिशन कार्यक्रम देशभर में कृषकों के आर्थिक उन्नयन का कारण बना था लेकिन सबसे अधिक संभावना वाले कोसी और सीमांचल में यह योजना धरातल पर उतरने से पूर्व ही बंद हो गई। जबकि कृषि व जल विशेषज्ञों का कहना है कि बाढ़ की विभीषिका रोकने में बांस सबसे उपयोगी साबित हो सकता है। जानकारों का कहना है कि बाढ़ प्रभावित इलाके में बांस के पौधे लगाने से वहां कटाव की संभावना काफी कम हो जाती है। इसलिए तटबंध के अंदर इसका बड़ा फायदा मिल सकता है।

...नहीं है कोई नई कार्ययोजना :
स्थानीय स्तर पर बांस की कोई नर्सरी नहीं होने के कारण बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए फिलहाल कोई नई योजना नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व कोसी क्षेत्र में बांस उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए केन एंड बैंबू टेक्नोलॉजी सेंटर (गुवाहाटी) से आए वैज्ञानिकों के दल ने क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को प्रशिक्षण दिया था और वैज्ञानिकों ने कोसी व सीमांचल के मौसम को बांस उत्पादन के लिए उपयुक्त माना था। राष्ट्रीय बांस मिशन योजना के तहत बांस घर को महादलित बस्तियों में प्रायोगिक तौर पर बनाया गया था और बाद में इसे वृहत रूप देने की योजना थी। यह घर भूकंपरोधी होने के साथ साथ पर्यावरणीय दृष्टि से भी बेहद उपयुक्त है। : उपेंद्र कुमार, सहायक निदेशक उद्यान, पूर्णिया।

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