देवशयनी एकादशी पर मिलेगा ‘श्रीहरि’ का वरदान - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 11 जुलाई 2019

देवशयनी एकादशी पर मिलेगा ‘श्रीहरि’ का वरदान

आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष के अवसर पर 12 जुलाई शुक्रवार को देवशयनी एकादशी है। शास्त्रानुसार विवाह आदि मांगलिक कार्य ऐसे में अब से 4 माह तक पूरी तरह से निषेध रहेंगे। इस दौरान साधू-संतों द्वारा विशेष देव आराधना होगी। मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु चार माह तक क्षीर सागर में विश्राम करते हैं। इस दौरान सृष्टि की बागडोर भगवान शिव संभालते हैं। मतलब साफ है 12 जुलाई से ठीक चार महीने तक श्रीहरि की कृपा नहीं मिलेगी। जबकि उनकी कृपा के बिना कोई भी शुभ कर्म सफल नहीं हो सकता है। इसलिए जब तक श्रीहरि योग निद्रा में हैं तब तक कोई भी शुभ काम करने से बचना चाहिए। लेकिन देवशयनी एकादशी योग निंद्रा में श्रीहरि से मनचाहा वरदान मांगा जा सकता है 

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देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक का समय ही चातुर्मास कहलाता है। साधकों द्वारा जहां इन चार महीनों में विशेष देव आराधना की जाती है, जबकि विवाह आदि मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं। साधू-संत व सन्यासियों द्वारा इन चार महीनों में एक ही स्थान पर रहकर साधना व तप करते हैं। क्योंकि तीर्थ स्थानों के लिए यात्रा करना इन दिनों में ठीक नहीं माना जाता है। धार्मिक यात्राओं में केवल ब्रज यात्रा ही शुभकारी मानी जाती है। ब्रज के संबंध में यह मान्यता है कि इन चार मासों में सभी देव एकत्रित होकर ब्रज में ही निवास करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार आज से ठीक चार महीने के लिए श्रीहिर विष्णु पाताल लोक में सोने यानी योगनिद्रा में चले जाते हैं। फिर चार महीने बाद यानि कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को उठते हैं। इसलिए चार महीने तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किए जा सकते। देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी और पद्मनाभा के नाम से भी जाना जाता है। इसी रात्रि से भगवान श्रीहरि का शयन-काल आरंभ हो जाता है जिसे चातुर्मास या चैमासा का प्रारंभ भी कहते हैं। 

इसके पश्चात चार माह के अतंराल के बाद सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करने पर विष्णु का शयन समाप्त होता है तथा इस दिन को देवोत्थानी या देवउठनी एकादशी का दिन होता है। भगवान विष्णु के शयनकाल में चले जाने के बाद चार माह की अवधि में सृष्टि संचालन का जिम्मा शिव परिवार पर रहता है। इस दौरान पवित्र श्रावण मास आता है जिसमें एक माह तक भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व होता है। इसके बाद आती है गणेश चतुर्थी। गणपति की स्थापना कर उनका पूजन किया जाता है तथा उसके पश्चात देवी दुर्गा की आराधना के नौ दिन शारदीय नवरात्रि आती है। कहते है इस दिन अगर विधि विधान से पूजन अर्चन की जाय तो सामूहिक पापों और समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। दुर्घटनाओं के योग टल जाते हैं और व्यक्ति का मन शुद्ध होता है। शरीर और मन में नएपन का आभास होता है। उपासना से आपकी हर कामना पूरी हो सकती है। लेकिन, इस पौराणिक परंपरा व मान्यता से व्यवहारिक पहलू भी जुड़े हुए हैं। चूंकि हमारा देश कृषि प्रधान है, ऐसे में बारिश के चार महीने खासा महत्वपूर्ण होते हैं। इन दिनों में किसान अपने खेतों में अतिरिक्त परिश्रम करते हैं। ऐसे में अगर मांगलिक कार्य जारी रहेंगे तो मूल मानवीय कर्तव्यों को पूरा कर पाना खासा मुश्किल होगा।  पुराणों के अनुसार एक बार राजा बलि को अपनी शक्ति और धन का घमंड हो गया था। तभी श्रीहरि विष्णु ने बलि का घमंड तोड़ने के लिए वामन रूप लिया। श्री हरि ने वामन रूप में बलि से तीन पग दान के रुप में मांगे। पहले ही पग श्रीहरि ने सभी दिशाओं सहित संपूर्ण पृथ्वी और आकाश को नाप लिया। दूसरे पग में प्रभु ने स्वर्ग को नाप लिया। अब तीसरा पग रखने के लिए कुछ भी बाकी न बचा तो बलि ने अपना सिर आगे करते हुए निवेदन किया कि प्रभु अपना तीसरा पग मेरे शीष पर रखिए। बलि के इस समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने बलि को पाताल का राजा बना दिया और वरदान मांगने को कहा। बलि ने कहा प्रभु आप सदैव मेरे महल में रहें। अब भगवान विष्णु बलि के बंधन में बंध चुके थे। ऐसे में माता लक्ष्मी ने बलि को अनपा भाई बनाकर उससे भगवान को वचनमुक्त करने का अनुरोध किया। उसी दिन से 4 महीने के लिए श्रीहरि विष्णु पाताल में निवास करते हैं। इसके बाद महाशिवरात्रि तक भगवान शिव और शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक ब्रह्मा जी बलि के पाताल लोक में निवास करते हैं। एक अन्य मान्यतानुसार मान्यता के अनुसार एकादशी की तिथि को शंखासुर दैत्य मारा गया था। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाएं तो हरि और देव का अर्थ तेज तत्व से भी है। इस समय में सूर्य, चन्द्रमा और प्रकृति का तेज़ कम होता जाता है, इसीलिए कहा जाता है कि देव शयन हो गया है। तेज तत्व या शुभ शक्तियों के कमजोर होने पर किये गए कार्यों के परिणाम शुभ नहीं होते और शुभ कार्यों में बाधा आने की आशंका बनी रहती है। इसलिए देवशयनी एकादशी से अगले चार माह तक शुभ कार्य करने की मनाही होती है। 

सावन माह कब तक है
सावन माह शिवजी का प्रिय माह माना गया है। इस साल ये माह 15 अगस्त तक रहेगा। इसी दिन रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाएगा। इस माह में शिवजी का अभिषेक करने का विशेष महत्व है। 

पूजा का शुभ मुहूर्त -
इस साल हरिशयनी एकादशी 11 जुलाई को रात 3ः08 से 12 जुलाई रात 1ः55 मिनट तक रहने वाली है। प्रदोष काल शाम साढ़े पांच से साढे सात बजे तक रहेगा। माना जाता है कि इस दौरान कि गई आरती, दान पुण्य का विशेष लाभ भक्तों को मिलता है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान को नए वस्त्र पहनाकर, नए बिस्तर पर सुलाएं क्योंकि इस दिन के बाद भगवान सोने के लिए चले जाते हैं।

पूजन विधि 
देवशयनी एकादशी के दिन सुबह घर की साफ सफाई, नित्य कर्म व स्नान आदि करने के बाद घर को गंगा जल से पवित्र कर लें। अब पूजा स्थल पर भगवान श्री कृष्ण की सोने, चांदी, तांबे या पीतल की मूर्ति स्थापित करें। पूजन के लिए धान के ऊपर जलपात्र रखें व उसे लाल रंग से बांध दें। जिसके बाद धूप व दीप व फूलों से श्री हरि की पूजा करना चाहिए। पूजन के दौरान व्रत कथा का पाठन जरूर करें। जिसके बाद सभी को प्रसाद वितरण करें। अंत में चादर, गद्दे, तकिए, पलंग पर श्रीविष्णु को शयन कराएं। घर में लहसुन प्याज और तामसिक भोजन बिल्कुल भी ना बनाएं और ना ही खरीद कर लाएं। पूजा पाठ में साफ-सुथरे कपड़ों का ही प्रयोग करें, हो सके तो काले नीले वस्त्र प्रयोग न करें। परिवार में शांतिपूर्वक माहौल रखें। पूजा में पीले फल और फूल अवश्य प्रयोग करें। किसी भी विष्णु मंदिर में जाकर दोनों हाथों से पीले फल फूल भगवान विष्णु को अर्पण करें। मंदिर में घी का दीपक जलाकर तथा भगवान विष्णु के सामने अपने मन की इच्छा कहें। किसी आसन पर बैठकर ओउम क्लीं कृष्णाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें। वापिस घर आते समय रास्ते में मिलने वाले पहले जरूरतमंद व्यक्ति को पीला फल या मिठाई अवश्य दें। देवशयन के चातुर्मासीय व्रतों में पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद, मूली, पटोल एवं बैगन आदि का सेवन वर्जित माना जाता है। शाम के समय केले के पौधे के नीचे फिर से गाय के घी का दिया जलाएं। इसके बाद अपने मन की इच्छा भगवान विष्णु के सामने कहे। अब यह केले का पौधा किसी भी विष्णु मन्दिर या भगवान कृष्ण के मंदिर में रखकर आए। चातुर्मास्य में प्रतिदिन भगवान विष्णु के समक्ष ‘पुरुष सूक्त’ का जप करने का भी महात्म्य है।

नहीं गूंजेगी शहनाई 
शहनाई की गूंज पूरी तरह से थम जायेगी। इन चार महीनों में वृहस्पति अस्त हो जाते हैं। वैसे तो इस साल विवाह के लिए कुल 12 शुभ लग्न है। किंतु, आठ जुलाई के बाद वैवाहिक बंधन में बंधने के लिए लोगों को चार महीने का इंतजार करना होगा। विभिन्न पंचांगों के अनुसार आठ जुलाई को विवाह का आखिरी मुहूर्त है। जिसके बाद 12 जुलाई से वृहस्पति के अस्त होते ही चतुर्मास शुरू हो जायेंगे। आठ नवंबर को देवोत्थान एकादशी को भगवान विष्णु अपनी निंद्रा से जागेंगे और उसके बाद विवाद सहित अन्य लग्न का मुहूर्त शुरू हो जायेगा। मंगलवार, 16 जुलाई को खंडग्रास चंद्रग्रहण होगा। इसी दिन गुरु पूर्णिमा है, शाम 4.30 बजे तक ही गुरु पूर्णिमा मनाई जाएगी। इसके बाद शाम 4.30 बजे से चंद्रग्रहण का सूतक शुरू हो जाएगा। ग्रहण का स्पर्श रात्रि 1.30 बजे से मध्यकाल 2.58 बजे, चंद्रग्रहण का मोक्ष 17 जुलाई को की सुबह 4.30 बजे होगा। इसके बाद 17 जुलाई से ही सावन माह शुरू हो जाएगा। कहते है जब चंद्रमा, पृथ्वी और सूर्य एक ही लाइन में आ जाते हैं, तब चंद्र पर पृथ्वी की छाया पड़ती है और चंद्र दिखाई नहीं देता है। इसे ही चंद्र ग्रहण कहा जाता है। पिछले वर्ष 27 जुलाई को खग्रास चंद्र ग्रहण हुआ था। इस बार गुरु पूर्णिमा पर होने वाले खंडग्राम ग्रहण-ग्रहों का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो 149 वर्ष पूर्व 1870 में 12 जुलाई को बना था। जब गुरु पूर्णिमा पर चंद्रग्रहण हुआ था। उस समय भी शनि, केतु, चंद्रमा धनु राशि में थे। सूर्य, राहू के साथ मिथुन राशि में था। 



-सुरेश गांधी-

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