विशेष : ‘कटमनी’ से कटेगी दीदी की सियासी ‘पतंग’ - Live Aaryaavart

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शनिवार, 13 जुलाई 2019

विशेष : ‘कटमनी’ से कटेगी दीदी की सियासी ‘पतंग’

कट मनी को लेकर पश्चिम बंगाल में सड़कों पर छिड़ी जंग थमने का नाम नहीं ले रही है। वहां ममता सरकार के खिलाफ हर रोज प्रदर्शन हो रहे हैं। बीजेपी जहां कोलकाता में ममता बनर्जी को घेर रही है वहीं अब संसद में भी ये मुद्दा गरम हो गया है। उधर, तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में रिश्वत के प्रचलन पर ममता बनर्जी ने भी हामी भर दी है। इसके लिए उन्होंने जनता से माफी भी मांगी है। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है क्या ममता दीदी की स्वीकारोक्ति पार्टी के सितारे गर्दिश में डालेगी या फिर उनकी छवि लोगों में भ्रष्टाचार से लडऩे वाली योद्धा की बनाने में मददगार होगी? क्या दीदी अपनी हार के लिए कट मनी को जिम्मेदार मान रही है? क्या 2021 की खतरा को भाप दीदी अभी से माफी मांग रही है? क्या ममता की कट पाॅलिसी काटेगी 2021 की डोर? क्या कट मनी में शामिल आरोपियों को बचाने के लिए पश्चिम बंगाल में दीदी ने कराया पहले कत्लेआम अब मांग रही है माफी और क्या जनता उन्हें इसके लिए माफ करेगी? 

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बेशक, पश्चिम बंगाल की गरीब जनता की जेब काटकर निकाली गई कटमनी टीएमसी नेताओं के लिए ’फटाफट मनी’ बनी हुई है। इस फटाफट मनी का पूरा नेक्सस है। एक चेन है जिसमें सबका कट फिक्स है। बंगाल में सरकारी फायदे चाहिए तो कट रेट फिक्स है। प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत घर चाहिए तो 25 हजार तक कटमनी का रेट है। सरकारी टॉयलेट में अगर 18 हजार रुपए चाहिए तो 3600 पहले ही कटमनी में कट जाएंगे। मनरेगा जिसके तहत 100 दिन की मजदूरी देने का नियम है उसके लिए मजदूरों से भी 56 रुपए कट में ले लिए जाते थे। वृद्धा और विधवा पेंशन वालों से भी 200 रुपए तक वसूलने की बात सामने आ रही। बता दें, चाहे वह किसी सरकारी फंड को पाने के लिए हो, या स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में नौकरी पाने के लिए या कॉलेज में एडमिशन या अस्पताल में बिस्तर पाने के लिए कट मनी आठ साल से (तृणमूल के शासनकाल) में सामान्य प्रक्रिया हो गई है। अब तो मुर्दो से भी कटमनी लिया जा रहा है। 

खासकर कट-वसूली के बारे में ममता की स्वीकारोक्ति यह बताती है कि कुछ चीज़ें उनको भी पता थीं जिन्हें अबतक वो शायद पार्टी के स्वार्थ में नज़रअंदाज़ करती आई हैं। लेकिन उनके कह देने से ही भ्रष्टाचार या सिंडिकेट राज खत्म नहीं हो जाएगा, के सवाल पर अब भी जनता को भरोसा नहीं है। क्योंकि पार्टी में एक दो नहीं बल्कि पूरी पार्टी में ऐसे लोगों की संख्या काफी है जो नीचे से ऊपर तक इस काली कमाई से जुड़े हैं। मतलब साफ है टीएमसी और उसके कार्यकर्ताओं की कमाई का जरिया है ‘कट मनी’। खासतौर से तब इस पर मुहर लग जाती है जब खुद एक बड़ी सभा में ममता बनर्जी ने निराशा जाहिर करते हुए कहा कि तृणमूल नीचे तक भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी हुई है और अब समय आ गया है कि इस पर काबू पाने के लिए सख्त रवैया अपनाया जाएं। कहा, ’’मुझे पार्टी में चोर नहीं चाहिए। जिन्होंने लोगों से पैसा लिया है, वे जाकर उन्हें लौटा दें। आप लोग तो मुर्दों को भी नहीं छोड़ रहे हैं और गरीबों को अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए सरकार से मिल रहे 2,000 रुपए में से भी 10 फीसदी कमिशन वसूल ले रहे हैं।’’

फिरहाल, ममता का हामी वाला बयान पार्टी के संकट में इजाफा ही किया है। ममता इस बात से भी वाकिफ हैं कि भाजपा की चुनौती से जूझने के लिए पार्टी का पुनर्गठन करने और इसकी नई ब्रांडिंग करने का मतलब होगा एकदम नए सिरे से शुरुआत करना। तृणमूल को लोकसभा चुनावों में अपनी अब तक की सबसे बड़ी पराजय झेलनी पड़ी जब उसकी सीटों की संख्या 2014 में 34 से गिरकर 2019 में 22 रह गई। भाजपा का वोट प्रतिशत 40 फीसदी हो गया और सीटों की संख्या पिछले चुनावों में दो से बढ़कर 18 हो गई। यह बंगाल में उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। वह अब 2021 के विधानसभा चुनावों में राज्य में सत्ता पर कब्जा करने की फिराक में है। इन नतीजों से सदमा खाई ममता की हताशा हाल की कई घटनाओं में साफ नजर आती है। जैसे कि जय श्री राम का नारा लगाने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर बवाल, बांग्ला न बोलने के लिए ’बाहरी’ लोगों के खिलाफ गुस्सा और पिछले महीने डॉक्टरों की हड़ताल से निबटने में कोताही। इसके अलावा उन्हें बड़ी संख्या में पार्टी नेताओं के पाला बदलकर भाजपा में शामिल होने का भी सामना करना पड़ रहा है। 

ममता की स्वीकारोक्ति उन्हें कितना लाभ पहुंचायेगा ये तो वक्त बतायेगा। लेकिन कट मनी लौटाने का ममता का जुमला मास्टरस्ट्रोक नहीं काल साबित होगा। क्योंकि बीजेपी इसे सालों से उठाती रही है। उसके आरोपों को अब ममता ने सही माना है। हाल यह है कि गरीब से गरीब व्यक्ति को भी केंद्र या राज्य सरकार का कोई अनुदान हासिल करने के लिए स्थानीय टीएमसी नेताओं को कमिशन देना पड़ता है। इस स्वीकारोक्ति का इससे खराब समय और नहीं हो सकता था। इसका मूल मकसद भले ही छवि को बदलने की कवायद करने का रहा हो लेकिन प्रचार में इसका असर उलटा रहा और इसने विपक्षी दलों को तृणमूल के खिलाफ नए हथियार दे दिए हैं। भाजपा राज्य भर में विरोध प्रदर्शन कर रही है और उसका आरोप है कि वसूली करने वालों के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराने वाले कैडर पर तृणमूल के लोग हमले कर रहे हैं। कई जगहों पर स्थानीय तृणमूल नेताओं की उन लोगों ने घेराबंदी भी की है जो जड़ तक पहुंचे इस भ्रष्टाचार से पीड़ित रहे हैं। 

इनमें से एक शंकर बागड़ी जैसे गरीब ग्रामीण भी हैं। बागड़ी बीरभूम जिले के सैंथिया इलाके में पाइकपाड़ा से हैं। उन्होंने एक पक्का मकान बनाने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (पीएमएवाइ-जी) के तहत अनुदान के लिए आवेदन किया था। तीन साल पहले जब से उनका नाम लाभार्थियों की सूची में आया था, तब से बागड़ी तृणमूल के स्थानीय दफ्तरों के चक्कर काटे जा रहे हैं और पंचायत के सदस्यों से मिल रहे हैं। उनका आरोप है कि इस साल जब उन्होंने तृणमूल के स्थानीय आकाओं को 7,000 रु. की रिश्वत दी तब जाकर पीएमएवाइ की 40,000 रु. की पहली किस्त उनको मिली. चूंकि वे और 3,000 रु. की रिश्वत देने में नाकाम रहे, इसलिए उन्हें डर लग रहा है कि अनुदान के बाकी बचे 80,000 रुपए शायद उन्हें नहीं मिल पाएंगे। लिहाजा इस मॉनसून में बागड़ी का मकान अधबना ही रह गया है। उसकी न छत है और न ही दीवारें। दरअसल, पश्चिम बंगाल में भाजपा व टीएमसी अपने अपने चुनावी एजेंडे को 2021 से पहले ताकतवर बनाने की लड़ाई में जुट गयी है। जिसमें एक तरफ ममता बनर्जी और दूसरी तरफ टीम मोदी है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के तुरंत बाद से तैयारी दोनों तरफ से शुरू हो गई। 

कट मनी के साथ अब बंगाल की राजनीति में जय श्रीराम, जय मां काली, जय हिंद, जय बांग्ला वाली लड़ाई चल रही है। इसी पर फिलहाल बीजेपी और टीएमसी के बीच एक दूसरे को मात देने का खेल चल रहा है। दोनों के पास दो साल का वक्त है जिसमें बीजेपी ने ममता बनर्जी की राजनीति को 2021 में धराशायी करने और ममता बनर्जी ने बंगाल में बीजेपी के सियासी कदम को विधानसभा के लिए रोकने में पूरा ज़ोर लगा दिया है। सरकारी योजनाओं के तहत मिलने वाला अनुदान दरअसल प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण होता है। लेकिन लाभार्थी आरोप लगाते हैं कि कट-वसूली की मांग करने वाले तृणमूल के नेता उनके बैंक और पोस्ट ऑफिस दस्तावेज जैसे पासबुक और नगद निकासी पर्ची आदि कब्जे में कर लेते हैं। बीरभूम में हटोड़ा पंचायत के एक गांव में रहने वाले सुखदेव दोलुई कहते हैं, ’’वे अनुदान राशि का एक-एक पैसा निकाल लेने के बाद ही कागजात लौटाते हैं। हमें पैसा निकासी पर्ची पर दस्तखत कर उन्हें सौंपने के लिए मजबूर किया जाता है।’’ अब चाहे वह मनरेगा का वेतन हो, शौचालय बनाने के लिए अनुदान हो, पीएमएवाइ-जी का पैसा हो या स्कूल शिक्षकों की भर्ती, बिना ’कीमत’ चुकाए कोई काम आगे नहीं बढ़ता। हटोड़ा पंचायत के निवासी श्यामल बागड़ी कहते हैं, ’’मुझे मनरेगा जॉब कार्ड के लिए 7,000 रु. की घूस देनी पड़ी। जब मैं बकाया लेने के लिए गया तो पाया कि पंचायत रिकॉर्ड में मेरे जॉब कार्ड के आगे दो अन्य नाम लिखे हुए थे।’’ उनका आरोप है कि तृणमूल नेता और पंचायत अध्यक्ष ने उन्हें ठगा है। यह तो कुछ वाकयों की बानगीभर है शिकायतों की सूची लाखों में है। हालांकि इस तरह का भ्रष्टाचार तो हर प्रांत में है और चोरी-छिपे होता है लेकिन लेकिन पश्चिम बंगाल में तो रिवाज बन गया है और कट मनी देने से इंकार करने वाले व्यक्ति को जान तक की कीमत चुकानी पड़ती है। 

वैसे भी लोकसभा चुनाव के बाद से बंगाल में हिंसा का दौर चल रहा है- बमबाजी, मार काट, हत्याएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। अब जब कट मनी वापस करने की बात आयेगी तो बवेला खड़ा होगा। जबरन वसूली एक गैर ज़मानती अपराध है। दोषी पाए गए तो भारतीय दण्डविधि की धारा 384 और 386 के अंतर्गत 3 से 10 साल जेल और जुर्माना तक हो सकता है। और अगर कोई कमीशन का पैसा वापस करता है तो वह कानून की नजर में ’एडमिशन ऑफ़ गिल्ट’ होगा। ऐसे में सवाल यह है कि तृणमूल के कौन से नेता आगे आएंगे? कोई आएगा भी? यह मामला अब दिलचस्प होता जा रहा है। दरअसल, ममता की पूरी राजनीति मुस्लिम वोट बैंक पर टिकी है। आंकड़ों के मुताबिक पूरे देश की कुल आबादी में मुस्लिम आबादी 14 फीसदी हैं, लेकिन बंगाल की कुल आबादी में ये आंकड़ा 28 फीसदी है। मुस्लिम वोटर टीएमसी को वोटिंग भी करते है। पश्चिम बंगाल की करीब 9 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां पर मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से भी ज़्यादा है। पश्चिम बंगाल की विधानसभा में करीब 125 सीटें ऐसी हैं, जहां पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। दिलचस्प बात ये है कि 2016 के चुनाव में इन 125 सीटों में ममता बनर्जी ने बंपर 90 सीटें जीती थीं। यानी ममता बनर्जी की रणनीति यही लगती है कि वो पूरी तरह से मुस्लिम वोटों को एकजुट कर लेंगी, और अपने कट्टर समर्थकों को बनाए रखेंगी। तो ये 2021 के चुनाव में उनकी राजनीति को पार लगा सकता है। 



-सुरेश गांधी-

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