बिहार : सुशील मोदी आर्गेनिक फेस्टिवल में शिरकत करेंगे 4 दिसम्बर को - Live Aaryaavart

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

बिहार : सुशील मोदी आर्गेनिक फेस्टिवल में शिरकत करेंगे 4 दिसम्बर को

sushil-modi-will-participate-organic-festival
पटना,2 दिसम्बर (आर्यावर्त संवाददाता)। पटना नगर निगम के वार्ड नम्बर 1 में है येसु समाज के जेवियर टीचर ट्रेनिंग इंस्टीच्यूट (एक्स.टी.टी.आई.)।इस एक्स.टी.टी.आई. की भूमि पर स्थित है पर्यावरणीय संस्था तरूमित्र। इस तरूमित्र संस्था में स्कूलों के विघार्थियों को जोड़कर पर्यावरण संबंधी जानकारी देकर जागरूकता उत्पन्न किया जाता है। इसके संस्थापक फादर रोबर्ट अत्तिकल रहे हैं, जिन्होंने संस्था को शिखर पर पहुंचाने में कोई कंजूसी नहीं किए। फिलवक्त फादर रोबर्ट का स्थानान्तरण कर दिया गया है। उनके बदले संस्थापक फादर टोनी पेनडानाथ हैं। देवोप्रिया दत्ता संयोजक हैं।

आर्गेनिक फेस्टिवल 4 दिसम्बर को होगा।
पर्यावरणीय संस्था तरूमित्र के द्वारा 4 दिसम्बर को आर्गेनिक फेस्टिवल मनाने का निश्चय किया गया है। इस अवसर सूबे के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी व कृषि मंत्री डॉ.प्रेम कुमार आ रहे हैं। स्कूल और कॉलेज के छात्र-छात्राओं के द्वारा हार्वेस्टिग एण्ड थ्रेसिंग का कार्य करेंगे। 5 एकड़ में जैविक खेत से धान पैदा किया गया है।

स्कूल और कॉलेज के छात्र-छात्राओं को बताया जाता है:
जैविक खेती देशी खेती का आधुनिक तरीका है। जहां प्रकृति एवं पर्यावरण को संतुलित रखते हुए खेती की जाती है।इसमें रसायनिक खाद कीटनाशकों का उपयोग नहीं कर खेत में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फसल अवशेष, फसल चक और प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे रॉक फास्फेट, जिप्सम आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं। फसल को प्रकृति में उपलब्ध मित्र कीटों, जीवाणुओं और जैविक कीटनाशकों द्वारा हानिकारक कीटों तथा बीमारियों से बचाया जाता है।

जैविक खेती की आवश्यकता:
आजादी के समय खाने के लिए अनाज विदेशों से लाया जाता था, खेती से बहुत कम पैदा होता था, किन्तु जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होती गई, अनाज की कमी महसूस होने लगी। फिर हरित क्रान्ति का दौर आया इस दौर में 1966-67 से 1990-91 के बीच भारत में अन्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। अधिक अनाज उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अंधाधुंध उर्वरकों, कीटनाशकों और रसायनों का प्रयोग किया जाने लगा, जिसके कारण भूमि की विषाक्तता भी बढ़ गई। मिट्टी से अनेक उपयोगी जीवाणु नष्ट हो गए और उर्वरा शक्ति भी कम हो गई।

संतुलित उर्वरकों की कमी के कारण उत्पादन स्थिर सा हो जाता:
आज संतुलित उर्वरकों की कमी के कारण उत्पादन स्थिर सा हो गया है, अब हरित क्रान्ति के प्रणेता भी स्वीकारने लगे हैं, कि इन रसायनों के अधिक मात्रा में प्रयोग से अनेक प्रकार की वातावरणीय समस्याएं और मानव तथा पशु स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं उत्पन्न होने लगी हैं एवं मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी होने लगी है, जिसके कारण मिट्टी में पोषक तत्वों का असंतुलन हो गया हैं। मिटटी की घटती उर्वरकता के कारण उत्पादकता का स्तर बनाए रखने के लिए अधिक से अधिक जैविक खादों का प्रयोग आवश्यक हो गया है।

किसान महंगे उर्वरकों और कीटनाशकों को खरीदने से कर्ज में डूब जाते:
किसान महंगे उर्वरकों और कीटनाशकों को खरीदने से कर्ज में डूब रहे हैं, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति में गिरावट आ रही है। मानव द्वारा रसायनयुक्त खाद्य पदार्थों के प्रयोग से शारीरिक विकलांगता एवं कैंसर जैसी भयंकर बीमारी होने लगी है। इस समस्या के निराकरण के लिए आधुनिक जैविक खेती अवधारणा एक उचित विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है। चूंकि जैविक कृषि में किसी भी प्रकार के रसायनिक आदानों का प्रयोग वर्जित है तथा फसल उत्पादन के लिए वांछित सभी संसाधन किसानों द्वारा ही जुटाने होते हैं।इसलिए किसानों को संसाधनों के उत्पादन, उनका उचित प्रयोग और जैविक खेती प्रबंधन तकनीकी के बारे में प्रशिक्षित करना बहुत आवश्यक है| कुछ अन्य कारण इस प्रकार है, जैसे-1. कृषि उत्पादन में टिकाऊपन लाया जा सके।2. मिटटी की जैविक गुणवत्ता बनाए रखी जा सके।3. प्राकृतिक संसाधनों को बचाया जा सके।

कोई टिप्पणी नहीं:

Loading...