बिहार : कोरोना मामले में प्रभावी सामाजिक एकजुटता के साथ शारीरिक दूरी की आवश्यकता: दीपंकर भट्टाचार्य - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 20 मार्च 2020

बिहार : कोरोना मामले में प्रभावी सामाजिक एकजुटता के साथ शारीरिक दूरी की आवश्यकता: दीपंकर भट्टाचार्य

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पटना 20 मार्च, भाकपा-माले महासचिव काॅ. दीपंकर भट्टाचार्य अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आज सुबह पटना पहंुचे, लेकिन कोरोना वायरस के कारण उन्होंने अपने सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिए हैं. वे सिवान में पार्टी का एक कार्यक्रम संबोधित करने वाले थे. पटना पहुंचे माले महासचिव ने कोरोना वायरस से निपटने के सवाल पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कल के संबोधन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आज कोराना कोई दूर की चीज नहीं रह गई है, बल्कि उसकी गिरफ्त में देश लगातार आता जा रहा है. यह सच है, और कोरोना के खतरे को लेकर नागरिकों को पता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए. लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 30 मिनट के लंबे भाषण में यह पता नहीं चला कि सरकार अपनी तरफ से क्या करेगी? प्रधानमंत्री मोदी ने सभी लोगों को घर पर ही रहने की सलाह दी है. लेकिन जिन लोगों के घर ही नहीं है, वे क्या करेंगे? दैनिक मजदूर घर पर ही ठहर सकें, इसे सरकार आखिर कैसे संभव बनाएगी?  उन्होंने कहा कि कोरोना के नाम पर सोशल डिस्टेंसिंग का चल रहा डिस्कोर्स पूरी तरह गलत है. हमारे देश में जहां कुछ लोग अभी भी अस्पृश्यता व छुआछुत को बढ़ावा देने का काम करते हैं और उसे जायज ठहराते हैं, यह उसी मानसिकता का परिचायक है. इस मामले में दरअसल प्रभावी सामाजिक एकजुटता के साथ व्यक्तिगत दूरी की आवश्यकता है. तभी हम कोरोना से सचमुच लड़ पाएंगे. उन्होंने कहा कि कोरोना से बचाव के लिए विशेष बजटीय प्रावधान, सस्ते दाम पर आम लोगों को जरूरत की चीजें उपलब्ध करवाने  और अन्य जरूरी उपाय करने की बजाए सरकार उलटा ही काम कर ही है. रेलवे स्टेशनों पर भीड़ कम करने के नाम पर प्लेटफार्म टिकट की कीमत 10 रुपए से बढ़ाकर 50. रुपए कर दी गई है. 

कई राज्यों में तो सरकार दमनात्क कार्रवाई तक कर रही है. यह बेहद निंदनीय है.
रोजमर्रे की आर्थिक गतिविधियों को बरकरार रखा जाना चाहिए, जिसका मुख्य मतलब है बहुसंख्यक आबादी की आजीविका को सुरक्षित करना. आजीविका के नुकसान से वेतनभोगी तबकों और समृद्ध लोगों की बनिस्पत कामगार लोगों व गरीबों को कहीं ज्यादा आर्थिक चोट पहंुचती है, इस बात को समझने की जरूरत है. जो लोग घरेलू क्वारंटाइन में हैं या सार्वजनिक बंदी के चलते जिनकी आजीविका प्रभावित हुई है, उन लोगों को सहायता प्रदान करना काफी जरूरी है. सार्वजनिक व्यय में फौरन वृद्धि की जानी चाहिए. सामाजिक सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा उपायों - जैसे कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार और नगदी हस्तांतरण आदि - को बढ़ाने की जरूरत है. इस दिशा में केरल सरकार से देश की दूसरी सरकारें सीख ले सकती हैं. जिसने कोरोना से निपटने के लिए 500 करोड़ रुपए का हेल्थ स्कीम अलग से बनाया है.

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