होली : मिलेगी कष्टों से मुक्ति, होगा शत्रुओं का नाश - Live Aaryaavart

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सोमवार, 2 मार्च 2020

होली : मिलेगी कष्टों से मुक्ति, होगा शत्रुओं का नाश

यह एक संयोग ही है कि इस बार होली के मौके पर गुरु और शनि ग्रह अपनी राशियों में ही रहेंगे। ऐसा 499 साल बाद होली के दिन होने वाला है। ज्योतिषियों की मानें तो ग्रहों का ऐसा दुर्लभ संयोग, 1521 में थी। इस बार 9 मार्च सोमवार को फाल्गुन पूर्णिमा की रात में होलिका दहन किया जाएगा। मंगलवार 10 मार्च को होली खेली जाएगी। यानी इस साल होली पर 9 मार्च को गुरु अपनी धनु राशि में जबकि शनि अपनी राशि मकर में रहेगा। इससे पहले दोनों ग्रहों का ऐसा संयोग 3 मार्च 1521 को बना था। उस दिन भी ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी राशि में मौजूद थे। पूर्णिमा तिथि का आरंभ - 9 मार्च को सुबह 3 बजकर 3 मिनट से तथा समापन - 9 मार्च को रात 11 बजकर 17 मिनट तक है। यानी होलिका दहन का मुहूर्त - 9 मार्च शाम 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 52 मिनट तक है   

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होली रंगों का त्योहार। मस्ती और उमंग का पर्व। शहर पर होली का रंग चढ़ने लगा है। होली मिलन के आयोजनों की शुरुआत हो चुकी है। चेहरे रंग अबीर से पुतने लगे हैं। पुआ, दहीबाड़ा जैसे होली के लजीज व्यंजनों की सुगंध फिजा में तैरने लगी है। कहते है यदि होली के दिन में भगवान विष्णु की मन से पूजा की जाए तो किसी भी तरह के सांसारिक सुखों का अभाव जीवन में नहीं रहता है। इस दिन भगवान शंकर ने कामदेव को तपस्या भंग करने के प्रयास से क्रोधित हो भस्म किया था। इस कारण हम मन के कुलषित काम का नाश करने के संकल्पनुसार होलिका दहन करते हैं। काम को भस्म करने के प्रतीकात्मक रुप में इस मदन में यह शिक्षा भी ग्रहण करते हैं कि अब मदन काम महोत्सवों पर विराम लगाया जाए। होली का त्योहार स्पष्ट संदेश देता है कि ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं होता। सारे देवता, दानव, पितर और मानव उसी के अधीन है। जो उस परमतत्व को छोड़कर अन्य में मन रमाता है वह होली के त्योहार के संदेश को नहीं समझता। ऐसा व्यक्ति संसार की आग में जलता रहता है और उसे बचाने वाला कोई नहीं है।  यह ठंड के दिनों की विदाई और जीवन में ऊष्मा के आने की सूचना है। प्रकृति में खिलते रंगों का संदेश है। जीवन का उत्साह और उल्लास है। होली के इस उत्सव से मनुष्य लंबे समय से प्रेरणा पाता रहा है। होली के आसपास प्रकृति और जीवन दोनों में ही राग और रंग दिखलाई देते हैं। खेतों में सरसों खिल जाती है। गेहूं पकने की ओर बढ़ जाता है। जब प्रकृति में सभी ओर रंग ही रंग हों तो मनुष्य कैसे अछूता रह सकता है और यही बताने को होली का त्योहार मनाया जाता है। वैसे भी होली जितना हमारी उत्सव प्रियता को संबोधित है उतना ही इसका धार्मिक महत्व भी है। यह असत्य और अधर्म पर धर्म के विजय का त्योहार है। यह पर्व हमें बताता है कि अधर्म कितना ही बलवान क्यों न हो लेकिन धर्म की शुचिता के आगे उसे नतमस्तक होना ही पड़ता है। होली का त्योहार हमें इसी की स्मृति दिलाता है। 

खास यह है कि इस बार होली के दिन शुक्र मेष राशि में, मंगल और केतु धनु राशि में, राहु मिथुन में, सूर्य और बुध कुंभ राशि में, चंद्र सिंह में रहेगा। ग्रहों के ऐसे योग से होली शुभ फल देने वाली रहेगी। यह योग देश में शांति स्थापित करने में सफल रहेगा। ग्रहों का ये अनोखा संयोग व्यापार के लिए अच्छा रहेगा और लोगों में टकराव खत्म हो जाएगा। मार्च के आखिर में गुरु भी अपनी राशि धनु से निकलकर शनि के साथ मकर राशि में आ जाएगा। गौरतलब है कि होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। दहन में भद्राकाल का खास ख्याल रखा जाता है। ज्योतिषियों की माने तो इस साल होली के दहन में भद्राकाल का अवरोध नहीं रहेगा। भद्राकाल सोमवार को सूर्योदय से प्रारंभ होकर दोपहर करीब डेढ़ बजे समाप्त हो जाएगा। सोमवार को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र के कारण ध्वज योग रहेगा। ध्वज योग यश-कीर्ति देने वाला और विजय प्रदान करने वाला होता है। इस दिन चंद्रमा पर बृहस्पति की दृष्टि होने से पूरे दिन गजकेसरी योग का प्रभाव रहेगा। सोमवार को विशेष संयोग होने की वजह से होली के दहन पर सभी तरह की तकलिफों का नाश होगा और शत्रुबाधा की दिक्कतों का निवारण होगा। ग्रहों के इन योगों में होली आने से ये शुभ फल देने वाली रहेगी। इस प्रकार का यह योग देश में शांति स्थापित करवाने में सफल होगा। व्यापार के लिए हितकारी रहेगा और लोगों में टकराव समाप्त होगा। हर साल जब सूर्य कुंभ राशि में और चंद्र सिंह राशि में होता है, तब होली मनाई जाती है।

होली से पहले मंगलवार, 3 मार्च से होलाष्टक शुरू होगा। हिन्दी पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहता है। होलाष्टक में सभी तरह के शुभ कर्म वर्जित रहते हैं। जबकि इन दिनों में पूजा-पाठ और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि होलाष्टक की शुरुआत वाले दिन ही भगवान शिव ने तपस्या भंग करने पर कामदेव को भस्म कर दिया था। कहा जाता है कि होली के पहले के आठ दिनों तक भक्त प्रहलाद को काफी यातनाएं दी गई थीं। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो वो खुद जल गई और प्रह्लाद बच गए। प्रह्लाद पर आए इस संकट के कारण इन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान हर दिन अलग-अलग ग्रह उग्र रूप में होते हैं। इसलिए होलाष्टक में शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। इन दिनों में नकारात्मक ऊर्जा ज्यादा प्रभावी रहती है। यह समय होलिका दहन के साथ ही समाप्त हो जाता है। होलाष्टक के आठ दिनों में शादी, भूमि पूजन, गृह प्रवेश, मांगलिक कार्य, कोई भी नया व्यवसाय या नया काम शुरू करने से बचना चाहिए। नामकरण संस्कार, जनेऊ संस्कार, गृह प्रवेश, विवाह संस्कार जैसे शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। किसी भी प्रकार का हवन, यज्ञ भी इन दिनों में नहीं किया जाता है। इन दिनों विवाह संस्कार किए जाने से रिश्तों में अस्थिरता बनी रहती है। नवविवाहिताओं को इन दिनों में मायके में रहने की सलाह दी जाती है। इस अवधि में तप और दान करना अच्छा रहता है। इन दिनों अंतिम संस्कार के लिए भी शांति पूजन कराया जाता है। 

रंगभरी एकादशी पांच मार्च को मनाई जाएगी। ज्योतिषियों के अनुसार फागुन शुक्ल एकादशी तिथि पांच मार्च को सुबह 7.52 बजे लग रही है जो छह मार्च को सुबह 6.51 बजे तक रहेगी। काशी में रंगों की शुरूआत रंगभरी एकादशी से हो जाती है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव गौरा पार्वती का गौना करा कर अपनी नगरी काशी ले आए थे। इससे पहले वसंत पंचमी पर तिलक व महाशिवरात्रि पर विवाह की रस्में निभाई गई थीं। काशी में इस दिन श्रीकाशी विश्वनाथ विश्वेश्वर का अबीर-गुलाल से विधिवत पूजन-अभिषेक किया जाता है। सायंकाल शिवालयों में माता पार्वती संग भगवान शिव की गुलाल-पुष्प से होली होती है और होलिकोत्सव आरंभ हो जाता है। होलाष्टक को भक्त प्रहलाद पर यातना के तौर पर मनाया जाता है। राक्षसराज हिरण्यकश्यपु का पुत्र प्रहलाद जन्म से ही हरिभक्त था। हिरण्यकश्यपु विष्णु से ईष्या करता था और उन्हें भगवान नहीं मानता था। यहां तक कि उसने अपने राज्य में यह मुनादी तक करवा दी थी कि उसके राज्य में जो भी विष्णु की पूजा करते हुए देखा जाएगा उसे जेल में डाल दिया जाएगा या प्राण दंड दिया जाएगा। 

जब भक्त प्रहलाद बहुत छोटा था तो हिरण्यकश्यपु उससे बहुत प्रेम करता था। लेकिन जब भक्त प्रहलाद बड़ा हुआ तो हिरण्यकश्यपु के सामने यह बात सामने आई कि प्रहलाद तो विष्णु का भक्त है। इसपर पहले तो हिरण्यकश्यपु ने उसे सब तरह से समझाया कि विष्णु की भक्ति न करे. इसके बाद भी जब भक्त प्रहलाद पर उसकी समझाइश का असर नहीं हुआ तो उसने प्रहलाद को कई तरह से डराया और कई यातनाएं दीं। इसपर भी भक्त प्रहलाद ने विष्णु की भक्ति नहीं छोड़ी। जिससे गुस्से में आकर हिरण्यकश्यपु ने अपने सेवकों को आदेश दिया कि- जाओ प्रहलाद को पहाड़ी से नीचे फेंक आओ। इसपर हिरण्यकश्यपु के सेवकों ने अपने स्वामी का आदेश मानते हुए ऐसा ही किया। लेकिन जब सेवकों ने प्रह्लाद को पहाड़ी से नीचे फेंका तो भगवान विष्णु ने स्वयं प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में ले लिया। इसके बाद जब हिरण्यकश्यपु को पता चला कि प्रहलाद की जान बच गई है तो उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वो प्रह्लाद को लेकर जलती चिता में बैठ जाए। दरअसल, होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि आग कभी भी उसे जला नहीं सकती है। होलिका भाई की बात मानकर चिता में बैठ गयी लेकिन आग की लपटें भी भक्त प्रह्लाद का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाईं। जबकि होलिका वरदान के बावजूद आग से जलने लगी। माना जाता है कि उस दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी थी। तभी से उस दिन होलाष्टक मनाया जाने लगा। हर साल इसी तिथि पर होलिका दहन किया जाता है। इस तरह अन्य कहानियों की तरह ही असत्य पर सत्य की विजय होती है। 




--सुरेश गांधी--

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