बिहार : अभिनेता मृदुल शरण से एक मुलाकात दास्तान-ए-भोजपुरी फ़िल्म उद्योग - Live Aaryaavart

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शनिवार, 11 अप्रैल 2020

बिहार : अभिनेता मृदुल शरण से एक मुलाकात दास्तान-ए-भोजपुरी फ़िल्म उद्योग

  • भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री इतिहास के आइने में।

 हाँ तो भाई मृदुल जी!आप तो काफी अरसे से फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं तो बताइए आप इस भोजपूरी फिल्मों से जुड़े कुछ तत्थों के बारे में बतायें जिन बातों से आम लोग अनजान हैं अबतक? मेरे इन सवालों पर अभिनेता मृदुल शान कहते हैं
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अरुण शाण्डिल्य (बेगूसराय)  6 फरबरी 1962 का दिन भोजपुरी फ़िल्म जगत का सबसे एतिहासिक दिन था,क्योंकि इसी दिन पहली भोजपुरी फ़िल्म गंगा मईया तोहे पियरी चढैबो का मुहूर्त हुआ था,पटना के शहीद स्मारक के नीचे। तब से लेकर आज तक भोजपुरी फ़िल्म जगत को अनेकानेक समयानुसार सफलता और असफलता जैसी बदलाव से जूझना पड़ा है।कभी कामगारों की फ़िल्म कही जाने वाली भोजपुरी आज न सिर्फ़ नेशनल अवार्ड पा चुकी है बल्कि इसका डंका चारो दिशाओ में बज रहा है।कभी बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश के बाज़ार को ध्यान में रखकर बनाई जाने वाली भोजपुरी फ़िल्म आज बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की सीमा से निकल विदेश की धरती पर भी अपना झंडा गाड़ने में सफल रही है।बात अगर मायानगरी मुंबई की,की जाए तो आज बिहार के बाद भोजपुरी फिल्मों का सबसे बड़ा बाज़ार मुंबई ही है। 1984 में बनी फ़िल्म गंगा किनारे मोरा गाँव से लेकर आज तक मुंबई में भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्रीज ने काफ़ी तरक्की की है। 1963 में बिहार के एक व्यवसाई विश्वनाथ शाहाबादी की फिल्म गंगा मइया तोहें पियरी चढैबो से भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत होती है और इस फ़िल्म के प्रेरणा श्रोत थे देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद।हालांकि 20वीं सदी के पांचवें दशक में भोजपुरी क्षेत्र के कई लेखक कवि कलाकार बम्बई फिल्म उद्योग में सक्रिय थे और इन भोजपुरियों को अपने देश, गांव-जवार की बड़ी याद सताती थी। लेकिन इस भाषा में फ़िल्म बने इसका ख्याल किसी को नही आया।कहा जाता है की विश्नाथ शाहाबादी बड़े बैग में ढेर सारा रुपया लेकर मुंबई आए और दादर में वे प्रीतम होटल में ठहरे जो पुरबियों का अड्डा था यहीं उनकी मुलाकात नजीर हुसैन से हुई जो वर्षों से एक पटकथा तैयार करके भोजपुरी फिल्म बनाने की जुगत में थे और इस तरह जनवरी 1961 में नजीर हुसैन के नेतृत्व में गंगा मइया तोहें पियरी चढ़इबो के निर्माण की योजना बनी।फिल्म का निर्देशन बनारस के कुंदन कुमार को सौंपा गया।बनारस के ही रहने वाले कुमकुम और असीम को फिल्म में नायिका और नायक बनाया गया।संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी चित्रगुप्त को दी गई।1963 में यह फिल्म प्रदर्शित हुई और बेहद सफल भी हुई। इसके बाद तो इसका सिलसिला ही शुरू हो गया।मुंबई में पहली भोजपुरी फ़िल्म जिस सिनेमाघर में लगी वो थी मिनर्वा और फ़िल्म थी 1984 में बनी गंगा किनारे मोरा गाँव।आश्चर्यजनक रूप से यह फ़िल्म लगातार चार सप्ताह तक चली और इस तरह मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का द्वार खुल गया। इसके बाद लगातार कई फिल्में आई और अपनी मौजूदगी का अहसास कराती रही,लेकिन भोजपुरी फ़िल्म जगत पर आए संकट के बादल ने मुंबई को भोजपुरी फिल्मो से महरूम कर दिया।एक लंबे अरसे तक मुंबई में कोई भी भोजपुरी फिल्में रिलीज़ नही हुई। वर्ष 2003 में विश्वनाथ शाहाबादी के भांजे मोहनजी प्रसाद ने हिन्दी फिल्मों में अच्छा ब्रेक पाने की तलाश में भटक रहे जौनपुर के छोरा रविकिशन को लेकर सैयां हमार नाम की एक फ़िल्म बनाकर भोजपुरी फ़िल्म जगत के अब तक के स्वर्णिम युग की शुरुवात की।कुछेक लाख में बनी इस फ़िल्म ने काफी अच्छा व्यवसाई किया। मोहन जी और रवि किशन की इस जोड़ी ने लगातार चार हिट फिल्मे दी।इसी कड़ी को आगे बढाया 2005 में प्रदर्शित फिल्म ससुरा बड़ा पइसा वाला ने।इस फ़िल्म ने भोजपुरी फ़िल्म जगत से जुड़े लोगो को एहसास दिलाया की लोकसंगीत से जुड़े लोग भी अभिनेता बन सकते हैं। 2005 में ही मंसूरचक का एक आर्केस्ट्रा में गानेवाला लड़का आमिय कश्यप की जी तोड़ मिहनत के बाद केतन आर्ट्स के बैनर तले बनी फिल्म "टूटे ना सनेहिया के डोर" जिसके निर्माता अरुण कुमार सिंह और निर्देशक विनोद कुमार थे।यह फ़िल्म भी काफी शोहरत बटोर चुकी है।अब समय आता है मनोज तिवारी का जो कि उस समय गायकी में मनोज तिवारी मृदुल का डंका बज रहा था,और दर्शको ने ससुरा बड़ा पैसे वाला को हाथो हाथ उठा लिया और मनोज तिवारी रातो-रात लोगो के चहेते बन गए।फ़िर तो बिहार उत्तरप्रदेश के गायकों की भीड़ सी लग गई,लेकिन किस्मत चमकी तो सिर्फ़ दिनेश लाल यादव निरहुआ की।सिर्फ़ पाँच साल पहले तक मात्र 5 हजार के मेहनताना पर गाने वाला निरहुआ अगर आज किसी फ़िल्म के एवज में 30 लाख रूपये मेहनताना लेता है तो इसे भोजपुरी फ़िल्म जगत की ऊंचाई ही कह सकते हैं।आज भले ही मनोज तिवारी फ़िल्म निर्माताओ की पसंद नही हैं लेकिन उन्होंने जो सिलसिला शुरू किया था उसमे कई लोग नाम के साथ दाम भी कमा रहे हैं।आज के भोजपुरी फिल्मों में सबसे लोकप्रिय लोक गायक पवन सिंह,गुड्डू रंगीला,छोटू छलिया,सहित दर्जनों ऐसे गायक हैं जो बतौर अभिनेता काम कर रहे हैं।मल्टिप्लेक्स के इस दौर में अगर आज सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर फल फूल रहे हैं तो इसका श्रेय भोजपुरी फिल्मो को ही जाता है।आज हालत ये है की महाराष्ट की इस धरती पर भोजपुरी सिनेमा ने मराठी फिल्मो को भी पीछे छोड़ दिया है।आपको जानकर आश्चर्य होगा की मुंबई में भोजपुरी फिल्मो का बाज़ार मराठी फिल्मो से कई गुना अधिक है।आज मुंबई के लगभग 20 सिनेमा घरों में भोजपुरी फिल्मे प्रर्दशित होती है।कई मल्टीप्लेक्स भी अब भोजपुरी फिल्मो का प्रदर्शन कर रहे हैं।मुंबई में बसे भोजपुरी भाषी का यह अपनी भाषा के प्रति प्यार ही है की आज फ़िल्म निर्माता उत्तरप्रदेश की तुलना में मुंबई से कहीं अधिक कमाई कर रहे हैं।इस सम्बन्ध में रोचक तथ्य यह है की मुंबई में बसे पूर्वी उत्तरप्रदेश के लोगो की तुलना में बिहार के लोग अधिक संख्या में भोजपुरी फ़िल्म देखते है और धीरे धीरे उत्तरप्रदेश के लोगों का रुझान भी भोजपुरी फ़िल्म को लेकर काफ़ी बढ़ने लगा है। यह रुझान भोजपुरी फ़िल्म जगत के लिए एक शुभ संकेत है।  अब सवाल यह उठता है कि इतना विशाल इंडस्ट्रीज बनने के वावजूद भी आज भोजपुरी फ़िल्म जगत को वो सम्मान वो मुकाम हासिल क्यों नही हो पाया है जिसका वो हकदार है ? अगर गहराई से पड़ताल,विचार किया जाए तो मामला साफ़ हो जाता है,कि आज भोजपुरी फ़िल्म जगत स्तरीय फिल्मो से दूर हो गया है,पैसे कमाने की चाहत में फ़िल्म निर्माताओं ने ऐसे वर्ग के दर्शको के लिए फिल्में बनानी शुरू कर दी है जो अश्लीलता देखना ज्यादा पसंद करते हैं।कई कारपोरेट कंपनिया यहाँ आई भी लेकिन निर्माताओ और वितरकों की मिलीभगत ने उन्हें कहीं का नही छोड़ा।इसके अलावा आपसी गुटवाजी भी यहाँ बहुत है।पूरी इंडस्ट्रीज अलग अलग गुटों में बँटा हुआ है।हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्रीज में भी गुटवाजी है,लेकिन इसका असर उनके काम पर नही होता है।सबसे आखिर  में  मेरी दो विनती है :- एक तो भोजपुरी फिल्मों के निर्माता - निर्देशकों  से कि वो स्वस्थ,साफ सुथरी एवं अश्लीलता से परे फिल्मों का निर्माण करें जिसमें  अपनी भोजपुरी माटी की सभ्यता और संस्कृति की सुगंध मिले। और दूसरी विनती  पूर्वांचल के राज्य सरकारों ,  विधायकों और सांसदों से है कि वे भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को एक उधोग के रूप में स्थापित करें।कलाकारों के लिए विशेष सुविधा प्रदान करें।इस तरह से अभिनेता मृदुल शरण ने अपनी बात भोजपुरी फिल्मों के उतार-चढ़ाव के साथ एक सुझाव के रूप में रखा।

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