विशेष : कोरोना के बाद चीन की चाल पर नजर जरूरी - Live Aaryaavart

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शनिवार, 18 अप्रैल 2020

विशेष : कोरोना के बाद चीन की चाल पर नजर जरूरी

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चीन वह देश है जो कभी किसी को सुख नहीं दे सकता। उसकी एक गलती का खामियाजा दुनिया के 200 देश  भुगत रहे हैं फिर भी उसकी सेहत पर कोई असर पड़ता नहीं आ रहा। दुनिया भर में 20 लाख से अधिक लोग कोरोना संक्रमित हैं जबकि एक लाख 19 हजार लोग कोरोना के चलते काल के गाल में समा गए हैं। चर्चा तो यह है कि वुहान की एक लैब में जैविक हथियार बनाने के लिए परीक्षण कर रहा था, लैब में हुई कुछ गलतियों की वजह से पूरे वुहान में कोरोना फैल गया लेकिन उसने दुनिया के किसी भी देश को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। जिन्होंने बताने की कोशिश की, उनका हस्र क्या हुआ,यह किसी से छिपा नहीं है। हालात यह है कि चीन के चलते पूरी दुनिया कोरोना के संक्रमण का दंश झेल रही है। कोरोना को लेकर जो दुनिया भर में महाबंदी हुई है, उससे उत्पन्न आर्थिक मंदी से तमाम देशों की कमर टूट गई है। विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहे भारत को सात—आठ लाख करोड़ रुपये की चपत लग चुकी है। यह सब लॉकडाउन के महज 21 दिनों में हुआ है, 3 मई तक और कितना नुकसान होगा,यह भी किसी से छिपा नहीं है। चीन की साजिश पर लोगों को विश्वास इसलिए भी हो रहा है कि कोरोना वुहान के बाद चीन के किसी भी शहर में नहीं फैला और दुनिया भर में फैल गया। लोग अगर इसे चीन की शरारत मान रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? अमेरिका तो यह बात कह भी रहा है कि बुहान की प्रयोगशाला से ही कोरोना वायरस पूरी दुनिया में फैला है। वैसे अभी यह जांच की जद में है लेकिन देर—सबेर इसका खुलासा तो होगा ही। 
    
दुनिया भर में हो रहे जन—धन के नुकसान का चीन जश्न मना रहा है। प्रकट में तो मना नहीं सकता लेकिन उसके अंतस में अपने विरोधियों को यूं शिकस्त देने पर हर्ष के पकौड़े तो अवश्य ही फूट ही रहे होंगे। कोरोना संकट से भी चीन का मन नहीं भरा तो उसने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में बहने वाली मेकांग नदी में पानी का बहाव घटा दिया है। इससे थाइलैंड, लाओस, कंबोडिया और वियतनाम में दुर्भिक्ष के हालात बन गए हैं। सूखे की मार से बेहाल किसान और मछुआरे आंदोलन और प्रदर्शन के लिए विवश हो रहे हैं। समझा जा रहा है कि चीन ब्रह्मपुत्र नदी  के पानी पर भी रोक लगा सकता है। हालांकि अभी उसने किया नहीं है लेकिन जिसकी आंखों पर लोभ का चश्मा लगा हो, उसके लिए असंभव कुछ भी नहीं है। अगर ऐसा होता है तो इससे भारत की बहुत बड़ी आबादी को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। वैसे गर्मियों में इस तरह की परेशान करने वाली हरकतें चीन हर साल करता है। बरसात के दिनों में वह बेइंतिहा पानी ब्रह्मपुत्र में छोड़ देता है जिससे पूर्वोत्तर भारत में बाढ़ के हालात उत्पन्न हो जाते हैं। धन—जन की अपरिमित क्षति होती है सो अलग।चीन के लिए अपने हानि—लाभ ज्यादा मायने रखते हैं,वह अपने साथ के देशों को भी सताने का कोई मौका नहीं छोड़ता। ऐसा कोई सगा नहीं है जिसे चीन ने कभी अपने लाभ के लिए ठगा न हो। चीन विश्वसनीय राष्ट्र नहीं है। यह बात पूरी दुनिया की समझ में आने लगी है। चीन से आर्थिक रिश्ते खत्म करके ही उसे उसके किए का दंड दिया जा सकता है।
 न्यूयार्क टाइम्स की खबर को सच मानें तो जब फरवरी के अंतिम दिनों में चीन जब कोरोना से जूझ रहा था, उस समय उसके विदेश मंत्री को अचानक लाओस जाना पड़ा था। दरअसल, मेकांग नदी में पानी कम होने के बाद लाओस के किसानों और मछुआरों ने जोरदार प्रदर्शन किया था। तब चीन के विदेश मंत्री वांग यी को लाओस जाना पड़ा था। चीनी विदेश मंत्री ने कहा था कि चीन भी इस साल सूखे का सामना कर रहा है और इससे मेकांग नदी में पानी कम हो रहा है। चीन के दावे के उलट अमेरिकी जलवायु विज्ञानियों के शोध बता रहे हैं कि फिलहाल चीन में सूखे का कोई संकट नहीं है। चीनी  अभियंताओं ने हिकमत कर नदी के पानी के बहाव को घटा दिया है। तिब्‍बत के पठार पर अब भी विशाल जलराशि मौजूद है। चीन के इंजीनियरों की इस हरकत से कंबोडिया और थाइलैंड जैसे देश भी पानी की भारी किल्लत महसूस कर रहे हैं। दक्षिण पूर्व एशिया में मेकांग नदी पर करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर है। ये लोग खेती और मछली पकड़ने के लिए मेकांग नदी के पानी पर निर्भर हैं। लेकिन चीन में बड़े पैमाने पर बांध बन जाने की वजह से यह नदी सूखती जा रही है। चीन ने तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बड़ा बांध बना रखा है। इस परियोजना से जल आपूर्ति में बाधा पड़ने से भारत  भी कम चिंतित नहीं है। चीन की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना 'जम हाइड्रोपावर स्टेशन' डेढ़ अरब डॉलर की लागत से  बनी है। इस परियोजना के लिए चीन ब्रह्मपुत्र के पानी का इस्तेमाल करता है। कोरोना के इस दौर में मदद करना तो दूर, चीन अपने पड़ोसी देशों के मुंह से पानी का गिलास तक छीन रहा है।

विकथ्य है कि  मेकांग नदी तिब्बत से निकलती है और कुछ दूर तक तिब्बत में बहकर नीचे लाओस, म्यांमार, थाईलैंड और कंबोडिया होते हुए वियतनाम के पास समुद्र में मिल जाती है। दक्षिण-पूर्व एशिया के  उक्त देशों को तंग करने, खासकर लाओस को परेशान करने के लिए चीन ने मेकांग नदी के उद्गम स्थान पर तिब्बत में बड़े-बड़े डैम बना दिए हैं, जिससे तिब्बत में भरपूर बिजली का उत्पादन होता है और वह बिजली खंबों के जरिये चीन चली जाती है। चीन की आर्थिक संपन्नता में मेकांग नदी पर बने  इन डैमों  की बड़ी भूमिका है। पहले इसका पानी बिना किसी अवरोध के लाओस चला आता था और फिर वहां से हिंद चीन के दूसरे देशों में पहुंचता था। लाओस ने भी बड़े-बड़े डैम  बना रखे हैं। जिनमें बिजली का भरपूर उत्पादन होता था। लाओस का मुख्य निर्यात बिजली ही है। लाओस में बिजली उत्पादन के लिए भारत ने भी उसे कई टरबाइन दिए हैं। लाओस का पड़ोसी देश थाईलैंड आर्थिक रूप से एक अत्यंत संपन्न देश है। लाओस में उत्पादित बिजली का तीन-चौथाई भाग थाईलैंड अब तक खरीदता रहा है। परंतु अब साल के छह महीनों में चीन लाओस में पानी रहने ही नहीं देता है, तो लाओस के डैमों में बिजली का उत्पादन कैसे हो, यह अपने आप में बड़ी समस्या है। चीन की इस हरकत से न सिर्फ लाओस, बल्कि म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया भी परेशान हैं। अब जब लाओस ने मेकांग पर एक और बांध बनाने की बात सोची है, ताकि वह नुकसान की भरपाई कर सके, तो चीन पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का बहाना कर पड़ोसी देशों को भड़का रहा है। इसमें शक नहीं कि पर्यावरण का इससे ज्यादा नुकसान तिब्बत में बने विशालकाय बांधों से पहले ही हो चुका है। हालांकि थाईलैंड लाओस के इस बांध को कर्ज देने पर भी अपनी सहमति जता चुका है। 
  
चीन अक्टूबर 2016 और 2019 में भी ब्रह्मपुत्र के पानी को रोकने की गुस्ताखी कर चुका है। इस तरह की गलतियां वह करता ही रहता है। भारत में जलापूर्ति करने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की एक सहायक नदी जियाबुकु का पानी रोक कर उसने भारत को करार झटका देने और अपने मित्र देश पाकिस्तान को उपकृत करने की कोशिश की थी। यह वह दौर था जब भारत ने पाकिस्तान को धमकी दी थी कि अगर उसने आतंकवादियों को तरजीह देने वाली अपनी रीति—नीति न बदली तो वह सिंधु नदी का पानी पाकिस्तान नहीं जाने देगा। भारत ने तो ऐसा नहीं किया लेकिन चीन ने जियाबुकु का पानी रोक कर पाकिस्तान को मानसिक समर्थन जरूर दिया था। चीन 74 करोड़ डॉलर की लागत से जियाबुकु नदी पर जल विद्युत परियोजना डाल रहा है। चीन अगर मैकांग की तरह ब्रह्मपुत्र का जरा भी पानी रोकता है, उसके बहाव को कम करता है तो असम, सिक्किम और अरुणाचल में पानी का संकट उत्पन्न  हो जाएगा।  ब्रह्मपुत्र 1625 किमी क्षेत्र में तिब्बत में ही बहती है। इसके बाद 918 किमी भारत और 363 किमी की लम्बाई में बांग्लादेश में बहती है। तिब्बत के जाइगस में बन रहे बांध पर भारत आपत्ति भी जता चुका है। चीन गेट बंद रखे तो भारत में सूखा और बरसात में खोल दे बाढ़। विगत वर्षों में अरुणाचल, असम और हिमाचल प्रदेश में जो बाढ़ें आई हैं, उनकी पृष्ठभूमि में चीन द्वारा बिना किसी सूचना के पानी छोड़ा जाना रहा है। जरूरत है कि भारत सरकार चीन की गतिविधियों पर नजर रखे और उसे नदी के जल पर एकाधिकार की प्रवृत्ति अपनाने से रोके। चीन को भी सोचना होगा कि पहले ही भारत समेत अनेक राष्ट्रों को बहुत कष्ट दे चुका है। उसे सोच—समझकर निर्णय लेना चाहिए। ऐसा न हो कि दुनिया के देश उससे फिरंट हो जाएं। उसके उत्पादों का बहिष्कार कर दें। अगर ऐसा होता है तो फिर चीन कहीं का नहीं रहेगा। इसलिए अब भी समय है, चीन को सचेत हो जाना चाहिए। उसे ऐसा एक भी काम नहीं करना चाहिए कि दुनिया उसे खलनायक मान बैठे और उससे अपना रिश्ता तोड़ ले। चीन अपने दोनों हाथों में लाभ के लड्डू रखना चाहता है और इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। उसकी इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाए जाने की जरूरत है। उसकी हर हरकत पर नजर रखने की जरूरत है वर्ना वह वायरस भी फैलाएगा और  वायरस विरोधी जांच किट और औषधियों का निर्यात भी पूरी दुनिया को करेगा। चित भी अपनी और पत भी अपनी । चीन जिस तरह दुनिया भर में अपनी विश्वसनीयता खो रहा है, वह उसके लिए सुखद संकेत हरगिज नहीं है। 



-सियाराम पांडेय 'शांत'-

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