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सोमवार, 11 मई 2020

मुसलमानों को हिन्दू सभ्यता का समान साझीदार मानता है आरएसएस: अकील

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नयी दिल्ली 10 मई, जाने माने मुस्लिम विद्धान एवं राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद के निदेशक डॉ. शेख अकील अहमद ने कहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके प्रमुख डॉ. मोहन भागवत केवल एक जाति या धर्म के लोगों को नहीं बल्कि मुस्लिम सहित भारत के सभी वर्ग एवं मजहब के लोगों को हिन्दू सभ्यता का बराबर का भागीदार मानते हैं तथा सामाजिक एकता के माध्यम से ही भारत को समृद्ध एवं श्रेष्ठ बनाने का स्वप्न देखते हैं। डॉ. अहमद ने कोरोना वैश्विक महामारी के कारण लागू लॉकडाउन का एक माह पूरा होने पर आरएसएस के सरसंघचालक डॉ. भागवत के उद्बोधन की व्याख्या करते हुए यह बात कही। यूनीवार्ता से एक खास मुलाकात में उन्होंने आरएसएस को एक कल्याणकारी संगठन बताया और कहा कि आरएसएस सांस्कृतिक विविधता और बहुलवाद में विश्वास करता है। इसका मुख्य लक्ष्य एक गैर-वर्गीय समाज बनाना है तथा समाज का एकीकरण और सभी वर्गों का विकास इसका एजेंडा है। उन्होंने कहा कि संसार में जनकल्याण के कार्यों से जुड़े अनेक संगठन हैं। भारत में भी आरएसएस ऐसा ही एक सामाजिक संगठन है जिसका मुख्य घोषणापत्र लोगों की सेवा, भारतीय विचारों एवं मूल्यों की रक्षा एवं देशभक्ति है। यह संगठन बहुत सुसंगत और संगठित है और इसका दायरा बहुत व्यापक है। सामाजिक और शैक्षिक विकास के क्षेत्र में आरएसएस की महत्वपूर्ण उपलब्धियां किसी से छिपी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पूरे देश में आरएसएस का एक एकीकृत नेटवर्क है जिसका मुख्य उद्देश्य भारत के लोगों में सामाजिक जागरूकता पैदा करना और उन्हें भारतीय संस्कृति से परिचित कराना है। इस संगठन का जोर भारतीयता, स्वदेशी, राष्ट्रीय और सामाजिक एकता पर है तथा शायद इसीलिए कुछ लोग इस संगठन को एक विशिष्ट वैचारिक चश्मे के माध्यम से देखते हैं और इसे एक विशेष वर्ग या जाति से जोड़ने का प्रयास करते हैं जबकि आरएसएस किसी मजहब में नहीं बल्कि सांस्कृतिक विविधता और बहुलवाद में विश्वास करता है। इसका मुख्य लक्ष्य एक गैर-वर्गीय समाज बनाना है तथा समाज का एकीकरण और सभी वर्गों का विकास इसके एजेंडे में है। डॉ. अहमद ने कहा कि जब से डॉ. भागवत जैसे दूरदर्शी व्यक्तित्व ने आरएसएस की बागडोर संभाली है, संघ ने अपने सोचने और महसूस करने के तरीके को काफी हद तक बदल दिया है। उनके पास एक वैचारिक खुलापन और विस्तार है जिसे आसानी से उनके उपदेशों और कथनों से देखा जा सकता है। उन्होंने हमेशा अपने स्वयंसेवकों को बिना किसी पूर्वाग्रह के सभी भारतीय लोगों की सेवा करने का निर्देश दिया है। व्यक्तित्व निर्माण और सामाजिक कल्याण के मिशन के साथ, संगठन पूरे भारत में आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने डॉ. भागवत को उद्धृत करते हुए कहा, “हिंदू धर्म किसी धर्म, प्रांत या देश का नहीं बल्कि एक संस्कृति का नाम है और यह भारत में रहने वाले लोगों की विरासत है, इसलिए भारत में रहने वाले सभी एक सौ तीस करोड़ लोग हिंदू हैं और भारत माता की संतान हैं। वे अपनी विभिन्न सभ्यताओं, संस्कृतियों और धर्मों केब बावजूद भारतीय होने के कारण एक हैं और यही विविधता हमारी पहचान है।” सरसंघचालक ने एक बयान में यह भी कहा है कि जिस दिन यह कहा जाएगा कि ‘मुसलमान यहां नहीं चाहिए,उसी दिन वो हिंदुत्व नहीं रहेगा।’ डॉ. अहमद ने कहा कि यही कारण है कि सरसंघचालक जी अपने सभी वक्तव्यों में केवल एक वर्ग या धर्म के लिए नहीं बल्कि भारत के सभी वर्गों के बारे में बोलते हैं। कोरोना संकट के दौरान भी उन्होंने यह स्पष्ट किया कि कुछ लोगों की गलतियों के कारण पूरी कौम को बदनाम नहीं किया जा सकता है और यह भी कहा कि बिना किसी पूर्वाग्रह और भेदभाव के हर प्रभावित व्यक्ति की मदद करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि डॉ. भागवत का मानना है कि दोनों कौमों के जागरूक लोगों को आगे आना चाहिए और मन में व्याप्त पूर्वाग्रहों और शंकाओं को संवाद के माध्यम से दूर करना चाहिए। केवल संवाद से ही हम अपने देश को एक साथ ला सकते हैं और सभी के विकास के सपने को पूरा कर सकते हैं। सरसंघ चालक ने अपने भाषण में यह भी कहा कि भारत में अधिकांश मुसलमान खुश हैं क्योंकि हिंदू सभ्यता में सभी के लिए सम्मान की भावना है। हम धर्म के आधार पर किसी से घृणा नहीं करते हैं। हमें एक बेहतर और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए एक साथ आगे बढ़ना चाहिए ताकि देश में बदलाव आए और विकास के समान अवसर पैदा किए जा सकें।

डॉ. अहमद ने कहा कि डॉ. भागवत ने हमेशा भारत के सभी धार्मिक वर्गों के बीच राष्ट्रीय एकता, सद्भाव और भाईचारे पर जोर दिया है और खुल कर कहा है कि धर्म, संप्रदाय और जाति के आधार पर किसी के साथ अन्याय या दुर्व्यवहार अच्छी बात नहीं है। उन्होंने कहा कि कोरोना जैसे संकट में भी, जब देश में धार्मिक घृणा शुरू हुई, तो उन्होंने सभी भारतियों को संबोधित किया और कहा, “कोरोना से डरने की कोई जरूरत नहीं है, हम सभी को आत्मविश्वास की आवश्यकता है, हमें लगातार और क्रमबद्ध तरीके से और बिना किसी भेदभाव के काम करना होगा, हमें बिना किसी भेदभाव के दूसरों की मदद करनी होगी। हमें इस अवसर पर भय, क्रोध और पूर्वाग्रह से बचना होगा और हमें लापरवाही, भय, क्रोध, शिथिलता, टालमटोल जैसी गलतियों से बचने का प्रयास करना होगा तभी हम कोरोना जैसे संकट से छुटकारा पा सकेंगे।” उन्होंने कहा, “कोरोना हमारे लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है और यह हमें नियमों और विनियमों के पालन के साथ एक नए भारत के निर्माण के लिए आमंत्रित कर रहा है। इस संकट ने हमें बहुत कुछ सिखाया है, विशेष रूप से आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया है और एक नए आर्थिक विकास ढांचे के गठन के बारे में भी सोचने पर मजबूर किया है। पर्यावरण की रक्षा करने और स्वदेशी उत्पादों का उपयोग करने की आवश्यकता के साथ-साथ, हमें एक साथ लड़ने का पाठ भी पढ़ाया है। हम कोरोना से तभी छुटकारा पा सकते हैं यदि व्यक्ति और समाज एकजुट होकर इसके खिलाफ लड़ेंगे।” डॉ. अहमद ने कहा कि कोरोना की चुनौती हमें अच्छा बनना और दूसरों को अच्छा बनाना भी सिखाती है इसलिए हमें एकजुट होकर कोरोना को समाप्त करना होगा। जातियों, धर्मों और वर्गों में विभाजित होकर हम इस प्रकोप से छुटकारा नहीं पा सकते हैं। कोरोना के प्रति अपने सामाजिक दायित्व को महसूस करते हुए जिस तरह डॉ. भागवत ने संबोधित किया, उससे पता चलता है कि वह न केवल एक जाति, राष्ट्र या धर्म के लोगों को बल्कि भारत के सभी लोगों को संबोधित कर रहे थे, और यही सामाजिक एकता आरएसएस का मिशन है।

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