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मंगलवार, 12 मई 2020

साहित्यिकी : बातें लेखकों की किताबों की आभासी दुनिया के मंच से

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कोविड 19 से पूरा देश लड़ रहा है। हम नए सिरे से सामाजिक परिभाषाएं गढ़ रहे हैं। हम थक रहे हैं, निराश हो रहे हैं लेकिन जीवन के भीतर की लयात्मकता हमें हौसला दे रही है। बीमारी है, बीमारी का ख़तरा है, बीमारी से लड़ना है, समझदारी से नियमों का पालन करके। फ़िलहाल, ठहरे हुए को चलाना है नई समझ के साथ... 11 मई अफसानानिग़ार सआदत हसन मंटो की जन्मतिथि भी है। मंटो ने कहा था, ”हक़ीकत से इंकार क्या हमें बेहतर इंसान बनने में मददगार साबित हो सकता है? हरग़िज नहीं।“ हकीक़त है कि एक इंसान के तौर पर, एक समाज के तौर पर हमें प्रकृति के साथ अपने रिश्तों को समझना होगा और विकास की अपनी अंधाधुंध दौड पर सोच-समझ कर आगे बढ़ना होगा। मंटो ने समाज की सच्चाइयों को अपने अफ़सानों में हू-ब-हू उतार दिया था। आज हम बार-बार उन्हें पढ़ते हैं, उनके लिखे में अपने समय को समझने के सूत्र ढूँढते हैं। यही सूत्र राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से जुड़कर लाइव बातचीत में लेखक पंकज चतुर्वेदी ने कवि कुँवर नारायण की कविताओं से निकालकर लोगों से साझा किए। राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव से जुड़कर पंकज चतुर्वेदी ने एक कवि के रूप में कुँवर नारायण को याद करते हुए कहा, “अमर्त्य सेन ने कभी कहा था कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सवाल आज के समय के लिए बहुत प्रासंगिक हैं। इस पर कुँवर नारायण का मानना था कि अर्जुन अगर अच्छे सवाल पूछते तो बेहतर जवाब पा सकते थे। सही सवाल पूछना भी एक हुनर है। कुँवर नारायण सबसे ज्यादा राजा जनक के चरित्र से प्रभावित थे।“

“मैं ज़रा देर से इस दुनिया में पहुँचा”
फ़ेसबुक लाइव के जरिए कुँवर नारायण के निधन के बाद प्रकाशित उनके संपादित काव्य-संग्रह ‘इतना सब असाप्त’ की कविताओं पर विस्तार से चर्चा की। यह कविता संग्रह राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। पंकज चतुर्वेदी ने कहा, “कुँवर नारायण के भीतर एक संवेदनशील मनुष्य बनने की चाहत थी। उनकी रचनाशीलता और व्यक्तित्व में बुद्ध का सा स्वभाव झलकता है। वो बहुत ज्यादा लिखने में  विश्वास नहीं करते थे। यह उनके व्यक्तित्व की केन्द्रीय विशेषता थी। दुनिया में रहते हुए, दुनिया से अलग रहना, अलहदा रहना, उससे कोई अपेक्षा न रखना... यही उनको विशिष्ट भी बनाती है।“

उनकी कविता की पंक्तियां हैं-

मैं ज़रा देर से इस दुनिया में पहुँचा / तब तक सारी दुनिया सभ्य हो चुकी थी / सारे जंगल काटे जा चुके थे / सारे जानवर मारे जा चुके थे / वर्षा थम चुकी थी / और आग के गोले की तरह तप रही थी / पृथ्वी.....”

कुँवर नारायण सांसारिक सफलताओं को सारहीन समझते थे। उनकी कविताएं इसका प्रमाण हैं। लाइव बातचीत में पंकज चतुर्वेदी ने लोगों के साथ अपनी कविताओं का पाठ कर उसे साझा किया। बातें और कहानियों के फ़ेसबुक लाइव की श्रृंखला में राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव पेज से जुड़कर चर्चित लेखक अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने उपन्यास “कुठाँव” से अंश पाठ कर अपने पाठकों और फ़ेसबुक यूज़र्स को आनंदित कर दिया। अब्दुल बिस्मिल्लाह का यह नया उपन्यास मुस्लिम समाज में फैले जातिगत भेदभाव और कुरीतियों को उजागर करता है। उन्होंने उपन्यास से कई छोटे-छोटे अंश पढ़कर उपन्यास के प्रति उत्सुकता को जगा दिया। यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। 

बना रहे बनारस
बनारस हिन्दुस्तान का ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे पुराने शहरों मे से एक है। कहते हैं कि अगर दुनिया के सभी ऐतिहासिक शहरों की उम्र जोड़ ली जाए, तो उसका जोड़ बनारस की उम्र से कम ही होगा। राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से लाइव जुड़कर ‘स्वाद सुख’ के कार्यक्रम में भारत के शहरों और वहाँ के तमाम व्यंजनों की जानकारी हमारे सामने लाते हैं इतिहासकार एवं खान-पान विशेषज्ञ पुष्पेश पंत। सोमवार की सुबह ग्यारह बजे आभासी दुनिया के मंच से पुष्पेश पंत के साथ लोगों ने सैर की बनारस की ज़ायकेदार गलियों की। वैसे, तो बनारस के स्वाद का नाम लेते ही चाट, कचौड़ी -जलेबी, मिठाईयां या ठंडाई की याद आती है। लेकिन, इस चक्कर में बनारसी खाना बेचारा मारा जाता है। ‘मूँग की पकौड़ियां’, ‘बनारसी दम आलू’, ‘छर्रा आलू’, ‘देसी परवल की सब्ज़ी’, ‘मटर की कचौड़ी’, ‘काली मिर्च और अर्बी’, उड़द की दाल में साग मिलाकर बनाई गई दाल का स्वाद सालों-साल याद रहता है। दरअसल, बनारस सिर्फ़ बनारस वालों का नहीं है। वो भोजपुर वालों का है, मैथिल वालों का भी और जौनपुर वालों ने इसके स्वाद में बहुत योगदान दिया है। बनारसी मिठाइयां स्वाद में जितनी जबरदस्त होती हैं उतना ही अपने नाम में नज़ाकत से भरी होती हैं – लौंगलता, बनारसी मलइयो और अस्सी घाट का एप्पल पाई। इन तीनों की ख्याति बनारस से बाहर देश और विदेश में फैली हुई है। फ़िलहाल हम लॉकडाउन में हैं लेकिन, स्थितियां सामान्य होने के बाद हम क्या-क्या करेंगे उस सूची में बनारस जाकर उसके ज़ायकों का स्वाद लेना शामिल कर सकते हैं। लॉकडाउन के तीसरे फ़ेज में भी लगातार जारी फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में अबतक 172 लाइव सत्र हो चुके हैं जिसमें 128 लेखकों और साहित्य प्रमियों ने भाग लिया है।

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