आलेख : खुलता और बंद होता कोरोनारोधी जंग का विजय पथ - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 5 जून 2020

आलेख : खुलता और बंद होता कोरोनारोधी जंग का विजय पथ

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना के खिलाफ जंग में देशवासियों से धैर्य बनाए रखने की अपील की है। कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई को जहां उन्होंने लंबी बताया है,वहीं विजय पथ पर चलने की बात भी कही है। उन्होंने कहा है कि विजयी होना हम सबका सामूहिक संकल्प है। विजयी होने के लिए बहुत त्याग की जरूरत होती है। उतावलेपन से विजय नहीं,व्यक्ति उपहासभागी होता है।  विजय के पथ पर चलने वाला न तो आलोचनाओं से घबराता है और न ही अपने मार्ग से विचलित होता है। उसके लिए प्रशंसा और आलोचना दोनों ही मायने नहीं रखते लेकिन यह तभी संभव है जब विजयपथ पर एक आदमी हो। एक अरब 38 करोड़ की आबादी पहली बात तो एकमत नहीं हो सकती। संकल्प में विकल्प नहीं होता। विकल्प पर चिंतन संकल्प से पहले का विषय है। संकल्प लेने के बाद तो समीकरण ही बदल जाता है। ' अब तौ जरै बरै बनि आवै लीन्हों हाथ सिंधौरा।'
  
कोरोना वायरस प्राकृतिक है या  प्रयोगशाला से नि:सृत, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है लेकिन इसने पूरी दुनिया में जन—धन की बर्बादी का जो नग्न नर्तन किया है, उसके घाव न तो भरे हैं और न कभी भर पाएंगे।  68 दिन से कोरोनाजन्य महाबंदी से जूझ रहे देश को केंद्र सरकार ने अनलॉक— की घोषणा करते हुए बड़ी राहत दी है। पिंजड़े में बंद पक्षी को अगर जरा भी बाहर फुदकने का अवसर मिले तो यह उसके लिए प्रसन्नता का विषय हो सकता है। यह देश लंबे समय से महाबंदी झेल रहा है। अब उसे महाबंदी से निजात की थोड़ी उम्मीद बंधी है लेकिन इतना तो उसे पता है ही कि खुलने और बंद होने की अपनी सीमा होती है। सीमा का अतिक्रमण दुख देता है। बंदिशों में रहना मानव स्वभाव नहीं है। वह बंदिशों को तोड़ना और स्वतंत्र रहना चाहता है लेकिन यह भूल जाता है कि स्वतंत्रता स्वच्छंदता नहीं है। स्वतंत्रता का अपना अनुशासन होता है। उसकी अपनी आचार संहिता होती है जो स्वतंत्र व्यक्ति खुद अपने लिए बनाता है।

खुलना और बंद होना क्रमिक  हो सकता है लेकिन एक साथ ऐसा संभव नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में लिखा है कि 'एक संग नहीं होंहि भुआलू। हंसब, फुलाइब ठठाइब गालू। ’यह जानते हुए भी कि कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से हो रहा है,अधिकांश राज्यों ने लॉकडाउन जारी रखने लेकिन व्यावसायिक गतिविधियां तेज करने की समवेत मांग रखी थी। केंद्र सरकार की भी समझ में एक बात आ गई थी कि लॉकडाउन की निरंतरता बनाए रखने का अब कोई औचित्य नहीं रहा। उसे भरोसा था कि प्रथम चरण के लॉकडाउन के पहले चौदह दिन में वह कोरोना वायरस की   शृंखला को तोड़ लेगी लेकिन तब्लीगी जमात से जुड़े लोगों ने उसके मंसूबे पर पानी फेर दिया। रही-सही कसर दूसरे चरण से लेकर आज तक विभिन्न राज्यों में फंसे प्रवासी मजदूर पूरी कर रहे हैं। कोरोना वायरस से संक्रमित होने वालों की संख्या दो लाख से अब 18 हजार ही कम है। देश में मरने वालों का आंकड़ा भी पांच हजार से ज्यादा हो चुका है।

कोरोना वायरस ने स्वास्थ्य ही नहीं, देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी चोट पहुंचाई है। महाबंदी के चार चरण पूरे हो चुके हैं ।अब पांचवां चरण शुरू होना था लेकिन सरकार पर इस राज्यों की ओर से इस बात का दबाव था कि लॉकडाउन समाप्त न हो लेकिन आर्थिक गतिविधियों में जरूर ढील दी जाए। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो खुद को कोरोना से भी आगे चलनेवाला बता रहे हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आठ जून से राज्य में सभी धर्मस्थलों को खोलने की घोषणा पहले ही कर दी। ऐसे में सरकार के पास लॉकडाउन को खोलने के सिवा चारा क्या था? लॉकडाउन में ढील तो उसने दूसरे चरण से ही देना आरंभ कर दिया था। अभी उसने तीन चरणों में लॉकडाउन खोलने की बात कही है। वह उचित ही है। सरकार अपने स्तर पर जितना कुछ कर सकती है, उतना तो उसे करना ही चाहिए लेकिन लगता नहीं कि कोरोना संक्रमण का भूत इस देश का इतनी आसानी से पीछा छोड़ने जा रहा है।
  
गृह मंत्रालय ने अपने सात पन्ने के आदेश में कहा है कि देश के सभी कंटेंनमेंट जोन में 30 जून तक लॉकडाउन बना रहेगा। अभी देश के 12 राज्यों के 30 शहरों में कंटेनमेंट जोन हैं। महाबंदी तीन चरणों में स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश पर खत्म की जाएगी। देशभर में रात का कफ् र्यू जारी रहेगा। यानी रात 9 बजे से सुबह 5 बजे तक कहीं भी आवाजाही पर रोक लगी रहेगी। जरूरी सेवाओं को इसमें छूट दी  गई है।शहरों को अपवाद मानें तो गांवों—कस्बों में रात 9 के बाद लॉकडाउन जैसे ही हालात होते हैं। 8 जून के बाद धार्मिक स्थल मसलन मंदिर, मस्जिद,गुरुद्वारे और चर्च सभी खुल जाएंगे।  होटल, रेस्टोरेंट और हॉस्पिटैलिटी से जुड़ी सेवाएं और शॉपिग मॉल्स सशर्त खोल दिए जाएंगे। स्कूल-कॉलेजों पर जुलाई में दूसरे चरण के तहत फैसला किया जाएगा। स्कूल, कॉलेज,  ट्रेनिंग और कोचिंग संस्थान राज्य सरकारों से सलाह लेने के बाद खुल पाएंगे।

तीसरे चरण में अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों, मेट्रो रेल, सिनेमा हॉल, जिम, तरणताल, मनोरंजन पार्क, थिएटर, बार, ऑडिटोरियम, असेंबली हॉल आदि खोलने पर विचार हो सकता है। सामाजिक, राजनीतिक , खेल, मनोरंजन , एकेडमिकऔर सांस्कृतिक कार्यक्रम, धार्मिक समारोह और बाकी बड़े जमावड़े के लिए तीसरे चरण तक लोगों का इंतजार करना पड़ेगा। केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के विवेक पर भी बहुत कुछ डाल दिया है। वे कंटेनमेंट जोन के बाहर बफर जोन की पहचान भी कर सकते हैं। ये ऐसे इलाके होंगे, जहां नए मामले आने का खतरा ज्यादा है। बफर जोन में भी राज्य सरकारें प्रतिबंधों को जारी रख सकती हैं । राज्य सरकारें कंटेनमेंट जोन के बाहर कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधित कर सकती हैं या जरूरी लगने पर उन्हें अनुमति दे सकती हैं।
   
सवाल यह है कि केंद्र सरकार ने लॉकडाउन—5 की बजाय अनलॉक—1 की राह क्यों चुनी? ऐसा क्या उसने राजनीतिक दबाव में किया या वह देश की घटती जीडीपी के आंकड़ों से घबरा गई या फिर उसने भी वही सोचा जो इस देश का हर आम और खास क्या सोच रहा था। जब लॉकडाउन की घोषणा हुई थी तब देश में कोरोना संक्रमित 150 से भी कम थे। लॉकडाउन के चार चरण पूरा होते—होते वे अगर एक लाख 82 हजार से ज्यादा हो गए तो इसका मतलब है कि लॉकडाउन के प्रभावी नतीजे नहीं निकले। इतनी बंदिशों के बाद जब यह हाल है तो बंदिशों के हटने के बाद का नजारा कया होगा, चिंता की बात तो यह है?सरकार के नुमाइंदे और यह देश इस बात पर अपनी पीठ थपथपा सकता है कि हमारे यहां मरने के आंकड़े अन्य देशों के मुकाबले बहुत कम हैं लेकिन अनलॉक—1 के बाद कोरोना संक्रमण के हालात क्या होंगे, विचार तो इस पर भी किया जाना चाहिए।
   
भारत घनी आबादी वाला देश है। उत्तर प्रदेश की आबादी तो यूरोपीय देशों की आबादी की एक तिहाई है। यह धारावी जैसी झुग्गड़ बस्तियां हैं। ऐसे में अनलॉक—1 व्यावसायिक लिहाज से भले ही उपयोगी सिद्ध हो लेकिन स्वास्थ्य के लिहाज से बिल्कुल भी उचित नहीं है। व्यक्ति का जीवन रहेगा तो वह कमा भी लेगा लेकिन जीवन ही न रहा तो वह क्या करेगा? देश को रामभरोसे छोड़ना उचित नहीं है लेकिन जब देश के अधिकांश लोग आदेश को मानते ही नहीं, भले ही ऐसा वे मजबूरीवश करते हों लेकिन इससे रोग से लड़ने की क्षमता और उत्साह का क्षरण तो होता ही है। सरकार ने तीन चरणों में लॉकडाउन खोलने की गुंजाइश रखकर विवेकपूर्ण निर्णय लिया है लेकिन पहले ही कोरोना बहुत नुकसान कर चुका है। सरकार यह कह रही है कि जब तक वैकसीन नहीं बन जाती तब तक लोगों को कोरोना के बीच ही जीना होगा। यह सच है कि इस कोरोनाकाल में देश के अस्पतालों में जांच सुविधाएं बढ़ी हैं लेकिन जिस रोग से सेना के जवान, पुलिसकर्मी, रेलकर्मी, रोडवेजकर्मी, चिकित्सक और यहां तक कि जहाज के पायलट तक प्रभावित हो रहे हैं, उसे जनता के विवेक पर छोड़ना कितना तर्कसंगत है?केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस पर विचार करना चाहिए था। माना कि उन पर जन अपेक्षाओं का भारी दबाव है लेकिन जब लॉकडाउन समाप्त होने के बाद देश में कोरोना का संभावित विस्फोट होगा तब केंद्र और राज्य सरकारें दबावमुक्त होंगी, यह कैसे कहा जा सकता है? ऐसा लगता है कि यह निर्णय थोड़ा जल्दी में हो गया है। अब राज्य सरकारों और जिला प्रशासन को, खासकर नागरिकों को अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी। खुद संक्रमण से बचना और अपनों को बचाना होगा।
   
आपदाकाल में स्वतंत्रता की मांग अक्सर घातक होती है, यह बात राज्य सरकारें जितनी जल्दी समझ लें, उतना ही अच्छा है। स्वास्थ्य के विजयपथ पर चलने के लिए संयमित जीवन, उचित आहार—विहार, विश्राम और काम के संतुलन को संभालना होगा। जिम्मेदारी, बहादुरी,ईमानदारी से अपने दायित्व निभाकर ही हम देश को कोरोना से निजात दिला सकते हैं। भीड़ का हिस्सा बनने की बजाय एक निश्चित दूरी रखना ही आज का विवेक है। इसे अपनाने में ही स्वस्थ जीवन का राज छिपा है। व्यावसायिक गतिविधियों और स्वास्थ्य का चोली—दामन का रिश्ता है लेकिन इसमें जरा सा भी असंतुलन देश को परेशानी में डाल सकता है। यह बात समझा जाना बहुत जरूरी है।




-सियाराम पांडेय 'शांत’-

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