बिहार : प्रखर समाजवादी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को खो दिया - Live Aaryaavart

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रविवार, 13 सितंबर 2020

बिहार : प्रखर समाजवादी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को खो दिया

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पटना. बिहार ने विख्यात समाजवादी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को खो दिया है.उनका जन्म 6 जून 1946 को वैशाली के शाहपुर में हुआ था. परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री हैं. सिंह की पत्नी का पहले ही निधन हो चुका है. रघुवंश बाबू का अंतिम संस्कार वैशाली जिले के महनार गांव स्थित पानापुर घाट में सोमवार को राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा.  बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नाम काफी चर्चा में है. उन्‍हें लालू प्रसाद यादव का संकटमोचक कहा जाता है. वह बिहार में पिछड़ों की पार्टी का तमगा हासिल करने वाले राजद का सबसे बड़ा सवर्ण चेहरा भी हैं. हम बात कर रहे हैं रघुवंश प्रसाद सिंह की जिन्होंने नाराज होकर पार्टी के अहम पद से न केवल इस्तीफा दे दिया है, बल्कि पार्टी की वर्तमान नीतियों के खासे विरोधी भी हो गए हैं. बिहार और समूचे देश भर में रघुवंश प्रसाद सिंह की पहचान एक प्रखर समाजवादी नेता के तौर पर है. बेदाग और बेबाक अंदाज वाले रघुवंश बाबू को शुरू से ही पढ़ने और लोगों के बीच में रहने का शौक रहा है रघुवंश प्रसाद सिंह राजनेता बाद में बने और प्रोफेसर पहले. बिहार यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त करने के बाद डॉ रघुवंश प्रसाद सिंह ने साल 1969 से 1974 के बीच करीब 5 सालों तक सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज में बच्चों को गणित पढ़ाया. गणित के प्रोफेसर के तौर पर डॉ रघुवंश प्रसाद सिंह ने नौकरी भी की और इस बीच कई आंदोलनों में वह जेल भी गए. पहली बार 1970 में रघुवंश प्रसाद टीचर्स मूवमेंट के दौरान जेल गए. उसके बाद जब वो कर्पूरी ठाकुर के संपर्क में आए तब साल 1973 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के आंदोलन के दौरान फिर से जेल चले गए. इसके बाद तो उनके जेल आने जाने का सिलसिला ही शुरू हो गया.



रघुवंश बाबू की मानें तो इस दौरान वह करीब 11 बार जेल गए. इसमें साल 1974 यानि जेपी के आंदोलन में रघुवंश प्रसाद सिंह ने खूब बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और फिर दोबारा से उन्हें जेल में बंद कर दिया गया. इन दिनों केंद्र और बिहार में कांग्रेस पार्टी की हुकूमत थी. इमरजेंसी के दौरान जब बिहार में जगन्नाथ मिश्र की सरकार थी, तो बिहार सरकार ने जेल में बंद रघुवंश प्रसाद सिंह को प्रोफेसर के पद से बर्खास्त कर दिया. सरकार के इस फैसले के बाद रघुवंश प्रसाद सिंह ने कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा और फिर कर्पूरी ठाकुर और जय प्रकाश नारायण के रास्ते पर तेजी से चल पड़े. इसी दौरान जब साल 1974 में जेपी मूवमेंट के समय में मीसा एक्ट के तहत रघुवंश प्रसाद की गिरफ्तारी हुई और वो मुजफ्फरपुर जेल में बंद किए गए. उसी समय उन्हें मुजफ्फरपुर से पटना के बांकीपुर जेल में ट्रांसफर किया गया, जहां उनकी पहली बार लालू यादव से मुलाकात हुई. उस दौरान लालू पटना यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट लीडर थे और जेपी मूवमेंट में काफी सक्रिय थे. लालू शुरू से ही एक जुझारू नेता थे, जो लोगों को हमेशा हंसाया करते थे. बहुत जल्द किसी के साथ घुल मिल जाना लालू यादव खासियत थी और फिर उसी बांकीपुर जेल में जब से लालू यादव से मुलाकात हुई तभी से लालू-रघुवंश में दोस्ती शुरू हो गई. तब से लेकर आज तक यह दोस्ती खट्टे-मीठे यादों के साथ कायम है. रघुवंश साल 1977 से 1979 तक वे बिहार सरकार में ऊर्जा मंत्री रहे. इसके बाद उन्‍हें लोकदल का अध्‍यक्ष भी बनाया गया, फिर साल 1985 से 1990 के दौरान रघुवंश प्रसाद लोक लेखांकन समिति के अध्‍यक्ष भी रहे. लोकसभा के सदस्‍य के तौर पर उनका पहला कार्यकाल साल 1996 से शुरू हुआ. साल 1996 के लोकसभा चुनाव में वो निर्वाचित हुए और उन्‍हें बिहार राज्‍य के लिए केंद्रीय पशुपालन और डेयरी उद्योग राज्‍यमंत्री बनाया गया. लोकसभा में दूसरी बार रघुवंश प्रसाद सिंह साल 1998 में निर्वाचित हुए और साल 1999 में तीसरी बार वो लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए. साल 2004 में चौथी बार उन्‍हें लोकसभा सदस्‍य के रूप में चुना गया और 23 मई 2004 से 2009 तक वे ग्रामीण विकास के केंद्रीय मंत्री रहे. इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने पांचवी बार जीत दर्ज की. 1912 में बंगाल का विभाजन के फलस्वरूप बिहार नाम का राज्य अस्तित्व में आया. 1935 में उड़ीसा इससे अलग कर दिया गया.स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार के चंपारण के विद्रोह को, अंग्रेजों के खिलाफ बगावत फैलाने में अग्रगण्य घटनाओं में से एक गिना जाता है. ... भारत छोड़ो आंदोलन में भी बिहार की गहन भूमिका रही.

लोकसभा में समाजवादी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि बिहार को एक बार नहीं तीन बार विभाजन का दंश झेलना पड़ा.उन्होंने कहा कि 1912 में बिहार एवं उड़ीसा को बंगाल से अलग कर एक नए प्रांत के रूप में संगठित किया गया. 1935 में उड़ीसा को बिहार से पृथक कर बिहार को प्रांत का रूप दिया गया. सामान्यतः 1912 को बिहार प्रांत के गठन का वर्ष माना जाता है, मगर स्मरणीय है कि उस वर्ष बिहार एवं उड़ीसा संयुक्त रूप से एक प्रांत बने थे और 1935 में ही पृथक् बिहार का गठन संभव हुआ. 1947-48 में बिहार एवं उड़ीसा की सीमाओं का पुनः निर्धारण हुआ, जब देशी रियासतों का विलय भारतीय संघ में किया गया. 1956 में राज्यों के भाषाई आधार पर पुनर्गठन के क्रम में पुरुलिया एवं पूर्णिया जिलों के कुछ भाग को पश्चिम बंगाल में शामिल किया गया. हाल में, 15 नवम्बर, 2000 को, बिहार का पुनः विभाजन हुआ और छोटानागपुर के पठारी भूखंड और सम्बद्ध जनजातीय बाहुल्य आबादी वाले क्षेत्र को झारखण्ड नामक नए राज्य में संगठित किया गया. रघुवंश प्रसाद सिंह के मुताबिक UPA 2 में भी उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल होने का मौका मिला था, लेकिन लालू यादव की दोस्ती की वजह से ही उन्‍होंने मनमोहन सिंह के मंत्री पद के ऑफर को ठुकरा दिया. उसके बाद से आज तक रघुवंश प्रसाद सिंह अपनी दोस्ती के खातिर और लालू की खुशी के लिए समझौता ही करते रहे. वो और बात है कि इस बार पानी सिर से थोड़ा ऊपर बह रहा है. रघुवंश प्रसाद सिंह अपने दो भाइयों में बड़े हैं. उनके छोटे भाई रघुराज सिंह का पहले ही देहांत हो गया है. रघुवंश प्रसाद सिंह की धर्मपत्नी जानकी देवी भी अब इस दुनिया में नहीं हैं. रघुवंश बाबू को दो बेटे और एक बेटी है. रघुवंश प्रसाद सिंह के परिवार से उनके अलावे कोई दूसरा सदस्य राजनीति में सक्रिय नहीं है. रघुवंश प्रसाद के दोनों बेटे इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके नौकरी कर रहे हैं. बड़े बेटे सत्यप्रकाश दिल्ली में इंजीनियर हैं और वहीं नौकरी करते हैं जबकि उनका छोटा बेटा शशि शेखर भी पेशे से इंजीनियर है जो हांगकांग में नौकरी करते हैं. इसके अलावे जो एक बेटी है वो पत्रकार है और टीवी चैनल में काम करती हैं. रघुवंश प्रसाद सिंह से ये जानना चाहा कि आखिर उनके अलावे परिवार के किसी दूसरे सदस्य ने राजनीति में कदम क्यों नहीं रखा तो रघुवंश बाबू बड़ी बेबाकी से कहते हैं कि आज जिस हालत में हम अभी पड़े हैं, अपने बच्चों को भी उसी में धकेल देते ये हरगिज सही नहीं होता. ये भी कोई भला जिंदगी है पूरे जीवन भर त्याग, त्याग और सिर्फ त्याग.

2 फरवरी, 2006 को देश के 200 पिछड़े जिलों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना लागू की गई। 2008 तक यह भारत के सभी जिलों में लागू की जा चुकी थी.2009 के चुनाव में कांग्रेस अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही. उस समय राजनीतिक विश्लेषकों ने इस जीत की दो बड़ी वजहें बताई थीं. पहला किसानों की कर्जा माफ़ी. दूसरा मनरेगा। लेकिन जिस योजना ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी सुनिश्चित की उसका श्रेय रघुवंश प्रसाद को नहीं मिला.‘' एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’ में लेखक संजय बारू ने लिखा है,”कांग्रेस चाहती थी कि मनरेगा का पूरा क्रेडिट राहुल गांधी को दिया जाए। लेकिन असली हकदार मनमोहन सिंह और रघुवंश प्रसाद सिंह हैं।” भारतीय राजनीति में बिरला ही ऐसा होता है कि आप अच्छा कार्य करें और उसका श्रेय आपको मिल भी जाए. खासतौर पर जब आप न बड़े दल के नेता हों और न ही कोई बेमिसाल हस्ती.लेकिन, राजद सांसद और संप्रग के पहले कार्यकाल में ग्रामीण विकास मंत्री रहे रघुवंश प्रसाद सिंह के साथ ऐसा ही हुआ है.प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू की सनसनीखेज पुस्तक ने यह सच सामने ला दिया कि जिस मनरेगा का श्रेय सारे कांग्रेसी और स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राहुल गांधी को दे रहे हैं, असलियत में उसके हकदार रघुवंश बाबू हैं. दरअसल, मनरेगा का श्रेय राहुल गांधी को देने के लिए रघुवंश को पीछे धकेल दिया गया.कांग्रेस हाईकमान के निर्देश को देखते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी खुद श्रेय लेने से पीछे हट गए. संजय बारू ने अपनी किताब में रघुवंश बाबू के साथ हुई नाइंसाफी का खुलासा किया है. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को शुरू कराने में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने अहम भूमिका निभाई थी. ग्रामीण युवाओं को उनके गांव में ही रोजगार मुहैया कराने वाली इस योजना के चलते ही शहरों की ओर हो रहा अनावश्यक पलायन रुक गया था. राजनीतिक रूप से इसका फायदा संप्रग को मिला और वह दोबारा सत्ता में आई.इसके बाद से राजनीतिक महत्व को देखते हुए कांग्रेस इसका श्रेय राहुल गांधी को देती रही है। बारू ने लिखा है कि पार्टी के दबाव में मनमोहन सिंह और रघुवंश प्रसाद सिंह को श्रेय देने वाले बयान को प्रधानमंत्री कार्यालय को वापस लेना पड़ा था. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने आज सुबह रघुवंश प्रसाद सिंह को फोन कर उनका हाल जाना है और उसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी रघुवंश बाबू की तबीयत को लेकर बातचीत की। इससे एक सकारात्मक संकेत कहा जा सकता है कि रघुवंश बाबू कभी भी राजद के पाले में जा सकते हैं।

ये हैं तीन बातें
रघुवंश बाबू ने फेसबुक पर अपनी चिट्ठी को पोस्ट करते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री से उन 3 मांगों को पूरा करने का आग्रह किया है, जिससे बिहार में उनकी विजय पताका फहरा सकती है। 
1. उन्होंने वैशाली को जनतंत्र की जननी और प्रथम गणतंत्र कहते हुए आग्रह किया है कि 15 अगस्त को मुख्यमंत्री पटना में और 26 जनवरी को वैशाली में राष्ट्रध्वज फहराने का निर्णय कर इतिहास की रचना करें। इसके लिए साल 2000 के पहले झारखंड बंटवारे का जिक्र किया है और कहा है कि 26 जनवरी को पहले रांची में झंडोत्तोलन होता था।

2. पत्र में उन्होंने मनरेगा कानून में सरकारी और एससी-एसटी की जमीन में प्रबंध का विस्तार करते हुए उस खंड में आम किसानों की जमीन को भी काम में जोड़ने का आग्रह किया है। उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि इस आशय का अध्यादेश तुरंत लागू कर आने वाले आचार संहिता से बचा जाए।

मैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी से आग्रह करूंगा कि पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह जी ने अपनी आखिरी चिट्ठी में जो भावना प्रकट की है उसको परिपूर्ण करने के लिए आप और हम मिलकर पूरा प्रयास करें: पीएम  एकता परिषद के अनिल गुप्ता ने कहा कि जनादेश 2007 आन्दोलन के दौरान तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री प्रो, रघुबंश बाबू दो बार आन्दोलन मे शरीक हुए और भूमि समस्याओं के समाधान के लिये टास्क फोर्स बनाया था, किसान और मजदूरों की आवाज, प्रखर समाजवादी नेता और मनरेगा मैन को सादर नमन.

पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने कहा कि  "प्रिय रघुवंश बाबू! ये आपने क्या किया? मैनें परसों ही आपसे कहा था आप कहीं नहीं जा रहे है.लेकिन आप इतनी दूर चले गए. नि:शब्द हूँ.दुःखी हूँ। बहुत याद आएँगे." 

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