बिहार : आजकल मीडिया की दुनिया में‌ हलचल मची हुई है - Live Aaryaavart

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शनिवार, 5 सितंबर 2020

बिहार : आजकल मीडिया की दुनिया में‌ हलचल मची हुई है

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पटना, 05 सितम्बर। आजकल मीडिया की दुनिया में‌ हलचल मची हुई है। कोरोना का कहर तो है ही, कोरोना से भी खतरनाक हो गये हैं मीडिया संस्थानों के मालिकान को छंटनी का बहाना मिल गया है। इस कठिन समय में छोटे पदों और कम तनख्वाहों पर काम करने वाले तमाम कर्मचारियों का जीवन इस छंटनी ने नरक में बदल दिया है। कइयों को कोई विकल्प शेष न रहने पर आत्महत्या के लिए भी मजबूर होना पड़ा है। यह बहुत दुख और पीड़ा की बात है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इन मामलों पर गौर करने का निश्चय किया है। आशा की जानी चाहिए कि बहुत मेहनत करके, जोखिम उठाकर बहुत कम पैसे में जीवन चलाने और निरंतर पारिवारिक तनाव में जीने वाले ऐसे मीडियाकर्मियों को न्याय मिले। परंतु इस मारा-मारी में अनेक ऐसे मूर्धन्य संपादकों की नौकरियों पर भी आफत घहराने लगी है, जो छल, कपट, फरेब और शोषण के पांव पर ही लम्बे समय तक टिके रहे हैं।  अखबारों में कर्मियों की छटनी जरूर हो रही है, मगर यह कहना गलत है कि कोरोना काल में अखबारों की आय घटी है। अखबारों की प्रसार संख्या जरूर घटी है, मगर अखबारों का एकनॉमिक्स समझने वाले जानते हैं कि प्रसार बढ़ने का अखबारों की आय बढ़ने से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। बल्कि कई दफा प्रसार घटने से अखबारों की लागत घट जाती है और बचत ही हो जाती है। बिहार में अखबारों को अपने कुल रेवेन्यू का आधा से अधिक हिस्सा सरकारी विज्ञापनों से मिलता है, इसमें कोई कमी नहीं आई। बढ़ोतरी ही दर्ज की गयी। लॉक डाउन में भी। 

अभी चुनाव की वजह से पोलिटिकल विज्ञापन भी बढ़ेंगे। चुनाव में अखबार वालों की उल्टी सीधी कमाई भी होती है। इसलिये यह मामला मंदी या नुकसान का नहीं है। मामला सिर्फ इतना है कि कोरोना और लॉक डाउन में अखबार वालों ने कम मैन पॉवर में काम करना सीख लिया है। जब कम मैन पॉवर में कम पन्ने छाप कर, कम एडिशन निकाल कर भी उतनी ही कमाई हो रही है तो मैन पॉवर क्यों न घटा लिया जाये। मामला दरअसल यही है। अगर मैं ईमानदारी, निष्ठा, सत्य और जनपक्षधरता की पत्रकारिता करता तो नीचे के किसी पायदान पर पड़ा होता। आगे बढ़ने का तरीका मैंने खुद इजाद किया। मैं हमेशा इस षडयंत्र में लगा रहता था कि किस तरह उन लोगों को रास्ते से हटाऊँ जो मेरे लिए बाधा बन सकते हैं। झूठ नहीं बोलूंगा, इसके लिए मैंने साम, दाम, दंड, भेद सबका भरपूर इस्तेमाल किया।  अब तक मैं दस गाड़ियां बदल चुका हूं। मुझे अच्छी प्रकार याद है कि जब अधिकांश पत्रकार साइकिल या स्कूटर का इस्तेमाल करते थे, तब मेरे पास अम्बेसेडर थी। पुरानी थी, घिसी-घिसाई, पर थी चौपहिया। मेरे काम से सेठ व्याकुल चंद्र काफी खुश रहते थे। उनके अखबार की प्रसार संख्या तो स्पीड से बढ़ ही रही थी, उनकी कई नितांत गुह्य-गंभीर समस्याएं भी मैंने पलक झपकते सुलझा दी थीं। 

अमरपुर में मैं नये संस्करण का प्रभारी था, सर्वेसर्वा। सम्पादक भी, प्रबंधक भी। टू इन वन। व्याकुल जी जानते थे कि मैं आल इन वन था। मेरा हौसला आसमान छूने लगा था। परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ। मैंने अपना दरबार लगाना शुरू कर दिया। सबके लिये दरवाजे खुले हुए थे। भले से भला और लम्पट से लम्पट। दारोगा से लेकर डीएम तक और संतरी से लेकर मंत्री तक सब आने लगे। जो मेरे दरबार में आ जाता, समझो भयमुक्त हो जाता। भाग्य ने मेरा डटकर साथ दिया और दो वर्षों में ही मैने अमरपुर में दो प्लाट और दो फ्लैट खरीद लिये, रजधानी में एक मकान बुक करा लिया और अपनी  खटारा की जगह एक न्यू माडल चमचमाती कार ले आया। बीच में व्याकुलजी एक बार दौरे पर आये तो उनको शहर के सबसे आलीशान होटल में ठहराया गया। मैंने व्याकुलजी के लिये खास मालिश का भी इंतजाम कराया। अगले दिन सवेरे जब मैं वहां पहुंचा तो यह देखकर मन प्रसन्न हुआ कि व्याकुल जी का चेहरा दप-दप दमक रहा था, वे पूर्ण संतुष्ट लग रहे थे। उन्होंने मेरी पीठ ठोकी और मेरी तनखाह दूनी कर गये। अखबार का सर्कुलेशन कुलांचें भर रहा था। एक तो दाम कम, दूसरे इतना मसाला कि पाठक का दिल बाग-बाग हो जाय। अपराध, फिल्म, सट्टाबाजार और वेश्यालयों की अन्तरंग कथाओं से भरे हुए मेरे खबरिया बम की खरीद के लिये सुबह-सुबह मारा-मारी मच जाती। तस्वीरें इतनी चुनिंदा और धांसू होतीं कि पोर्न के बिना बेचैन रहने वालों की बुरी आदतें बहुत जल्द छूट गयीं। भाषा चुटीली, जायकेदार, स्वादिष्ट और गुदगुदाने वाली। सामग्री मिर्च-मिष्ट-मिक्स। मैंने प्रसार संख्या बढ़ाने के जो नुस्खे इजाद किये, वे कमोबेश  अब भी समाचारपत्रों की मजबूरी बने हुए हैं।



एक पते की बात बताऊं आप को। मैंने कभी अपने से ज्यादा बुद्धिमान पत्रकार को अपने संस्थान में नौकरी नहीं दी। ऐसे साथी ज्यादा काम के होते हैं जो पूरी तरह आप की दया पर निर्भर हों। वे आप के लिये हमेशा जान देने को तैयार रहेंगे। उनका आप जितना चाहें, शोषण करिये, जुबान नहीं खोलेंगे। वे सचमुच के हीरे मोती होते हैं। हर सही-गलत में साथ देने वाले अपठ किंतु कर्मठ सहकर्मियों की मदद और वक्त के छल-फरेब की अपनी साफ-सुथरी समझ के कारण अब मैं देश के कुछ  श्रेष्ठतम पत्रकारों, सम्पादकों में शामिल हूं। प्रधानमंत्री के काफिले के साथ दर्जनों बार विदेश हो आया हूं। लगभग आधी दुनिया घूम चुका हूं। मुझे अभी तय करना है कि मैं संसद में जाऊं या वर्धा जाकर गांधी दर्शन का पाठ करूं- रघुपति राघव राजा राम , सबको सन्मति दे भगवान। जै सिया राम, जै सिय राम। 

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