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मंगलवार, 8 सितंबर 2020

बिहार की जनता ने नीतीश की वर्चुअल रैली को किया रिजेक्ट : माले

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पटना 7 सितम्बर,  भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल और अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा के महासचिव धीरेन्द्र झा ने आज नीतीश कुमार की वर्चुअल रैली को फ्लाॅप शो बताया और कहा कि बिहार की जनता ने इसे रिजेक्ट कर दिया है. नेताओं ने कहा कि दरअसल भाजपा व जदयू के खिलाफ आज जनता के हर हिस्से का आक्रोश चरम पर है और नीतीश जी उससे पूरी तरह घबराए हुए हैं. इसलिए वे जनता का सामना करने से भी बच रहे हैं और जनता की गाढ़ी कमाई को वर्चुअल प्रचार में उड़ा रहे हैं.  माले नेताओं ने कहा कि नीतीश कुमार ने बिहार के ज्वलंत सवालों को छुआ तक नहीं और गोल-गोल बोलते रह गए. उन्हें यह जवाब देना था कि विगत 15 वर्षों से बिहार में ‘डबल इंजन’ की सरकार होने के बावजूद भी आज अपना प्रदेश बेरोजगारी में नंबर एक पर क्यों है? रोजी-रोजगार के लिए बिहार के करोड़ों युवा तरस रहे हैं, लेकिन सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया और न ही उन्हें बेरोजगारी भत्ता दिया. शिक्षकों को भी उन्होंने धोखा देने का ही काम किया है. 



शिक्षा की हालत बद से बदतर होती गई. आज तक देश का सातवां सबसे पुराना विश्वविद्यालय पटना विवि को केंद्रीय विवि का दर्जा नहीं मिल सका. प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की पूरी व्यवस्था चरमरा गई है. लाखों शिक्षकों व कर्मचारियों के पद खाली पड़े हैं, लेकिन सरकार कोई बहाली नहीं कर रही है. उलटे सरकार प्राथमिक विद्यालयों को विलोपित करने में लगी हुई है.  राज्य में सामंती-अपराधियों को तांडव लगातार जारी है. पूर्णिया, भोजपुर से लेकर राजधानी पटना तक अपराधियों का मनोबल आसमान छू रहा है. राजधानी पटना में दिनदहाड़े शराब माफिया पुलिस पर ही जानलेवा हमले कर रहे हैं, लेकिन सरकार बेशर्मी से ‘सुशासन’ का राग अलाप रही है. नीतीश जी दलितों की हत्या पर कहते हैं कि घर में एक नौकरी दी जाएगी. हम उनसे पूछना चाहते हैं कि दलितों की हत्या होगी ही क्यों? और नौकरी देने का प्रावधान बहुत पहले से बना हुआ है, नीतीश जी यह बताएं कि विगत 15 वर्षों में उन्होंने कितनी नौकरियां दीं हैं? यह भी बताएं कि उनके राज में दलित-गरीबों के जनसंहारों के सभी अभियुक्त बरी क्यों हुए? नीतीश कुमार ने प्रवासी मजदूरों के प्रति जो अंसवेदनशीलता दिखलाई है, उसके लिए उन्हंे पूरे बिहार की जनता से माफी मांगनी चाहिए. लाखों प्रवासी मजदूर के सामने आज जीवन मरण का प्रश्न है लेकिन सरकार के लिए यह कोई मसला ही नहीं है. उलटे वह पूरी तरह से दमनात्क रवैया अपनाए हुए है.

बिहार में कोरोना का कहर का लगातार बढ़ता गया और सरकार सोती रही. अब झूठे आंकड़े देकर कह रही है कि बिहार में स्थिति में गुणात्मक सुधार है. वास्तविकता यह है कि सरकार व्यापक पैमाने पर कोरोना की जांच ही नहीं करवा रही है और राज्य की जनता को उनके अपने रहमोकरम पर छोड़ दिया है. कोरोना से जंग में सबसे ज्यादा डॉक्टर, मेडिकल स्टाफस और आशाओं की मौतें हुईं, लेकिन उन्हें श्रधांजलि देने की जरूरत भी नीतीश कुमार ने महसूस नहीं की. कोरोना लॉकडौन से तबाह स्वंय सहायता समूह-जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं के लोन व किस्ती माफ करने के सवाल को उन्होंने छूने तक की जरूरत महसूस नहीं की. बदहाल किसानी में केसीसी माफ करने के सवाल पर भी मुख्यमंत्री ने चुप्पी साधे रखी. सृजन घोटाला की मुख्य अभियुक्त और बालिका गृह ब्लात्कारकाण्ड के मुख्य अभियुक्तों को संरक्षण पर नीतीश सरकार को माफी मांगनी चाहिए, हकीकत यह है कि यह सब कुछ उनके ही नेतृत्व में चल रहा है. जनादेश 2015 से विश्वासघात करने वाले नीतीश कुमार आज पूरी तरह से भाजपा की गोद में बैठ गए हैं और विगत सालों में यूपी की ही तरह बिहार में जहानाबाद से लेकर सहरसा तक सांप्रदायिक उन्माद की एक से बढ़कर एक घटनाएं घटीं, लेकिन नीतीश जी के मुंह से बोली तक न फूटी. इस सरकार को आगामी चुनाव में बिहार की जनता सबक सिखाएगी.

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