बिहार : अंतरिम राहत पाने के लिए याचिकाकर्ता की दलील सिर्फ छलावा है : एनआईए - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2020

बिहार : अंतरिम राहत पाने के लिए याचिकाकर्ता की दलील सिर्फ छलावा है : एनआईए

एनआईए ने कहा कि स्वामी और 15 अन्य पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) सहित कई तरह के गंभीर आरोप लगे हैं, जिनके लिए आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है...

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पटना। एनआईए ने जमानत याचिका के जवाब में कहा, ‘कोरोना वायरस की मौजूदा स्थिति की आड़ में आरोपी स्टेन स्वामी जमानत मांगकर स्थिति का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं।’एनआईए बहुत सख्त है महज अधिवक्ता अरूण फरेरा को इस लिए गिरफ्तार कर लिये गये कि अधिवक्ता -कार्यकर्ता सुधीर धवले को रिहा करने की वकालत कर रहे थे। इस बीच एल्गार परिषद मामले में इस महीने की शुरुआत में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा गिरफ्तार किए गए सामाजिक कार्यकर्ता स्टेन स्वामी ने अंतरिम जमानत के लिए विशेष अदालत का रुख किया है।स्टेन स्वामी ने स्वास्थ्य आधार पर अंतरिम जमानत की मांग की है।याचिका में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नियुक्त की गई महाराष्ट्र सरकार की उच्चाधिकार समिति के निर्देशों का उल्लेख किया गया है, जिसमें कोरोना के दौरान जेलों से भीड़ कम करने का सुझाव दिया गया।याचिका में उनकी उम्र और स्वास्थ्य स्थितियों की वजह से कोरोना से उनके बचाव की बात कही गई है।

हालांकि, एनआईए ने शनिवार को उनकी जमानत याचिका का विरोध कर कहा कि समिति के दिशानिर्देशों के अनुसार स्वामी राहत पाने के योग्य नहीं है।एनआईए ने जमानत याचिका के जवाब में कहा, ‘कोरोना वायरस की मौजूदा स्थिति की आड़ में आरोपी स्टेन स्वामी जमानत मांगकर स्थिति का अनुचित लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं।’ एनआईए ने कहा कि स्वामी और 15 अन्य पर गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) सहित कई तरह के गंभीर आरोप लगे हैं, जिनके लिए आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।एनआईए ने स्वामी को दोषी ठहारने के लिए खिलाफ पर्याप्त सबूत होने का दावा करते हुए कहा कि समिति के दिशानिर्देश 60 साल से अधिक उम्र के अंडरट्रायल कैदियों के लिए जमानत याचिका देने पर विचार करने का सुझाव देते हैं, लेकिन इसे ऐसे मंजूरी नहीं दी जा सकती।एनआईए ने जवाब में कहा कि यह स्पष्ट है कि मेडिकल स्थिति के संबंध में अंतरिम राहत पाने के लिए याचिकाकर्ता की दलील सिर्फ छलावा है। बता दें कि स्टेन स्वामी को आठ अक्टूबर को झारखंड से गिरफ्तार किया गया था और उन्हें अगले दिन मुंबई की विशेष अदालत के समक्ष पेश किया गया था, जहां उन्हें 23 अक्टूबर तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।एनआईए ने नौ अक्टूबर को स्वामी और नौ अन्य के खिलाफ पूरक आरोपपत्र दायर किया था।चार्जशीट में कहा गया था कि स्वामी प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के सदस्य हैं और उसकी गतिविधियों में उनकी सक्रिय भूमिका है।मालूम हो कि NIA की चार्जशीट में लिखा है 'खूंखार माओवादी' मिलिंद तेलतुम्बडे नागपुर में रहते थे, लेकिन पकड़े नहीं गए।

स्वामी ने अपनी गिरफ्तारी से पहले बयान में कहा था कि कार्यकर्ताओं, वकीलों, छात्र नेताओं और कवियों सहित उन्हें और अन्य, जो आदिवासियों, दलितों और वंचितों के अधिकारों के लिए खड़े हैं और देश की सत्ताधारी शक्तियों के प्रति असंतोष जता रहे हैं, उन्हें निशाना बना रही है। पहली जनवरी को हुई भीमा-कोरेगांव की भयावह दलित-विरोधी हिंसा के बाद से पुणे पुलिस असली गुनहगारों को पकड़ने के बजाये लगातार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है। 6 जून को उसने छह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों को ‘टॉप अर्बन माओइस्ट ऑपरेटिव्स’ बताकर गिरफ़्तार किया और यह दावा किया कि भीमा-कोरेगांव की हिंसा के पीछे उनकी भूमिका थी। इसी कड़ी में देश के अलग-अलग भागों में सात महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घरों पर छपे मारे गए—दिल्ली में गौतम नवलखा, हैदराबाद में वरवर राव, फ़रीदाबाद में सुधा भारद्वाज, मुंबई में वर्नन गोंसाल्विस और अरुण फ़रेरा, रांची में स्टेन स्वामी और गोवा में आनंद तेलतुम्बड़े के घर पर छापा मारकर पुलिस ने उनके अनेक कागज़ात, दस्तावेज़, लैपटॉप आदि जब्त किये। सुधा भारद्वाज, वरवर राव, गौतम नवलखा, वर्नन गोंसाल्विस और अरुण फ़रेरा को यूएपीए के तहत गिरफ़्तार भी किया जा चुका है। गौर करने की बात है कि ये सभी लोग पत्र-पत्रिकाओं से लेकर सरकारी महकमों और अदालतों तक दलित हक़ों की लड़ाई लड़ते रहे हैं। बाद में इस मामले में रिपब्लिकन पैंथर्स जातीय अनातची चलवाल (आरपी) के नेता सुधीर धवले, नागपुर में मानवाधिकार मामलों के वकील सुरेंद्र गाडलिंग, दिल्ली के कार्यकर्ता रोना विल्सन, नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफे़सर शोमा सेन, प्राइम मिनिस्टर रूरल डेवलपमेंट फेलोशिप (पीएमआरडीएफ) के पूर्व फेलो महेश राउत को जून, 2018 के पहले सप्ताह में मुंबई, नागपुर और दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया।इसके बाद महाराष्ट्र पुलिस ने विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और वकीलों के घरों की तलाशी ली। इसमें रिवॉल्यूशनरी राइटर्स एसोसिएशन के संरक्षक वरवरा राव भी शामिल थे।वरवरा राव को हैदराबाद से गिरफ़्तार किया गया और पुलिस उन्हें पुणे ले गई.ठीक उसी दिन सामाजिक कार्यकर्ता-वकील सुधा भारद्वाज, नागरिक अधिकारों से जुड़े गौतम नवलखा, सामाजिक कार्यकर्ता-वकील अरुण फरेरा और लेखक-सामाजिक कार्यकर्ता वेर्नोन गोंजाल्विस को अलग अलग जगहों से गिरफ़्तार किया गया।इनमें फरेरा सुधीरा को रिहा करने की वकालत कर रहे थे।

बता दें कि एल्गार परिषद मामले में गिरफ्तार वकील सुरेंद्र गाडलिंग और लेखक-कार्यकर्ता सुधीर धवले ने मामले में जांच पुणे पुलिस से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंपे जाने को शुक्रवार को बंबई उच्च न्यायालय में चुनौती दी. यह मामला इस साल 24 जनवरी को पुणे पुलिस से एनआईए को हस्तांतरित किया गया था।इसमें माओवाद से कथित रूप से तार जुड़े होने के मामले में कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था।सामाजिक कार्यकर्ता-वकील सुधा भारद्वाज, नागरिक अधिकारों से जुड़े गौतम नवलखा, सामाजिक कार्यकर्ता-वकील अरुण फरेरा और लेखक-सामाजिक कार्यकर्ता वेर्नोन गोंजाल्विस। 

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