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रविवार, 6 दिसंबर 2020

विशेष : निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है किसान आंदोलन

सरकार किसान आंदोलन के दमन से बाज आए और किसानों की मांगों पर सीधे घोषणा करें

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देश का किसान आंदोलन महत्वपूर्ण दौर में पहुंच चुका है। पंजाब के किसानों ने पंजाब से दिल्ली आने वाले दो हाईवे पर लाखों की संख्या में डेरा डाला हुआ है तथा 50 किलोमीटर का जाम लगा हुआ है। पंजाब के किसान 6 महीने के राशन पानी की व्यवस्था के साथ पहुंचे हैं।  आजादी के बाद देश में किसी आंदोलन पर सबसे ज्यादा आंसू गैस के गोले चलाने, किसान नेताओं पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कराने, सड़कों को खोदकर उनका रास्ता रोकने, उन पर लाठी चलाने वाली और उन्हें बदनाम करने के लिए अपमानजनक आरोप लगाने वाली मोदी सरकार को किसानों से माफी मांगनी चाहिए और बिना किसी शर्त के तत्काल देश विरोधी तीनों कानूनों को वापस लेना चाहिए कम से कम उसे हर हाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों की फसल खरीद की शर्त को शामिल करने की घोषणा करनी चाहिए। किसानों ने रामलीला मैदान  मांगा था लेकिन उन्हें बुराड़ी मैदान दिया गया जो कि दिल्ली के बाहर है। वहां हजारों की संख्या में पुलिस और अर्धसैनिक बल किसानों को घेरने की तैयारी में है इसलिए किसान वहां नहीं जाना चाहते। किसानों में मन मे संदेह तभी पैदा हो गया था जब दिल्ली में 6 स्टेडियमों को जेल में तब्दील करने की बात चर्चा में आई थी। केंद्र सरकार और उसका गोदी मीडिया किसान आंदोलन को बदनाम और विभाजित करने में दमखम से लगा हुआ है। गोदी मीडिया बेशर्मी के साथ आंदोलन को खालिस्तान समर्थकों, पाकिस्तान समर्थकों, पृथकतावादीयों का आंदोलन साबित करने के लिए हर किस्म के तिकड़म और षड्यंत्र कर रहा  है। एजेंसियों की कोशिश है कि पंजाब के 30 किसान संगठनों में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की वर्किंग ग्रुप में तथा संयुक्त किसान मोर्चा में फूट पैदा की जाए।  अभी तक एजेंसियों को सफलता नहीं मिली है लेकिन प्रयास जारी है। पंजाब के किसान संगठन दिन-रात बैठकें कर एक-एक मुद्दे पर लगातार स्पष्टता एवं एकजुटता बनाए रखने के लिए सतत प्रयासरत  हैं।  पंजाब के किसान जब भी बात करते हैं तो वह पंजाब के गौरवशाली इतिहास पर बोलते हैं।यह सिख  किसान यह बतलाता है कि कैसे सिक्खों ने मुगलों, अंग्रेजों से वीरता पूर्वक संघर्ष कर उन्हें परास्त किया था।वे खुले आम घोषणा करते हैं कि अब नरेंद्र मोदी की बारी है । तीन किसान विरोधी कानून के खिलाफ केंद्र सरकार से मुकाबला करने के संदर्भ में पूरे देश में पंजाब का किसान सर्वाधिक चेतनशील दिखलाई पड़ रहा। 


देश के 5  वामदलों के साथ कांग्रेस   डी एम के  ,राष्ट्रवादी कांग्रेस ,राष्ट्रीय जनता दल   सोशलिस्ट पार्टीइंडिया, एसयूसीआई ने किसानों के प्रति केंद्र सरकार की दमनकारी नीतियों की आलोचना की है एवं  राष्ट्रपति से मुलाकात करने की घोषणा की है। वहां के किसान भी जल्दी ही मैदान में दिल्ली की सड़कों पर दिखाई देंगे इसकी शुरुआत भारतीय किसान यूनियन द्वारा कर दी गई है। यदि किसानों को रामलीला मैदान पर 26 तारीख से डेरा जमाने देते तो अब तक देश भर के लाखों किसान दिल्ली पहुंच चुके होते लेकिन सरकार ने किसानों को रामलीला मैदान में नहीं पहुंचने दिया।  आज जब सरकार के प्रति उपजे गहरे अविश्वास के कारण किसान सड़कों पर हैं, तब भी प्रधानमंत्री द्वारा की गई मन की बात में इन कानूनों को वापस लेने और किसानों के साथ किए दुर्व्यवहार पर एक शब्द नहीं बोला गया। उलटे वह अभी भी देशी विदेशी वित्तीय पूंजी और कॉरपोरेट घरानों के मुनाफे के लिए देश की खेती-किसानी को बर्बाद करने वाले अपनी सरकार द्वारा लाए कानूनों का बचाव ही करते रहे। गृह मंत्री शर्तें रखकर किसानों को वार्ता के लिए बुला रहे हैं, जबकि किसानों की मांग साफ है कि देश विरोधी तीनों कानूनों को सरकार को वापस लेना चाहिए और कम से कम कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल खरीद की बाध्यता का प्रावधान जोड़ना चाहिए। ऐसी स्थिति में सरकार को किसानों की मांग पर अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए न कि किसानों और उनके आंदोलन को बदनाम करने और उसका दमन करने में अपनी ऊर्जा लगानी चाहिए।      

          

देश के गृहमंत्री अमित शाह द्वारा जो भाषा बोली जा रही है उससे पता चलता है कि वह किसानों को एक तरह का अल्टीमेटम दे रहे है । ग्रह मंत्री द्वारा कहा गया है कि किसान बुराड़ी मैदान में बैठे और शांतिपूर्वक आंदोलन करें जिसका अर्थ यह भी है कि वह वर्तमान किसान आंदोलन को शांतिपूर्ण नहीं मानते हैं तथा जल्दी से जल्दी हाईवे खुलवाने की जुगत में है। केंद्र सरकार के मंसूबों को पंजाब के किसानों ने समझ लिया है इसलिए भी सड़कों से हटने को तैयार नहीं है। किसान संगठनों ( पंजाब संगठनों ,अखिल भारतीय किसान सँघर्ष समन्वय समिति - संयुक्त किसान मोर्चा )ने सरकार के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है।सरकार ने किसानों के खिलाफ माहौल बनाने के लिए तमाम रोड पर कृत्रिम जाम लगाने शुरू कर दिए हैं ताकि जनता किसान आंदोलन के खिलाफ बोलने लगे। किसान आंदोलन को सरकार, मीडिया और देश का ध्यान आकृष्ट कराने में अब तक सीमित सफलता मिली है। मोदीवादी और संघी आंदोलन को विभाजनकारी बतलाकर राष्ट्रवाद का एजेंडा वैसे ही आगे बढ़ा रहे हैं जैसे मुसलमानों को लेकर,तबलीगी जमात को लेकर अब तक  बढ़ाते रहे हैं।अन्नदाता किसान आंदोलनकारियों को देश का  दुश्मन साबित करने का प्रयास किया जा रहा है। किसान आंदोलन ऐसे निर्णायक दौर पर पहुंच चुका है जब देश के किसान आंदोलन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बड़ी संख्या में सड़कों पर निकल कर किसान विरोधी कृषि कानूनों और बिजली बिल 2020 को रद्द कराने के इस संघर्ष में पूरी ताकत से शामिल हों तथा इसे रद्द कराएं। केंद्र सरकार को भी यह समझ लेना चाहिए कि हरियाणा की भाजपा सरकार द्वारा जो दमनकारी कदम उठाए गए उसका प्रयोग यदि केंद्र सरकार ने भी किया तो उसके गंभीर परिणाम होंगे।



           

रामस्वरूप मंत्री

संयोजक, किसान संघर्ष समिति मालवा निमाड़

 प्रदेश अध्यक्ष, सोशलिस्ट पार्टी इंडिया मध्य प्रदेश 

( लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार , सोशलिस्ट पार्टी इंडिया मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष तथा किसान संघर्ष समिति मालवा निमाड़ के संयोजक हैं)


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