बिहार : आज टीबी दिवस है - Live Aaryaavart

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बुधवार, 24 मार्च 2021

बिहार : आज टीबी दिवस है

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पटना. टीबी कोई खानदानी बीमारी नहीं, बल्कि यह एक संक्रामक बीमारी है जो जीवाणु से फैलती है. इस रोग में खांसी, बुखार, खांसी के साथ बलगम व खून आना, कमजोरी, वजन कम होना आदि प्रमुख लक्षण हैं. समय रहते इसकी दवा नहीं लेने पर यह बीमारी जानलेवा साबित हो सकती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्ष 1996 से ही हर साल 24 मार्च को विश्व टीबी दिवस मना रहा है. इसका उद्देश्य, इस रोग से मृत्यु दर को शून्य करना, त्वरित इलाज, जांच व विश्व को टीबी मुक्त करना है.किसी को भी टीबी के लक्षण नजर आएं तो बेहिचक नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल जाकर अपना इलाज शुरू करा देना चाहिए.


आरंभ में खेतिहर मजदूर थे महादलित

आरंभ में दीघा क्षेत्र के महादलित मुसहर खेतिहर मजदूर थे. राजीव नगर में किसानों के खेत में मजदूरी किया करते थे.खेती योग्य किसानों की जमीन को बिहार राज्य आवास बोर्ड ने अधिग्रहण कर लिया है.बिहार राज्य आवास बोर्ड ने 1024.52 एकड़ जमीन अधिग्रहण कर रखा है.यहां पर किसान मकई, प्याज,आलू,धान,गेहूं, सब्जी आदि उपजाते थे.यहां के उत्पादन सामग्री को किसान दीघा हाट में ले जाकर बेचते थे.आज भी दीघा हाट बरकरार है. बाहर से सब्जी लाकर बेचा जाता है.

 

अधिग्रहण करने के बाद रद्दी कागज चुनने ल

बिहार राज्य आवास बोर्ड के द्वारा राजीव नगर की जमीन को अधिग्रहण करने के बाद खेत में मजदूर काम नहीं कर सकने के कारण महिलाएं और बच्चे रद्दी कागज आदि चुनकर बेचने लगे.पुरूष लोग बगीचा में लकड़ी काटने और ठेका पर लेकर काम करने लगे. किसी तरह से जीविका चलाने लगे.


महादलित मुसहरों ने महुआ दारू को आजीविका से जोड़ा

महुआ और गुड़ से महुआ दारू बनता है. अब यह धंधा कुटीर उघोग का रूप ले लिया है.उत्पाद विभाग के पुलिस और अधिकारियों के द्वारा लाख प्रयास करने के बाद भी कुटीर उघोग ठप नहीं हो पाता है. हां, इतना जरूर है कि पटना में पदस्थापित वरीय आरक्षी अधीक्षक से धंधेबाज खौफ खाते हैं.इसे महादलितों ने आजीविका का भी साधन बना दिया है. इसी से जीना और इसी से मरना होता है.


कुछ पूंजी होने पर महुआ और गुड़ खरीदकर महुआ दारू बनाने 

पुरूष काम करके आने के थकावट दूर करने के नाम पर दारू पीने लगे.इस तरह मुसहर महुआ दारू से जीने और दारू पीकर मरने लगे.जानलेवा यक्ष्मा बीमारी होने के बाद अनगिनत मुसहर मौत के गाल में समा गये.अभी-अभी उर्मिला देवी नामक महिला की मौत हो गयी। सिरोसिस ऑफ लीवर हो गया था.पेट और पैर में सूजन हो गया था. इसके पहले महुआ दारू पीकर यक्ष्मा बीमारी की चपेट में आकर अनगिनत मुसहरों की मौत हो गयी है.एक बबन मांझी नामक मुसहर का कहना था कि हम लोगों को बासी पैसा नहीं धारण होता है. आज जितना भी कमाते हैं, उतना खा-पीकर खत्म कर देना है. बचत करने का सवाल ही नहीं उठता है. ऐसा करने से कुछ माह के अंदर परलोक सिधार चुके.


बाजार में महुआ और गुड़ आसानी से मिल जाता 

दीघा हाट के आसपास के दुकानदार धड़ल्ले से महुआ और गुड़ बेचते हैं. 2 किलो महुआ और 1 किलो गुड़ की कीमत 170 रूपए पड़ता है. वजन करके दुकानदार महुआ और गुड़ को पॉलिथीन में करके रखते हैं. ग्राहकों की मांग पर रकम लेकर पॉलिथीन थमा देते हैं.इसके बाद घर लाया जाता है.इसी तरह बाजार में लकड़ी भी उपलब्ध है. 40 रूपए में पांच किलो लकड़ी मिलती है.खाना लकड़ी पर बने या न बने मगर महुआ दारू लकड़ी पर ही बनाया जाता है.

 

कैसा बनता है महुआ और गुड़ का दारू

बाजार से महुआ और गुड़ खरीदकर लाया जाता है.उसे बाल्टी में भरा पानी में डाल दिया जाता है. घर के अंदर अथवा घर के बाहर मिट्टी के पात्र में रखकर खाकी वर्दीधारियों से बचाने के लिए मिट्टी के अंदर गाढ़ दिया जाता है. करीब 10 दिनों तक महुआ और गुड़ को सड़ने दिया जाता है.उसके बाद निकाला जाता है.उसके बाद आग के ऊपर स्पेशल पात्र में डाल दिया जाता है. तब जाकर साइफन पद्धति से भाप बनकर नली के सहारे नीचे रखे पात्र में टपकना शुरू हो जाता है. एक-डेढ़ घंटे के अंदर महुआ दारू बन जाता है.उस समय दारू गरम रहता है. जितना दारू उतना ही पानी डालकर दारू पीने लायक बनाया जाता है.एक गिलास की कीमत 50 रूपए है. जितना लागत है दुगुना बन जाता है.


बिहार में पूर्ण शराबबंदी 2016 में लागू होने से माफिया सक्रिय

अब महुआ और गुड़ का दारू महादलित नहीं बनाकर शराब माफिया के दारू बेचने लगे है.राजू साह नामक शराब माफिया मस्ती से शराब बेच रहा है.इस माफिया का संपर्क दीघा थाना से है.क्षेत्र में होने वाले पुलिसिया गतिविधि की जानकारी राजू साह नामक शराब माफिया को मिलते रहते है.इसके कारण कभी गिरफ्तार नहीं हुआ है.अभी उड़ान टोला में महादलितों से शराब बिक्री करवा रहा है.

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