मधुबनी : महमदपुर मे आखिर उस दिन हुआ क्या था ? - Live Aaryaavart

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रविवार, 11 अप्रैल 2021

मधुबनी : महमदपुर मे आखिर उस दिन हुआ क्या था ?

  • पीड़ित पक्ष हत्या से एक घंटा पूर्व से ही पुलिस को क्यो फोन कर रहे थे । 

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बेनीपट्टी/मधुबनी, महमदपुर मे 1993 मे चार हत्याएं हुई थी, एक वर्तमान पीड़ित पक्ष से महंथ का जबकि सुरेंद्र सिंह पर तीन हत्या का इल्जाम लगा था. उस समय सुरेंद्र सिंह सेना मे तैनात थे । यह लड़ाई दो राजपूत परिवारों के बीच हुई थी और आज दूसरे पक्ष के कुछ राजपूतो का नाम भी हत्यारों मे नामजद है। फिलहाल अभी तक पूरा कनेक्शन उजागर नही हुआ है लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या महज मुफ्त का गुटखा खाने को लेकर इतनी बड़ी घटना घटित हुई? प्रवीण झा के चाचा चंद्र प्रकाश की माने तो होली के दिन चार पांच आरोपियों को महमदपुर मे बांधकर पीटा गया था और जिसके बाद लड़ाई बड़ी हो गयी और खून की नदियां बह गयी। इस रक्तरंजित होली मे बांधने वाली घटना और पीड़ित के द्वारा आखिर एक घंटा पूर्व से पुलिस को बुलाने की घटना का क्या कनेक्शन है यह भी बड़ा सवाल है जिसका उदभेदन होना चाहिए। आखिर पीड़ित पक्ष पुलिस को क्यो बुलाना चाहती थी? सवाल यह भी है आखिर उस दिन किस बात की लड़ाई हुई थी जो खूनी संघर्ष मे तब्दील हो गया? प्रवीण झा का अपराधिक इतिहास को खंगालने पर बेनीपट्टी थाना मे एक मामला दर्ज मिला है जो मछली मारने के विवाद के बाद हुआ था। जबकि भोला सिंह का नाम शराब तस्करी मे आता है। फिलहाल उसके ऊपर दर्ज मामले के संबंध मे जानकारी नही है। लेकीन हत्याकांड को जितना जातीय एंगल हर पार्टी ने बनाने की कोशिश की है वह एंगल ग्रउंड जीरो पर जाने से पता नही चल रहा है। इल्जाम मछुआरा सोसायटी पर भी लग रहा है आखिर मल्लाहों को मिलने वाला तालाब पर यादव और राजपूत ने कैसे कब्जा जमाया हुआ था? क्या मछुआरा सोसायटी पर राजेश यादव, अमरेन्द्र सिंह ने कब्जा जमा लिया था और इसी कब्जा की लड़ाई ने खूनी रूप ले लिया? वैसे मधुबनी का इतिहास को खंगाले तो जलकर की लड़ाई बहुत ही पुरानी है। और हजारों हत्याओं का इतिहास गांव के किस्से कहानियों के रूप मे आपको नजर आएगे। हलाकि इनदिनों जलकर की लड़ाई थोड़ी कम हुई थी क्योकि सरकार ने जलकर को फिलहाल मल्लाह समुदाय के हवाले कर दिया है। इस इस खूनी संघर्ष ने एक बार फिर मछुआरा सोसायटी को सवालों के घेरे मे लाकर खड़ा कर दिया है। सिस्टम को पंगु बनाकर कैसे दबंग लोग इस सोसायटी पर हावी है यह खूनी संघर्ष इस बात का ताजा उदाहरण के रूप मे दिखाई दे रहा है। दूसरा पहलू पर नजर दौड़ाए तो इन दिनो शराब तस्करों के लिए तालाब बेहतर ठिकानो मे से एक साबित हुआ है। पिछले कई थानो के केस खंगालने पर आपको तालाब से शराब मिलने के मामले एफआईआर नजर आएंगे? पन्डौल थाना एवं रहीका थाना मे तो शराब की बड़ी खेप मिली थी जिसे ट्रकों मे भरकर थाना लाया गया था। इस तालाब की बनावट को देखें तो आपको साफ नजर आएगा की शाम के बाद इस तालाब की ओर कोई नही जाता होगा और तस्करी मे शराब छुपाने का सबसे बेहतर ठिकाना साबित हो सकता था या रहा होगा । इस मामले मे तीसरा पहलू भी है जिसकी भी चर्चा की जा सकती है। सुरेंद्र सिंह का परिवार कॉंग्रेसी है और पूर्व विधायक युगेश्वर झा के करीबी बताए जाते है जबकि आरोपी पक्ष विनोद नरायण झा के करीबी और बजरंगदल से जुड़े बताए जा रहे है। लेकिन मधुबनी का मूड देखें तो यहा हाल के कुछ वर्षो मे राजनीतिक हत्या नही हुई है। लेकिन पुलिस ने अभी तक इस सवाल पर कोई स्पष्ट जवाब नही दिया है। घटनास्थल पर सबसे पहले नेता के तौर पर भाजपा एमएलसी घनश्याम ठाकुर पहुचे थे। घनश्याम ठाकुर इस बार विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे और काफी मान मनौवल के बाद एमएलसी बनाने के वादा के बाद वे माने थे। घटनाक्रम को देखें तो तीन दिनो के बाद जातीय गुटबाजी शुरू हुई जबकि राजद नेता चेतन आनंद शुरू से पीड़ित परिवार के संपर्क मे थे और वे बजरंगदल पर उंगली उठाने के बजाय आखिर क्यो सिर्फ ब्रह्मण पर उंगली उठाए? जबकि उन्हे भली भांति जानकारी थी की होली के दिन लड़ाई की सूरूआत भोला सिंह के साथ हुई थी जिसमे प्रवीण झा नवीन झा समेत 30-35 हथियारबंद लोगो ने सम्मलित होकर घटना को अंजाम दिया था। आखिर इस जातिए उन्माद फैलाने से किसे फायदा हुआ? क्या राजनेता चाहते थे की घटना की असली वजह को डिशट्रेक्ट किया जाए और जिससे सभी का फायदा हो और यह कोशिश मे सभी राजनेता अपनी अपनी राजनीति सेंकने मे कामयाब रहे? हत्या की गुत्थी आप जितना सुलझाने का प्रयास करेंगे आपको यह गुत्थी काफी पेंचीदगी से भरी नजर आएगी जिसे सुलझाते हुए  फिलहाल कोई भी नजर नही आ रहा है ।




साभार : मधुबनी मीडिया 

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