यह लोकतंत्र की जीत है: देवांगना कालिता की मां - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 15 जून 2021

यह लोकतंत्र की जीत है: देवांगना कालिता की मां

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नयी दिल्ली, 15 जून, उत्तर पूर्व दिल्ली में पिछले साल फरवरी के अंत में हुए सांप्रदायिक दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार पिंजरा तोड़ की कार्यकर्ता देवांगना कालिता को उच्च न्यायालय से मंगलवार को जमानत मिलने के बाद उनकी मां ने कहा कि यह उन्हें जन्मदिन का जबर्दस्त तोहफा मिला है। कल्पना कालिता ने कहा कि उनकी बेटी देवांगना का जन्मदिन 18 जून को है और जमानत मिलने का इससे अच्छा समय नहीं हो सकता था। उन्होंने असम के डिब्रुगढ़ के अपने गृहनगर से पीटीआई-भाषा को फोन पर बताया, “जन्मदिन से पहले, यह हमारे लिए एक जबर्दस्त तोहफा है। पिछले जन्मदिन पर वह जेल में थी। हम उन्हें शुभकामनाएं भी नहीं दे सके थे। उस समय हमारे वकील भी उनसे मिल नहीं सके थे और न ही उनसे बात कर सके थे।” कल्पना ने 23 मई 2020 के उस दिन को याद किया जब देवांगना को पिंजरा तोड़ की साथी कार्यकर्ता नताशा नरवाल के साथ गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने कहा, “ दोपहर करीब ढाई बजे, हमने उनसे वीडियो कॉल पर बात की थी। हमें पता था कि एसआईटी उनसे पूछताछ करने आ रही है। दोपहर तीन बजे एसआईटी आई और शाम छह बजे उन्हें गिरफ्तार कर जाफराबाद थाने ले गई और फिर उन्हें कई अन्य थानों में ले जाया गया।” दोनों को दंगों के संबंध में बड़ी साजिश रचने के आरोप में सख्त गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था। पिछले साल फरवरी में, देवांगना के पिता ने उन्हें आखिरी बार देखा था, जबकि कल्पना और उनके बेटे ने उन्हें एक साल से अधिक समय से नहीं देखा है। देवांगना की मां ने कहा, “वह उस दौरान जाफराबाद में धरना प्रदर्शन में व्यस्त थीं। उन्होंने अपने पिता से कहा था कि वह बहुत व्यस्त हैं। अगर हम चुप रहेंगे तो विरोध कौन करेगा?” कल्पना ने कहा कि उन्होंने एक साल बाद मंगलवार को अपनी बेटी की आवाज सुनी और और एक मिनट की बातचीत के दौरान देवंगाना ने उनसे कहा कि उन्हें जमानत मिल गई है। उन्होंने कहा, “भारतीय न्यायपालिका बहुत धीमी है लेकिन हमें विश्वास था। यूएपीए (गैर कानूनी गतिविधि निरोधक कानून) एक कठोर कानून है। जमानत मिलना बहुत कठिन है। मुझे कानून के बारे में कुछ नहीं पता था। किंतु इस मामले के बाद हमने कानून से जुड़ी सामग्री को पढ़ना शुरू किया। हमने जाना कि यूएपीए में जेल एक नियम है और जमानत एक अपवाद है लेकिन आज अपवाद सच हो गया है।” नरवाल और देवांगना को जमानत देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि विरोध करने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और इसे 'आतंकवादी कृत्य' नहीं कहा जा सकता। कल्पना ने कहा, “ असल में यह लोकतंत्र की जीत है न कि देवांगना और नताशा की जीत है।” कल्पना ने नताशा के पिता महावीर नरवाल को भी याद किया, जिनकी पिछले महीने कोरोना वायरस से मौत हो गई है। उन्होंने कहा, “उनके पिता महावीर नरवाल ने हमारा लगातार समर्थन किया। अगर उनके पिता जीवित होते तो पृथ्वी पर उन्हें सबसे ज्यादा खुशी हो रही होती। वह आपातकाल के दौरान जेल में गए थे और वह कहते थे कि 'लड़कियां जेल नहीं जाएंगी तो कैसी सीखेंगी'।"

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