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शनिवार, 31 जुलाई 2021

आलेख : ब्राम्हण एक जाति नही, ब्राम्हण एक सभ्यता है

brahaman
फेसबुक पर मेरे एक मित्र ने एक पोस्ट डाली है, वह यह है कि - "ब्राम्हण एक जाति ही नही, ब्राम्हण एक सभ्यता है, ब्राम्हण एक सांस्कृति है, ब्राम्हण एक राष्ट्रवादी विचारधारा का जीता जागता उदाहरण है। उठा के पढ़ लो इतिहास, जिसमे ब्राम्हणों की ऐतिहासिक गाथा हैं।" मुझे बात बहुत पसंद आई, और इसी विषय पर मैं कुछ कहना चाहता हूं। ब्राम्हण को सिर्फ जाति से ही नहीं नापिये। ब्राम्हण एक जीवनशैली है, जो आदर्शों को स्थापित करता है। जिसमें भी बुद्धि व विकसित विवेक हो, सत्कर्म, प्रसन्नता, संतोष, आनंद, विद्या, आध्यात्मिक ज्ञान हो, सदाचरण, सत्कर्म हो और चिंतन में सकारात्मकता हो, सभी का शुभ और सभी को अपने सतोगुंणी कर्म व उपदेशों से सन्देश देने की योग्यता हो, वही व्यक्ति ब्राह्मण कहलाने योग्य है। निश्चित ही, ब्राह्मण-जाति में केवल जन्म लेने भर से कोई ब्राह्मण नहीं हो जाता है, महात्वपूर्ण यह है कि उसमे ब्राम्हण के गुंण भी हैं या नहीं ?  इसी प्रकार यदि किसी का ब्राह्मण परिवार में जन्म नहीं भी हुआ, बल्कि अन्य जाति में जन्म लिया है, लेकिन गुंण उसमें ब्राम्हणों के हैं, तो मेरी दृष्टि में वह भी ब्राह्मणी गुंण (ब्राह्मण होने योग्य गुंण) का धारणकर्त्ता है। जन्म से भले ही वह ब्राह्मण नहीं है, लेकिन विद्वान तो है, विद्वत्ता ‌ब्राम्हण का मुकुट है, और विद्वान को पण्डित भी कहा जाता है। यद्यपि इस सोच में कुछ लोगों का मतभेद भी हो सकता है।  ध्यान करना होगा कि महर्षि बाल्मीक, आदि शंकराचार्य जी, गोस्वामी तुलसीदासजी, गुरुनानक देव जी, महावीर स्वामी जी, गौतम बुद्ध जी, महर्षि रमण, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, भक्त कवि रैदास, कबीर, मीराबाई, महर्षि देवराहा बाबा आदि अनेकों हैं, जो किसी जाति के मोहताज नहीं रहें हैं, बल्कि इनके नाम पर जातियां बन सकती हैं।


श्रीमद्भगवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है - “चातुर्वर्ण्यम् मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि माँ विद्धियकर्तारमव्ययम्॥ ४/१३॥” भगवान कह रहै हैं कि "गुंण और कर्म के अनुसार चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) मेरे द्वारा ही रचे गए हैं, परंतु इस व्यवस्था का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी (परमेश्वर) को अकर्ता ही जान।" 

ध्यान दीजिए - भगवान यहां "गुंण व कर्म" के आधार पर ही वर्ण निर्धारित कर रहे हैं। "जन्म और जाति" नहीं कहा है। श्रीकृष्ण ने यहां किसी जाति में जन्म लेने का वर्गीकरण नहीं किया है, बल्कि शव्द "वर्ण" का उपयोग किया है। वह कह रहे हैं कि मनुष्य अपने-अपने वर्ण के अनुसार अपना-अपना कर्म करे। दूसरे शब्दों में कहें तो अपने-अपने कर्म के अनुसार वर्ण निर्धारित  कर लें। यहाँ श्रीकृष्ण ने जाति-भेद नहीं किया है, बल्कि वर्ण-भेद किया है। अर्थात् कर्म के अनुसार विभाजन किया है कि हमारे कर्म कैसे हैं ?


स्पष्ट है कि जो जैसा कर्म कर रहा है, उसी से मनुष्य का वर्ण निर्धारित होगा। अर्थात जाति के आधार पर कर्म निर्धारित नहीं होगा बल्कि कर्म के आधार पर वर्ण निर्धारित होगा। सामान्यतः देखने में यह आ रहा, जैसा कि अधिकतर राजनीतिक क्षेत्र में होता है कि लोग स्वयं अपने ही हाथों से स्वयं का टींका माहुर लगा कर अपने ही हाथों से स्वयं की आरती उतार रहे हैं। यद्यपि प्रत्येक को अपने गुणों, अपनी जाति की प्रशंसा करने का अधिकार है, परन्तु आवश्यक तो यह है कि ऐसे गुणों के धारणकर्त्ता भी तो वे स्वयं बने, और बेहतर होगा कि गुणों के कारण दूसरे अन्य  उनकी प्रशंसा करैं। निष्कर्ष यह निकला कि ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ है, यह ईश्वर की कृपा है और ईश्वर ने उसे यह अवसर दिया है। इसके साथ ही यदि वह ब्राह्मणत्व के गुंण भी धारण किए हैं, तो सोने में सुहागा है। परन्तु ब्राह्मण परिवार में जन्म के बाद भी यदि अवगुणी रहै, तो जाति व जन्म, दोनों ही निरर्थक हो गए। इसी प्रकार यदि किसी अन्य जाति में जन्म हुआ हुआ है और गुंण ब्राह्मणों वाले हैं, तो मेरी दृष्टि में वह ब्राह्मण ही है, और अगला जन्म ब्राह्मण कुल में ही होने वाला है।  




rajendra tiwari


लेखक - राजेन्द्र तिवारी, अभिभाषक

दतिया, मध्य प्रदेश

फोन : 07522&238333, 9425116738

email- rajendra.rt.tiwari@gmail.com

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