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शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

फादर स्टेन स्वामी कहते थे, "मेरे बैग पैक हैं और मैं जाने के लिए तैयार हूँ

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रांची. सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का नारा उद्घोष करने वाले स्टेन स्वामी सहित देश के 16 सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी देश के आंदोलनरत जनसंगठनों, उनसे जुड़े नेताओं को भयभीत कर जनआंदोलनों को कमजोर करने की केंद्र सरकार की कोशिश है. स्टेन स्वामी को माओवादी घोषित करना और उनकी गिरफ़्तारी करना इसी की कड़ी है. मशहूर अर्थशास्त्री, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ फादर स्टेन स्वामी की सालों पुरानी पहचान रही है. दोनों ने तमाम आंदोलनो में साथ काम किया है. उन्होंने एक टीवी डिबेट में कहा कि स्टैन का निधन उनकी ज़िंदगी की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है. ज्यां द्रेज़ ने कहा, "84 साल का एक आदमी जो पार्किंसन जैसी बीमारी से ग्रसित हो, उनकी ज़मानत का विरोध करने के लिए एनआईए को कभी माफ़ नहीं किया जा सकता. मैं उन्हें पिछले 15-20 सालों से जानता था. वे शानदार शख़्सियत के मालिक और ज़िम्मेदार नागरिक थे. मैं नहीं मानता कि वे माओवादी थे. अगर वे थे भी, तो उन्हें ज़मानत और इलाज का अधिकार था." फादर स्टेन स्वामी पहले कैंसर से भी पीड़ित थे. उनकी सर्जरी भी हुई थी लेकिन आदिवासियों की मदद और उनके संघर्ष में शामिल होने का कोई भी मौक़ा वो कभी नहीं छोड़ते थे. "दरअसल, यूएपीए से जुड़े मामलों में इसके अभियुक्तों को बग़ैर सबूत सालों जेलों में विचाराधीन रखना नियमित प्रैक्टिस हो गई है. जबकि इसका कन्विक्शन रेट सिर्फ़ दो फ़ीसद है. फादर स्टेन स्वामी को भी यूएपीए के तहत गिरफ़्तार किया गया था. अब इस पर तत्काल बहस की ज़रूरत है कि ऐसे मामलों में लोगों को कई-कई सालों तक अंडर ट्रायल रखना कितना उचित है. जबकि ऐसे अधिकतर मामलों में एजेंसियाँ कोई सबूत नहीं पेश कर पातीं और लोग बाद में रिहा हो जाते हैं." तमिलनाडु में जन्मे फादर स्टेन स्वामी के पिता किसान थे और उनकी माँ गृहणी थीं.उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक बेंगलुरु में हाशिए पर मौजूद समुदायों के नेताओं के प्रशिक्षण के लिए एक स्कूल चलाया. स्टेन स्वामी के दोस्त और एक्टिविस्ट ज़ेवियर डायस बताते हैं, "उनके लिए किसी भी चीज़ की तुलना सबसे ज़्यादा ज़रूरी लोग थे. उन्होंने लोगों की सेवा के लिए चर्च की मान्यताओं की भी परवाह नहीं की." ज़ेवियर डायस कहते हैं, "वह अपनी समस्याओं की फ़िक्र भी नहीं करते थे. दो महीनों पहले, उनके भतीजे की कोविड-19 के कारण मौत हो गई थी. कुछ दिनों पहले शायद इसी दुख में उनकी बहन भी गुज़र गईं, जिनकी उम्र 90 साल से भी अधिक थी. तब वो कहते थे कि ये मेरा निजी नुक़सान है, लेकिन जब कई लोग बीमारी के कारण मर रहे हैं तो हमें उनके नुक़सान के बारे में भी सोचना चाहिए."


एनआईए के आने से हफ़्ते भरे पहले ज़ेवियर डायस के घर पर डिनर करते हुए दोनों ने भविष्य पर चर्चा की और गिरफ़्तारी को लेकर आशंका भी जताई थी.फादर स्टेन स्वामी कहते थे, "मेरे बैग पैक हैं और मैं जाने के लिए तैयार हूँ." सामाजिक कार्यकर्ता अनूप महतो कहते हैं – यह हत्या स्टेन स्वामी के साथ-साथ पूरे आदिवासी एवं झारखंडी जन आवाज की हत्या है। कहीं ना कहीं यह स्पष्ट दिखता है कि उद्योगपति एवं पूंजीपति घरानों की मंशा को पूरा करने के लिए केंद्र की हत्यारी व्यवस्था ने स्टेन स्वामी को मार डाला, किंतु उनके विचार और आवाज को उद्योगपति एवं पूंजीपति घरानों की दलाल सरकार कभी नहीं मार सकती, यह एक प्रायोजित हत्या है, इसका हम झारखंडी पूरे जोर से विरोध करते हैं, जिस काले कानून यूएपीए के तहत स्टेन स्वामी का शोषण एवं हत्या हुई है, इस काले कानून का भी हम झारखंडी पुरजोर विरोध करते हैं एवं स्टेन स्वामी की हत्या के खिलाफ हम आंदोलन में उतरेंगे. झारखंड जनाधिकार महासभा की अलका कहती हैं- महासभा दिवंगत जनाधिकारों के योद्धा साथी स्टेन को सादर हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करती है.स्टेन दशकों तक झारखंड के शोषित जनों की आवाज बने रहे.वे झारखंड जनाधिकार महासभा के गठन और संचालन में भी एक प्रमुख और अग्रणी भूमिका में रहे. उनके संकल्प हमारे लिए प्रेरक रहे हैं, प्रेरक बने रहेंगे.स्टेन हम सबकी यादों में और संघर्षों में जीवन्त रहेंगे.उनकी मौत सरकार द्वारा हत्या है.हम इसके लिए एनआईए और केन्द्र सरकार को पूरी तरह दोषी मानते हैं और उनकी भूमिका की निंदा करते हैं.साथी स्टेन की मौत केन्द्र की भाजपा सरकार के फासीवादी चेहरे को बेनकाब कर गयी.

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