विशेष : कहीं इतिहास के पन्नों में न गुम हो जाए कैथी लिपि - Live Aaryaavart

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

विशेष : कहीं इतिहास के पन्नों में न गुम हो जाए कैथी लिपि

kaithi-lipi
ऐतिहासिक कैथी लिपि अब गुम होने लगी है। एक समय ऐसा था कि कैथी लिपि के बिना काम नहीं चलता था, और आज स्थिति ऐसी है कि यह गुमनाम हो चली है। सोलहवीं सदी में प्रचलन में आई कैथी लिपि 1880 के दशक में बिहार में अधिकारिक भाषा के रूप प्रतिष्ठित थी, लेकिन आज स्थिति ऐसी बन गई है कि कैथी लिपि के जानकार बहुत कम बचे हैं। जिसके कारण  कैथी लिपि में लिखे गए विधिक दस्तावेजों को पढ़ सकने वाले नहीं मिल रहे हैं। जो थोड़े बहुत इसके जानकार बचे हैं, उनका कहना है कि भविष्य में इस लिपि को पढ़ने- जाननेवाला शायद ही कोई बचेगा और तब इस लिपि में लिखे गए भू अभिलेखों को प्रचलित लिपियों में तब्दील करना बेहद कठिन होगा। झारखण्ड, बिहार आदि प्रान्तों के न्यायालयों में आज भी सैंकड़ों टाइटल सूट से सम्बन्धित मुकदमे आते हैं, जिनमें से बीस प्रतिशत दस्तावेज कैथी लिपि में ही लिखे हुए होते हैं। इन राज्यों में वर्ष 1950 से 1954 में लिखे गए विधिक दस्तावेज कैथी लिपि में ही लिखे गए हैं। कायस्थ ऐसा दावा करते हैं कि कैथी लिपि कायस्थों की भाषा थी, और अधिकतर वही लोग इसे जानते-समझते और लिखते थे। जब तक इसका उपयोग होता रहा, यह चलती रही। कैथी लिपि की उपयोगिता व महता का पता इस बात से चलता है कि गीताप्रेस गोरखपुर व कई धार्मिक- आध्यात्मिक पुस्तकें प्रकाशित करने वाले प्रकाशन समूह कुछ दशक पूर्व तक  रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवतगीता आदि प्रचलित ग्रन्थों का कैथी लिपि में प्रकाशन किया करते थे, जो बहुतायत में बिका भी करते थे, और आज भी झारखण्ड, बिहार, उत्तरप्रदेश के कई घरों में उपलब्ध हैं। लेकिन आज जब इसका उपयोग कम हो गया है, तो यह विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। कोई भी लिपि या भाषा, जो बहुतायत में उपयोग नहीं होती, वह मृतप्राय हो जाती है। यही स्थिति कैथी लिपि की हो चली है। उपयोगकर्त्ता के न होने से यह मृतप्राय होने के कगार पर है।   कैथी लिपि का जन्म कायस्थ शब्द से हुआ है, जो उत्तर भारत का सामाजिक समूह है। इस समूह का पुराने रजवाड़ों और ब्रिटिश औपनिवेशिक समूह से काफी नजदीकी रिश्ता रहा है। कायस्थ जाति के लोग उनके यहां विभिन्न प्रकार के लिखा- पढ़ी अर्थात डाटा के मैनेजमेंट के कार्य के लिए नियुक्त किए जाते थे। कायस्थों द्वारा प्रयुक्त इस लिपि को बाद में कैथी के नाम से जाना जाने लगा। इस लिपि में बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश के हजारों अभिलेख लिखे गए हैं। इन प्रदेशों में इनसे संबंधित कोई न कोई दीवानी मुकदमा न्यायालय में आज भी आता ही रहता है। लेकिन  इन राज्यों में अब कुछ गिने-चुने लोग ही हैं, जो इन्हें पढ़ सकते हैं। ऐसे में अब इसके जानकारों की अहमियत काफी बढ़ गई है। कैथी का महत्व घटने को लेकर विदेशी विद्वान रुडोल्फ हर्नल की 1880 में लिखी गई टिप्पणी उल्लेखनीय है। उन्होंने लिखा है कि देवनागरी लिपि कैथी लिपि को सुपरसीड करेगी, क्योंकि यह कम समय में और आसानी से लिखी जा सकती है। बाद में यही हुआ भी। जैसे-जैसे देवनागरी लिपि का प्रसार हुआ, कैथी इतिहास बनती चली गई। आज उसके जानने वाले गिने-चुने बचे हैं।


कैथी लिपि का मध्यकालीन भारत में प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत में काफी बृहत रूप से प्रयोग किया जाता था। विशेषकर आज के उत्तर प्रदेश एवं बिहार के क्षेत्रों में इस लिपि में वैधानिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाने के भी प्रमाण पाये जाते हैं। इसे कयथी या कायस्थी, के नाम से भी जाना जाता है। पूर्ववर्ती उत्तर-पश्चिम प्रांत, मिथिला, बंगाल, उड़ीसा और अवध में इसका प्रयोग खासकर न्यायिक, प्रशासनिक एवं निजी आँकड़ों के संग्रहण में किया जाता था। उल्लेखनीय है कि कैथी एक पुरानी लिपि है, जिसका प्रयोग 16वीं सदी में धड़ल्ले से होता था। मुगल सल्तनत के दौरान इसका प्रयोग काफी व्यापक था। 1880 के दशक में ब्रिटिश राज के दौरान इसे प्राचीन बिहार के न्यायलयों में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया था। इसे खगड़िया जिले के न्यायालय में वैधानिक लिपि का दर्ज़ा दिया गया था। यही कारण है कि कैथी लिपि को कभी -कभी बिहार लिपि भी कहा जाता है। अभी भी बिहार समेत देश के उत्‍तर पूर्वी राज्‍यों में इस लिपि में लिखे हजारों अभिलेख हैं। समस्‍या तब होती है जब इन अभिलेखों से संबंधित कानूनी अडचनें आती हैं। अब इस लिपि के जानकार अब बहुत कम बचे हैं। जो हैं, वे भी काफी उम्र वाले हैं। ऐसे में निकट भविष्‍य में इस लिपि को जानने वाला शायद कोई न बचेगा और तक इस लिपि में लिखे भू-अभिलेखों का अनुवाद आज की प्रचलित लिपियों में करना कितना कठिन होगा इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। 

 

 अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के अंशुमन पांडेय ने कैथी लिपि को इनकोड करने का प्रस्ताव 13 दिसंबर 2007 को दिया था। प्रस्ताव में उन्होंने बताया था कि गवर्नमेंट गजेटियर्स में भी उल्लेख है कि वर्ष 1960 तक कैथी में बिहार के कुछ जिलों में काम किया जाता था। पृथक झारखण्ड प्रदेश बनने के बाद यहाँ के आदिवासी -सदान किसी नेता ने कैथी लिपि  के बारे में कभी सोचने की कोशिश नहीं की, वैसे भी आदिवासी तो इसे बाहरियों अर्थात दिक्क करने वाले दिक्कुओं की भाषा मानते है, लेकिन दुखद यह है कि सदान नेता गण भी इसकी आवश्यकता कभी महसूस नहीं कर सके। इनमें से कई तो कैथी की जन्म स्थली के ही पुराने वाशिंदे रहे हैं, लेकिन इन्हें भी कैथी की सुध कभी नहीं आई। बिहार विधानपरिषद में कुछ वर्ष पूर्व डॉ ज्योति के गैर सरकारी संकल्प के जवाब में प्रभारी मंत्री ने सदन को यह आश्वासन दिया था कि कैथी लिपि को संरक्षित करने और इसके प्रचार-प्रसार के लिए योजना तैयार होगी, लेकिन दुखद यह है कि बिहार में भी इस पर आज तक कुछ न हो सका। भोजपुरी को भी पहले ब्राह्मी लिपि से उत्पन्न कैथी नामक एक ऐतिहासिक लिपि में लिखा जाता था। देवनागरी लिपि से मिलती -जुलती इस लिपि को कयथी या कायस्थी के नाम से भी जाना जाता है। सोलहवीं सदी में इसका बहुत अधिक उपयोग किया जाता था। मुग़लों के शासन काल के दौरान भी इसका काफी उपयोग किया जाता था। अंग्रेजों ने इस लिपि का आधिकारिक रूप से बिहार के न्यायालयों में उपयोग किया। अंग्रेजों के समय से इसका उपयोग धीरे धीरे कम होने लगा था। बाद में इस लिपि के स्थान में देवनागरी लिपि का उपयोग होने लगा। कैथी लिपि को वर्ष 2009 में मानक 5.2 में शामिल किया गया। कैथी का यूनिकोड में स्थान U+11080 से U+110CF है। इस सीमा में कुछ खाली स्थान भी है जिनके कोड बिन्दु निर्धारित नहीं किए गए हैं। वर्तमान में कई लोग इस लिपि को पढ़ नहीं पाते हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या तब होती है जब किसी पुराने अभिलेख को पढ़ना पड़ता है, क्योंकि अभी भी कई सारे पुराने भू-अभिलेख कैथी लिपि में लिखे गए हैं और किसी भी प्रकार के कानूनी कार्यों में इसे पढ़ने की आवश्यकता पड़ जाती है। लेकिन इस लिपि को अधिक लोग नहीं जानते इसलिए इन कार्यों में बाधा उत्पन्न हो जाती है। भाषा के जानकारों के अनुसार यही स्थिति सभी जगह है, और अन्य कई भाषाओं की है। ऐसे में  कैथी लिपि सहित इस जैसी अन्य लिपि के संरक्षण की बहुत जरूरत है।




ashok-prabuddh
-अशोक “प्रवृद्ध”-

करमटोली , गुमला नगर पञ्चायत ,गुमला 

पत्रालय व जिला – गुमला (झारखण्ड)

कोई टिप्पणी नहीं: