विशेष : पश्चिम बंगाल की तर्ज पर हिंसा के जरिए यूपी को दहकाने की कुचक्र - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

विशेष : पश्चिम बंगाल की तर्ज पर हिंसा के जरिए यूपी को दहकाने की कुचक्र

यूपी में विधानसभा चुनाव होने में अभी पांच माह का वक्त है, लेकिन सत्ता से बेदखल पार्टियां मैदान मारने के लिए अभी से जुट गयी है। खास यह है कि जिस तरह हाल के दिनों में उपद्रव या हिंसा की वारदाते हो रही है, उससे साफ है कि विपक्ष यूपी में पश्चिम बंगाल की मुखिया दीदी के तर्ज पर चुनाव जीतना चाहती है। इसके लिए साजिश दर साजिश रची जा रही है। लखीमपुर खीरी में किसानों की आड़ में भड़की हिंसा इसकी चीख-चीख कर गवाही दे रहा है। वरना धरना-प्रदर्शन तलवार, चाकू, भाला लेकर, हेलीपैड व सड़कों को कब्जा कर नहीं किया जाता। खासतौर से तब जब सुप्रीम कोर्ट पहले से ही मोदी सरकार द्वारा लाई गयी बिल पर रोक लगा रखी है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या विपक्ष पश्चिम बंगाल की तर्ज पर हिंसा, अराजकता व दहशत फैलाकर यूपी को दहकाने की साजिश रच रही है? 

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फिरहाल, हर बार कभी आरक्षण के नाम पर, कभी शाहिनबाग तो कभी हाथरस की तर्ज पर आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन होते हैं। हर बार कुछ बेगुनाह आंदोलन के नाम पर होने वाली हिंसा के शिकार हो जाते हैं। हर बार पुलिस प्रशासन और सरकारी मशीनरी नाकाम साबित होती है। लखीमपुर खीरी में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जहां कुछ अराजक तत्व किसानों की आड़ में तलवार, खकू, भाला, लाठी-डंडे लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। उन्हें मनमानी की इतनी छूट थी कि सड़क से लेकर हैलीपैड तक को हाईजैक कर रखे थे और भाजपा कार्यकर्ताओं का काफिला निकला तो उसपर इस कदर पत्थरबाजी किया कि अनियंत्रित कार से कुचलकर चार किसानों की मौत हो गयी। खासकर ये चार मौते उपद्रवी साजिशकर्ताओ को मानो संजीवनी मिल गयी, सड़कों पर खुलेआम तोड़फोड़ व आगजनी की घटनाओं को अंजाम देने में जुट गए। बात यही नहीं थमी पत्रकार सहित चार लोगों की पिट-पिट कर हत्या कर दी। परिणाम यह रहा कि  इस घिनौनी साजिश में न सिर्फ हिंसा फैलाई गयी, बल्कि 8 बेगुनाहों को अपनी जान गंवानी पड़ी। लेकिन सवाल ये कि आखिर इन 8 मौतों का मुजरिम कौन है? इसके नाम पर देशभर में सपा व कांग्रेस, जो तांडव मचा रखा है उसके लिए कौन जिम्मेदार है? हिंसा की लपट इस कदर फैली की चार चार भाजपाईयों की जिंदगी आग के चलते काल के गाल में समा गई। 


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कहा जा रहा है लखीमपुर खीरी के तिकुनिया में रविवार को किसानों के प्रदर्शन के दौरान सांसद पुत्र आशीष मिश्रा उर्फ मोनू की गाड़ी से कुछ किसानों के कुचले जाने के बाद हिंसा की आग भड़क उठी, ऐसी बातें अब तक सामने आई हैं। इस हिंसा में दोनों ओर से आठ लोग मारे गए, जबकि तीन लोग घायल हुए। गाड़ियां जला दी गईं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की मानें तो किसी की मौत शॉक लगने से या घसीटने से तो किसी की लाठी-डंडों की पिटाई से तो किसी की ब्रेन हैमरेज से हुई है। गोली लगने की बात नहीं कही गई है। मृतक लवप्रीत सिंह (किसान) - घिसटने से हुई मौत। शरीर पर चोट के निशान मिले। शॉक और हेमरेज मौत की वजह। गुरविंदर सिंह (किसान) - दो चोट और घिसटने के निशान मिले। धारदार या नुकीली चीज से आई चोट। शॉक और हेमरेज। दलजीत सिंह (किसान) - शरीर पर कई जगह घिसटने के निशान। यही बनी मौत की वजह। छत्र सिंह (किसान) मौत से पहले शॉक, हेमरेज और कोमा। घिसटने के भी मिले निशान। शुभम मिश्रा (बीजेपी नेता) - लाठी-डंडो से हुई पिटाई। शरीर पर दर्जनभर से ज्यादा जगहों पर चोट के निशान मिले। हरिओम मिश्रा (अजय मिश्रा का ड्राइवर) - लाठी-डंडों से पिटाई। शरीर पर कई जगह चोट के निशान। मौत से पहले शॉक और हेमरेज। श्याम सुंदर (बीजेपी कार्यकर्ता- लाठी-डंडों से पिटाई. घिसटने से दर्जनभर से ज्यादा चोटें आईं। रमन कश्यप (स्थानीय पत्रकार) - शरीर पर पिटाई के गंभीर निशान। शॉक और हेमरेज से हुई मौत। 


खबर है कि इस तरह के हिंसा की तैयारी पहले से ही तैयार की गयी थी। ‘ललकार किसान’ नाम का ग्रुप बनाया गया था और इस गुप से केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र के वीडियो शेयर किए गए थे। इसके साथ ही व्हाट्सऐप ग्रुप में लिखा गया था, ‘इससे बदला लेना है।’ सूत्रों के मुताबिक ‘ललकार किसान’ ग्रुप को खालिस्तान टास्क फोर्स के एक पूर्व सदस्य ने बनाया था। हालांकि सबकुछ स्वाही होने के बाद पुलिस की निद्रा टूटी है और अब पुलिस व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन की तलाश कर रही है, जिसके जरिए लखीमपुर खीरी हिंसा से पहले मैसेज फॉरवर्ड किए गए थे। अब इसे पुलिस की खामी नही ंतो और क्या कहेंगे, जहां तीन बाद तक पुलिस लखीमपुर खीरी हिंसा की साजिश रचने वालों को पकड़ नहीं सकी। इससे बड़ी पुलिसिया लापरवाही और क्या हो सकती है, जहां किसानों के बीच अराजक तत्व शामिल थे, पुलिस उन्हें चिंहित तक नहीं कर सकी। यह अलग बात है कि किसान संगठन इस हिंसा के लिए सांसद पुत्र मोनू को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो वहीं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी ने अराजकतत्वों द्वारा पथराव किए जाने से गाड़ी के अनियंत्रित होने से हादसा होने की बात कही है। इससे घटना की शुरुआत के असल कारणों को लेकर बड़ा सवाल बना हुआ है, जिससे भड़की हिंसा ने आठ जिंदगियां निगल लीं। और शायद यही वजह भी है कि सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा है “जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो कोई जिम्मेदारी नहीं लेता“। संपत्ति को नुकसान और शारीरिक क्षति हुई है और कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेता।“ 


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राहतकारी यह है कि खीरी में बेहद दुखद और खौफ पैदा करने वाली घटना के बाद आंदोलनरत किसानों और प्रशासन के बीच समझौता हो गया। इसके तहत कार से कुचलकर मारे गए किसानों और फिर जवाबी हिंसा में पीट-पीटकर मार दिए गए भाजपा कार्यकर्ताओं और अन्य लोगों के परिजनों को समुचित मुआवजा दिया जाएगा, लेकिन विचार इस पर होना चाहिए कि आखिर यह घटना हुई क्यों? इस सवाल का जवाब भी खोजा जाना चाहिए और उससे सबक भी सीखे जाने चाहिए। आखिर जब स्थानीय सांसद एवं केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी के एक बयान के कारण किसान संगठन आक्रोशित थे तो फिर उनमें और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच टकराव टालने के लिए आवश्यक उपाय क्यों नहीं किए गए? सवाल यह भी है कि ये कैसे शांतिपूर्ण आंदोलनकारी थे, जिन्होंने अपने साथियों को कथित तौर पर टक्कर मारने वालों को उनके वाहनों से खींचने के बाद पीट-पीटकर मार डाला? इनमें एक पत्रकार भी था। आखिर उसकी क्या गलती थी? क्या न्याय मांगने का यही तरीका है? निःसंदेह ऐसे हिंसक तौर-तरीके तभी देखने को मिलते हैं, जब आंदोलनकारियों और शासन-प्रशासन के बीच वैमनस्य बढ़ता चला जाता है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि बीते दस महीने से जारी किसान संगठनों के आंदोलन के कारण आंदोलनकारियों और सत्तापक्ष के बीच कटुता हद से ज्यादा बढ़ गई है। यदि दोनों पक्षों के बीच बातचीत नहीं होती और शीघ्र ही किसी सुलह-समझौते पर नहीं पहुंचा जाता तो जैसी भयावह घटना लखीमपुर खीरी में हुई, वैसी अन्यत्र भी हो सकती है। यदि ऐसी घटनाओं से बचना है और यह सुनिश्चित करना है कि आगे जान-माल का नुकसान न हो तो फिर दोनों पक्षों को नरम रवैया अपनाने के साथ किसी समझौते पर पहुंचने की इच्छाशक्ति सचमुच दिखानी होगी। 


लखीमपुर खीरी की घटना के बाद इस इच्छाशक्ति का प्रदर्शन इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि यह साफ दिख रहा है कि किसान संगठनों के आंदोलन से बेजा लाभ उठाने वाले सक्रिय हो गए हैं। वे न केवल कटुता और उत्तेजना फैला रहे हैं, बल्कि माहौल बिगाड़ने का भी काम कर रहे हैं। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि लखीमपुर खीरी में ऐसे ही तत्व अपना शरारती एजेंडा पूरा करने में सफल हो गए। शायद इन तत्वों का काम इसलिए भी आसान हो गया, क्योंकि कई समूह किसान संगठनों को उकसाने में लगे हुए हैं। जो तमाम विपक्षी नेता लखीमपुर खीरी जाने को आतुर थे, उनका उद्देश्य वहां जान गंवाने वालों के प्रति संवेदना प्रकट करना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना था। अब यह सब बंद होना चाहिए, क्योंकि लोगों की जान पर बन आई है। सूत्रों की माने तो हिंसा के तीन अलग अलग पक्ष हैं। एक गाड़ी चार प्रदर्शकारियों को कुचल देती है और उसके बाद प्रदर्शनकारी गाड़ी के ड्राइवर समेत तीन लोगों को पीट पीटकर मार डालते हैं। उपद्रवी इतने क्रूर थे कि इन्होंने एक पत्रकार की भी हत्या कर दी। ये हत्या इस चुनावी बेला में विपक्ष के लिए संजीवनी साबित हो रही है। यही वजह है कि कोई इसे राजनैतिक रंग देना चाहता है तो कोई इसके नाम पर माहौल खराब करना चाहता है। वहीं कुछ लोग चाहते हैं कि ये घटना प्रशासन और किसानों के बीच नए संघर्ष में बदल जाए। 


घटना के बाबत एक पक्ष ये है कि कार्यक्रम के दौरान अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा उर्फ मोनू मिश्रा 3 गाड़ियों के साथ केशव प्रसाद मौर्य को रिसीव करने निकले थे. इस दौरान उनकी गाड़ी ने सड़क घेर कर खड़े किसानों को कुचल दिया। आरोप है कि उनकी गाड़ी 100 किमी प्रति घंटा की स्पीड में थी, जिसकी वजह से दो गाड़ियां वहां पलट गईं और उनके भी कुछ लोग मर गए। दूसरा पक्ष ये है कि जिन गाड़ियों से किसानों को कुचला गया, वो आशीष मिश्रा नहीं बल्कि उनके ड्राइवर हरिओम मिश्रा चला रहे थे, जिनकी किसानों ने पीट पीट कर हत्या कर दी। खुद को किसान कहने वाले इन लोगों ने बीजेपी के दो और कार्यकर्ताओं की बेरहमी से हत्या कर दी। तीसरी पक्ष ये है कि जब केशव प्रसाद मौर्य को रिसीव करने के लिए बीजेपी की ये गाडियां जा रही थीं, तब कुछ किसानों ने इन पर पथराव कर दिया और इससे घबरा कर भागने के चक्कर में ये घटना हुई, जिसकी पुलिस ने भी आशंका जताई है। इस हिंसा के जितने भी वीडियो और तस्वीरें सामने आई हैं, उनमें प्रदर्शनकारी हिंसा और आगजनी करते हुए दिख रहे हैं। बता दें, इस हिंसा की मूल जड़ में 25 सितम्बर को हुई एक घटना है। दरअसल, 25 सितंबर को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी अपने संसदीय क्षेत्र लखीमपुर खीरी में एक कार्यक्रम में शामिल होने आए थे। इस दौरान यहां किसान यूनियन के कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाए। जिससे नाराज होकर उन्होंने मंच से ये कह दिया कि वो विरोध कर रहे इन लोगों को जानते हैं और उन्हें 2 मिनट में सुधार सकते हैं। 


इसी के बाद लखीमपुर खीरी में किसानों का एक गुट, जिसमें समाजवादी पार्टी के भी कुछ नेता बताए जा रहे हैं, उन्होंने उनका विरोध शुरू कर दिया और कल फिर वहां हिंसा हो गई। अजय मिश्रा टेनी के इसी बयान के विरोध में किसान यूनियन और इलाक़े के कुछ नेताओं ने ये ऐलान किया था कि वो 3 अक्टूबर यानी कल उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का लखीमपुर खीरी आने पर विरोध करेंगे। इसी के बाद उन्होंने कल उस हेलीपैड को अपने कब्ज़े में ले लिया, जहां उप मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर उतरना था। इसी जगह पर फिर बाद में हिंसा भी हुई। खास यह है कि जो लोग केशव प्रसाद मौर्य को काले झंडे दिखाना चाहते थे, उनमें समाजवादी पार्टी के भी कुछ नेता हैं और इन लोगों ने हिंसा से कुछ देर पहले उन्हें और सांसद अजय मिश्रा टेनी को धमकी भी दी थी। विरोध की वजह से ही केशव प्रसाद मौर्य हेलिकॉप्टर की जगह सड़क के रास्ते लखीमपुर खीरी पहुंचे और कार्यक्रम में हिस्सा लिया। उनके साथ अजय मिश्रा टेनी भी थे इस समय तक वहां हिंसा नहीं हुई थी। लेकिन कुछ देर बाद खबर आई कि जहां हेलीपैड बनाया गया है, वहां किसानों ने गाड़ियों को आग लगा दी है और कई लोग इसमें मारे गए हैं। इस खबर के बाद वहां और लोग इकट्ठा हो गए। खबर है कि गाड़ियां तेज स्पीड की वजह से नहीं पलटी थीं, जैसा कि दावा किया जा रहा है। बल्कि इन गाड़ियों को कुछ किसानों ने पलट कर उनमें आग लगाई थी। इसके अलावा गाड़ी में बैठे बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ भी वहां मारपीट करते हुए कुछ लोगों को देखा गया। इनमें से ज्यादातर लोग यही कह रहे थे कि कोई भी जिंदा नहीं बचना चाहिए। अब सवाल है कि क्या पीट पीट कर लोगों की हत्या करने वाले ये किसान हो सकते हैं। लेकिन विपक्षी नेता अखिलेश यादव, मायावती, प्रियंका गांधी, जयंत चौधरी और ममता बनर्जी की के पांच नेताओं को यह सुनहरा अवसर दिख रहा है। पूरे प्रदेश को आग के हवाले कर देना चाहते है। यूरे यूपी कों ’दंगल का अखाड़ा’ बन देना चाहते है। सभी सियासी दलों के बड़े नेता वहां पहुंचकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए जुगत भिड़ा रहे हैं। हालांकि, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती समेत कई नेताओं को पुलिस ने नजरबंद कर दिया है। 




--सुरेश गांधी--

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