साहित्यिकी : सामाजिकी का लोकार्पण - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 19 नवंबर 2021

साहित्यिकी : सामाजिकी का लोकार्पण

  • · सामाजिकी –अपना समाज,अपना ज्ञान,अपनी भाषा की पुनः प्राप्ति का एक नया प्रयास
  • · अपनी भाषा से ही आगे बढ़ सकता है समाज
  • · समाजविज्ञान और मानविकी की शोध पत्रिका ‘सामाजिकी’ के प्रवेशांक के लोकार्पण में विद्वानों ने रखे विचार।
  • · गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान और राजकमल प्रकाशन के संयुक्त पहल से प्रकाशित हो रही है ‘सामाजिकी’।
  • · हर भाषा की अपनी विश्व-दृष्टि होती है : आशीष नन्दी

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नई दिल्ली :एक समाज की वैचारिकी उसकी अपनी भाषा में ही सर्वोत्तम रूप में विकसित हो सकती है। अपने समाज के व्यापक बौद्धिक विकास के लिए अपनी भाषा के महत्त्व को समझना जरूरी है। ताकि समाज को पीछे धकेलने वाली किसी भी परिस्थिति का न केवल मुकाबला किया जा सके बल्कि समाज को आगे भी बढ़ाया जा सके। ‘सामाजिकी’ का प्रकाशन इसी दिशा में एक जरूरी कदम है। गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान और राजकमल प्रकाशन के संयुक्त पहल से प्रकाशित ‘सामाजिकी’ पत्रिका के प्रवेशांक के लोकार्पण में विद्वान वक्ताओं ने ये विचार व्यक्त किए। समाजविज्ञान और मानविकी की इस त्रैमासिक शोध-पत्रिका का लोकार्पण गुरुवार शाम इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, एनेक्स में वरिष्ठ समाजशास्त्री आशीष नंदी की अध्यक्षता में किया गया। इस अवसर पर इतिहासकार सुधीरचंद्र, आलोचक-अनुवादक प्र.टी.वी. कटीमनी, राजनीतिक सिद्धान्तकार प्रो. राजीव भार्गव, राजनीतिक सिद्धान्तकार प्रो. विधु वर्मा, मानव विकास अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा और समाजशास्त्री प्रो. राजन हर्षे समेत अनेक गणमान्य हस्तियाँ मौजूद थीं। 


लोकार्पण के मौके पर ‘हिन्दी में सामाजिकी : चिन्तन की नई दिशाएँ’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में आए लोगों का स्वागत करते हुए, राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि राजकमल पाठकों के ज्ञान और संवेदना को समृद्ध करने वाली सामग्री के प्रकाशन के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहा है। अपनी स्थापना के 75वें वर्ष की ओर बढ़ते हुए ‘सामाजिकी’ का प्रकाशन कर हमने अपने संकल्प को पूरा करने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ाया है। उन्होंने आगे कहा, हम यह महसूस करते हैं कि विविधताओं से भरे और सामासिकता में पगे हमारे देश और समाज में, लगातार हो रहे बदलावों को सुसंगत, रचनात्मक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखना-समझना जरूरी है। ऐतिहासिक वजहों से हमारी दृष्टि पर एक औपनिवेशिक दबाव रहा है। हमें यह अपने समाज को यथार्थ परिप्रेक्ष्य में देखने से रोकता है। आशा है कि 'सामाजिकी' इस अवरोध को दूर करने में सहायक होगी, और हिन्दी समाज की दृष्टि को संवर्धित करने का माध्यम बनेगी। ‘सामाजिकी’ के सम्पादक और गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक बद्री नारायण ने कहा कि ‘सामाजिकी’ अपना समाज, अपना ज्ञान और अपनी भाषा की पुनः प्राप्ति का एक प्रयास है। यह हमारे ‘राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक समय’ को स्वरूप देने वाले सभी विचारों का सम्मान देना चाहती है। राजकमल प्रकाशन ने आगे बढ़कर इस पत्रिका के प्रकाशन में साथ दिया है, वह काबिले-तारीफ़ है। परिचर्चा के दौरान आलोचक-अनुवादक प्र.टी.वी. कटीमनी ने इस अवसर पर समाजविज्ञान और मानविकी के अध्ययन-अनुसन्धान में मातृभाषाओं के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा, भारत और भारतीयता को समझने के लिए अपनी भाषा में शिक्षा का होना बहुत जरूरी है। हिन्दी में ‘सामाजिकी’ का प्रकाशन, इस सन्दर्भ में स्वागतयोग्य है। इतिहासकार सुधीरचन्द्र ने भी जनसामान्य की भाषा की अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि आम लोगों की बोलचाल की भाषा शोध की दुश्मन नहीं है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में अंग्रेजी का जिक्र करते हुए कहा कि उससे आक्रान्त होने के बजाय हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में काम करना जरूरी है।


प्रो. संतोष मेहरोत्रा ने शैक्षिक परिदृश्य में अाए बदलावों का जिक्र करते हुए कहा कि अगर हम समाज को विमर्श से जोड़ना चाहते हैं तो हमें उसकी बौद्धिक-शैक्षिक समस्याओं देखना होगा। उन्होंने ‘सामाजिकी’ को ऑनलाइन प्रकाशित करने का भी आग्रह किया ताकि वह ज्यादा लोगों तक पहुँच सकें। प्रो. राजीव भार्गव ने विचारों के संचार में भाषा की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा कि हमारे सामाजिक परिवेश, सोच, भाव और अभिव्यक्ति के बीच गहरा रिश्ता होता है। अगर हम अपने समाज को समझना चाहते हैं और उस तक अपनी बात ले जाना चाहते हैं तो हमें अपनी भाषा के महत्त्व को समझना पड़ेगा। प्रो. विधु वर्मा ने ‘सामाजिकी’ के प्रकाशन को बेहद महत्त्वपूर्ण प्रयास करार देते हुए कहा कि जो भाषा रोजगार से जुड़ी होती है लोग उसमें ज्यादा रुचि लेते हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके अध्ययन-चिन्तन में अंग्रेजी और हिन्दी, दोनों किस तरह हमेशा बनी रही हैं। उन्होंने कहा, भाषा और बाजार का मसला काफी जटिल है। मुझे उम्मीद है कि सामाजिकी का प्रकाशन समाज की कुछ जटिल समस्याओं के सन्दर्भ में प्रभावी साबित होगा। प्रो. राजन हर्षे ने अपने सम्बोधन में कहा कि किसी भी समाज के लिए उसकी भाषा का महत्त्व असंदिग्ध है। हिन्दी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी में ‘सामाजिकी’ का प्रकाशन महत्त्वपूर्ण है। हमें इन्य भारतीय भाषाओं में समाजविज्ञान और मानविकी के क्षेत्र में हो रहे अध्ययन अनुसन्धानों को भी सामने लाने की पहल करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अपनी भाषा न हो तो यथार्थ को समझना आसान नहीं होगा। हमें सच को समझने, उसका साथ देने की जरूरत है। आज हमने सच को मानो छुट्टी दे दी है। जबकि हमें असत्य के साथ शत्रुता करनी चाहिए न कि सत्य के साथ। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में आशीष नन्दी ने कहा कि ‘सामाजिकी’ का प्रकाशन सराहनीय है। भाषा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि हर भाषा अपने साथ एक विश्वदृष्टि रखती है। इसलिए एक भाषा के लुप्त होने का मतलब एक विश्वदृष्टि का खत्म हो जाना है। उन्होंने भाषा की राजनीति से उपजने वाले खतरों से भी आगाह किया  और कहा, किसी भाषा का विरोध तब होने लगता है जब उसे राजनीतिक हथियार बनाया जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी न केवल मातृभाषा है बल्कि राजभाषा भी है।


समाज के लिए व्यापक बौद्धिक पहल

‘सामाजिकी’ के लोकार्पण के मौके पर राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानन्द निरुपम ने कहा कि इस शोध-पत्रिका का प्रकाशन अपने समाज को बौद्धिक तौर पर सक्षम-सजग बनाए रखने का एक उपक्रम है। हिन्दी में इसका प्रकाशन किसी अन्य भाषा के खिलाफ होना नहीं है। गौरतलब है कि एक हिन्दी में अनेक हिंदियाँ हैं। उन सबको बोलने-समझने वालों को एक राजनीतिक हिन्दी से नियंत्रित करने की अब तक की सबसे विकट तैयारी हम सब देख रहे हैं। अब यह हिन्दी एक राजनीतिक टूल है जिसक माध्यम से असत्य और अविचार, संदेह और अविश्वास का ऐसा सामाजिक वातावरण बनाया जा रहा है, जिसमें हमारे सामाजिक तानेबाने और पड़ोसीपन और विविधता के साहचर्य की सहज स्वीकार्यताके नष्ट होने का खतरा सिर पर है। ऐसे में हिन्दी में ‘सामाजिकी’ का प्रकाशन होश खो रहे समाज को सँभालने की दूरगामी स्तर पर व्यापक बौद्धिक तैयारी की पहल है।

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